भारत में कैसे हुई हरित क्रांति की शुरुआत और किसने बोए इसके बीज

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green revolution in India

भारत एक कृषि प्रधान देश है। आज भारत को विश्व के 15 सबसे बड़े कृषि उत्पादक देशों में गिना जाता है।  लेकिन विश्वभर में कृषि के क्षेत्र में जो स्थिति आज भारत की है, उसका श्रेय कहीं ना कहीं तो हरित क्रांति को भी जाता है। क्योंकि यही वो समय था जब देश में कृषि उत्पादन में बड़ा बदलाव आया। हरित क्रांति ने भारतीय कृषि को जीवन निर्वाहक की जगह पर व्यापारिक आयाम प्रदान किया है। भारत आज आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी, भौतिक और जैविक विज्ञान पर निर्भर है।

इस लेख में आप जानेंगे:

  • भारत में हरित क्रांति
  • कैसे हुई भारत में हरित क्रांति की शुरुआत
  • भारत में हरित क्रांति के लिए इन सभी तत्वों का अहम माना गया है

भारत में हरित क्रांति

  • भारत में हरित क्रांति की शुरुआत साल 1966-67 में हुई थी। हरित क्रांति के बाद देश के कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति हुई। इन दिनों कृषि क्षेत्र की प्रक्रियाओं में क्रांतिकारी परिवर्तन आया।
  • कृषि के परम्परागत तरीकों के स्थान पर रासायनिक उवर्रकों, कीटनाशक दवाईयों, उन्नत बीजों, आधुनिक कृषि उपकरण, विस्तृत सिंचाई परियोजनाओं आदि के प्रयोग को बढ़ावा मिला और खरीफ की फसल के साथ ही एक नये युग की शुरुआत हुई। जिसे हरित क्रांति के नाम से जाना जाता है।
  • विश्व भर में हरित क्रांति की शुरुआत का श्रेय नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर नॉरमन बोरलॉग को जाता है। हरित क्रांति के बाद कृषि उत्पादकों की गुणवत्ता के साथ- साथ देश में कृषि उत्पादन भी बढ़ा। खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता आई।

कैसे हुई भारत में हरित क्रांति की शुरुआत

Bharat me harit kranti
  • पूरे विश्व में हरित क्रांति के जनक के रुप में भले ही प्रोफेसर नारमन बोरलॉग को देखा जाता हो, लेकिन भारत में हरित क्रांति के जनक के रुप में एम एस स्वामीनाथन का ही नाम लिया जाता है। क्योंकि स्वामीनाथन ने तत्कालीन कृषि मंत्री सी सुब्रहण्यम के साथ मिलकर देश में हरित क्रांति लाने पर बल दिया था।
  • आजादी से पहले ही पश्चिम बंगाल में भीषण अकाल पड़ा, जिसमें लाखों लोगों की मौत हो गई। 1947 में मिली आजादी के देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने भी कृषि क्षेत्र पर जोर तो दिया, लेकिन उस वक्त तक भी पुराने तरीकों से ही खेती की जा रही थी, जिसकी वजह से देश में कई फसलों का आयात भी करना पड़ता था। यानी कि भारत में अनाज की उपज बढ़ाने की सख्त जरुरत थी। इसके बाद भारत को बोरलॉग और गेहूं की नोरिन क़िस्म का पता चला।
  • 1965 में भारत के कृषि मंत्री थे सी सुब्रमण्यम। उन्होंने गेंहू की नई क़िस्म के 18 हज़ार टन बीज आयात किए, कृषि क्षेत्र में ज़रूरी सुधार लागू किए, कृषि विज्ञान केन्द्रों के माध्यम से किसानों को जानकारी उपलब्ध कराई, सिंचाई के लिए नहरें बनवाईं और कुंए खुदवाए, किसानों को दामों की गारंटी दी और अनाज को सुरक्षित रखने के लिए गोदाम बनवाए।
  • देखते ही देखते भारत अपनी ज़रूरत से ज़्यादा अनाज पैदा करने लगा। इस अवधि के दौरान कृषि की नई रणनीति प्रयोग मे लाई गई। पायलट प्रोजेक्ट के रुप में 7 जिलों में गहन कृषि जिला कार्यक्रम शुरू किया गया।

भारत में हरित क्रांति के लिए इन सभी तत्वों का अहम माना गया है

  • अधिक उपज देने वाली फसलों का कार्यक्रम
  • बहुफसल कार्यक्रम
  • लघु सिंचाई
  • रासायनिक खाद, उन्नत बीज
  • कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा
  • कृषि शिक्षा और शोध
  • फसलों का बीमा

वहीं भारत में हरित क्रांति आने के बाद बहुत सारे बदलाव देखे गए। जो अगर बिंदुओं में समझा जाए तो इस प्रकार हैं:

  • फसलों के उत्पादन में अपार वृद्धि
  • फसल की उन्नत किस्मों का उत्पादन
  • खेतिहर मजदूरों के लिए रोजगार
  • ग्रामीणों के निर्धनता में कमी
  • व्यवसाय को बढ़ावा
  • आधुनिकरण को बढ़ावा
  • किसानों को उचित सुविधाएं
  • आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल

2 COMMENTS

  1. काफी अच्छी जानकारी दी है आपने हरित क्रांति के बारे में धन्यवाद साझा करने के लिए।

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