सम्राट अशोक- भारत का महानतम शासक

1892

प्राचीनकालीन भारत के इतिहास में केवल एक शासक को चक्रवर्ती राजा होने का सम्मान प्राप्त हुआ है। यह शासक ऐतिहासिक पुस्तकों में सम्राट महान अशोक (Ashoka the Great) और चक्रवर्ती सम्राट अशोक के नाम से जाना जाता है। भारत गुप्त वंश को सोने की चिड़िया का सम्मान दिलवाने वाले चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र और महान शासक बिन्दुसार के पुत्र के रूप में राज करने वाला अशोक एक असाधारण शासक और चक्रवर्ती सम्राट कैसे बना, इस संबंध में विभिन्न तथ्य उपलब्ध हैं:

अशोक का असाधारण बचपन:

चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र बिन्दुसार के पुत्र अशोक का जन्म 304 ईपू पाटलीपुत्र या पटना में हुआ था। इनका बचपन का नाम देवनामांप्रिय अशोक मौर्य था। बाल्यकाल से ही अशोक एक वीर राजपुत्र के रूप में अपना समय व्यतीत करते थे। क्षत्रीय होने के कारण कठिन शिकार खेलना इनका मनपसंद कार्य था। पिता के राजकाज में उनका हाथ बँटाना भी अशोक के दैनिक जीवन का एक हिस्सा था। इसके साथ ही प्रजा के हितों में कार्य करने और निर्णय लेने के कारण अशोक को प्रजा भी मन से अपना राजा मानने लगी थी। इनके इन्हीं गुणों ने बिन्दुसार को अपने तीसरे पुत्र के रूप में अशोक को कम उम्र में ही अपने उत्तराधिकारी के रूप में सम्राट घोषित कर दिया था।

अशोक का राज्याभिषेक:

चन्द्र्गुप्त मौर्य के पौत्र होने के कारण अशोक में वो सभी गुण विरासत में मिले थे, जिन्होनें चन्द्रगुप्त को एक महान शासक का दर्जा दिया था। अशोक के राजगद्दी पर बैठने के संबंध में इतिहास में विभिन्न साक्षय मिलते हैं। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि पहले बिन्दुसार ने अपने बड़े पुत्र सुशिम को राजगद्दी सौंप दी थी। अशोक उस समय एक वीर युवा के रूप में सर्वप्रिय हो गया था। इस कारण सुशिम ने पिता से कहकर उसे विभिन्न स्थानों पर हो रहे विद्रोहों को दबाने के लिए भेज देता था। इन घटनाओं में सबसे पहले तक्षशीला, निर्वासन, उज्जैन और कलिंग के विद्रोहों का नाम लिया जाता है। अशोक ने सहर्ष इन स्थानों पर जाकर कुशलता से न केवल इन विद्रोहों को समूल नष्ट किया बल्कि निर्वासन में मत्स्यकुमारी कौर्विकि और उज्जैन में देवी नाम की सुंदरी से विवाह करके इन्हें अपनी रानियों में भी शामिल कर लिया। इन सब घटनाओं से सैन्य शक्ति व प्रजा शक्ति अशोक के समर्थन में और सुशिम के विरोध में आ गई थी। उनका मार्ग रोकने के लिए अशोक के सौतेले भाइयों ने उनकी हत्या करने का प्रयास किया जिसे अशोक ने समझदारी से विफल कर दिया और स्वयं राजगद्दी प्राप्त कर ली।

मौर्य साम्राज्य का अभूतपूर्व विस्तार:

ऐतिहासिक साक्ष्य के अनुसार अशोक ने अपने जीवनकाल में न केवल सम्पूर्ण अखंड भारत पर 269 से 232 ईपू तक की अवधि तक राज्य किया था। उनके ध्वज के नीचे उत्तर में हिंदुकुश की पर्वत श्रंखला से लेकर दक्षिण की मैसूर तक और पूर्व में बांग्लादेश से लेकर पश्चिम के अफगानिस्तान होते हुए ईरान तक के क्षेत्र की राज्य सीमा पहुँच गई थी। इसके अतिरिक्त वर्तमान भौगोलिक सीमाओं के अनुसार पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, म्यान्मार के अधिकांश भूभाग पर भी सम्राट अशोक का शासन ही माना जाता है। इतिहासकार इस शासन को इतिहास का सबसे बड़ा शासन मानते आ रहे हैं।

Ashoka the Great और बौध्द धर्म:

सम्राट अशोक का नाम बौद्ध धर्म का पर्यायवाची हो गया है। सर्वप्रथम अशोक बौद्ध धर्म के संपर्क में उस समय आया जब उसके पिता बिम्बूसार ने उसे उज्जैन में होने वाले विद्रोह को दबाने के लिए भेजा था। उस समय Samraat Ashok को अपने बड़े भाई सुशीम से प्राणों का भय होने के कारण विद्रोह को कुचलने के बाद अशोक छद्म रूप में बौद्ध सन्यासियों के साथ रहा था। उस समय उसका पहला परिचय बौद्ध धर्म और इनके नियम आदि से हुआ था।

इसके बाद सम्राट बनने के बाद अपने साम्राज्य विस्तार प्रक्रिया में, जीवनकाल में कोई भी युद्ध न हारने वाला अशोक कलिंग का युद्ध जीतकर भी मानसिक रूप से हार गया था। इस युद्ध की विकरालता और हुए प्रलयंकारी संहार को देखकर अशोक का मन विचलित हो गया। इस संत्रास से उबरने के लिए अशोक ने बौद्ध धर्म को अपना लिया था। इसके उपरांत अशोक ने सात्विक जीवन व्यतीत करते हुए अपना पूरा जीवन सामाजिक और धार्मिक कार्यों के लिए लगा दिया। न केवल भारत में बल्कि भारत से बाहर श्रीलंका, अफगानिस्तान, सीरिया, मिश्र, नेपाल और यूनान आदि देशों में भी अशोक ने अपने पुत्र व पुत्री के साथ धर्म प्रचारकों को भी भेजा था।

Samraat Ashok की इस धर्म यात्रा में अनेक राजाओं ने भी उसका अनुपालन करते हुए बौद्ध धर्म अपना लिया था। श्रीलंका का राजा तिस्स इसी प्रकार का एक राजा था जिसने अशोक के पुत्र महेंद्र के माध्यम से बौद्ध धर्म को अपना लिया था

इसके अतिरिक्त अशोक ने Buddhism के प्रचार में निम्न प्रकार के कार्यों को अंजाम दिया था:

(क) धर्मलिपियों का खुदवाना,

(ख)  धर्म महापात्रों की नियुक्ति,

(ग) दिव्य रूपों का प्रदर्शन,

(घ) लोकाचारिता के कार्य,

(च) धर्म श्रावण एवं धर्मोपदेश की व्यवस्था,

(छ) धर्मयात्राओं का प्रारम्भ

 (ज) राजकीय पदाधिकारियों की नियुक्‍ति,

(झ) विदेशों में धर्म प्रचार को प्रचारक भेजना आदि।

इनमें से अशोक ने धर्म यात्राओं से अपना कार्य आरंभ किया था। वह इन धर्म यात्राओं के माध्यम से नेपाल गया जहां उसने कनकमुनी स्तूप की स्थापना की।

इसके अतिरिक्त धर्म महापात्रों के माध्यम से समाज के विभिन्न धर्मों में सामंजस्य व समन्वय साठापित करने का भी प्रयास किया जिसमें वह पूरी तरह सफल सिद्ध हुआ।

बौद्ध धर्म अपनाने के बाद अशोक ने राज्य में भोग-विलास संबंधी यात्राओं पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि बौद्ध धर्म अपनाने से पूर्व अशोक वैदिक नियमों व नीतियों का पालक था, इस प्रकार की जानकारी कल्हण ऋषि के ग्रंथ ‘राजतर्ङगनी’ से प्राप्त होती है। लेकिन एक बार बौद्ध धर्म की शरण में आने के बाद अशोक ने इसे ही मोक्ष का अंतिम मार्ग मान लिया था।

अशोक एक महान सम्राट:

बाल्यावस्था से लेकर मृत्यु होने तक अशोक ने एक शक्तिशाली और वीर राजा के साथ ही पूर्णतया धार्मिक व्यक्ति के जीवन को जिया था। जहां सम्राट के रूप में अशोक ने एक भी युद्ध नहीं हरा था वहीं एक बौद्ध धर्म के अनुयाई के रूप में उसने इस धर्म के प्रचारक का भी धर्म पूरी तरह से निभाया था। जहां एक ओर राज्य का सुख लेने के लिए उसने अपने 101 भाइयों में से अनेक की हत्या की थी, वहीं कलिंग का नरविनाश देखकर उसने आजीवन अहिंसक होने का व्रत भी ले लिया था। यह अशोक का ही वीरगुण माना जा सकता है कि मौर्य वंश में केवल अशोक ने सबसे अधिक समय अथार्थ चालीस वर्ष तक शासन किया था। चन्द्रगुप्त के बाद अशोक के शासन काल को स्वर्णिम शासनकाल माना जाता है।

अशोक द्वारा निर्मित सांची के स्तूप व स्तम्भ जिसे आज अशोक स्तम्भ के नाम से जाना जाता है, आज भी भारतीय संविधान और भारत की पहचान माने जाते हैं।

एक सफल जीवन जीते हुए 232 ईपू अशोक की मृत्यु हुई थी।

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