क्या है चिपको आंदोलन की हकीकत

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Chipko Movement

मानव सभ्यता में जब भी कोई क्रान्ति हुई है, कहीं न कहीं उसका प्रभाव विनाशकारी ही हुआ है। औध्योगिक क्रान्ति से विकास का सफर शुरू हुआ था जिसे तकनीकी और डिजिटल क्रान्ति ने अपनी चरम सीमा पर पहुंचा दिया है। लेकिन बाद में हुई इन दोनों क्रांतियों ने पर्यावरण हनन, ग्लोबल वार्मिंग और कंक्रीट के जंगल जैसे कुछ ऐसे शब्दों को भी जन्म दिया जो हानिकारक सिद्ध हुए हैं। यह सब शब्द प्रकृति के लिए धीमा जहर साबित हो रहे हैं। इस भावना का एहसास बेशक हमें आज हो रहा है लेकिन 1970 के दशक में हिन्दुस्तानी पहाड़ों की एक साधारण महिला गौरा देवी को उसी समय हो गया था। इस एहसास को मूर्त रूप देने के लिए उन्होनें वो काम किया जिसके बारे में 47 वर्ष पूर्व सोचना भी कठिन था। ‘चिपको आंदोलन’ के नाम से शुरू हुआ उनका आंदोलन एक मुहिम न रहकर बल्कि विश्व मानचित्र पर क्रांतिकारी कदम सिद्ध हुआ था।

चिपको आंदोलन का क्या है वास्तविक इतिहास:

चिपको आंदोलन को अधिकतर लोग चमोली गाँव से जुड़ा हुआ मानते हैं। यह केवल आधा सत्य है। वास्तविकता इससे भिन्न है। दरअसल आज़ादी से पहले राजस्थान के एक गाँव में बिशनोई समुदाय ने पेड़ों के कटान को रोकने के लिए अपनी जान गंवाई थी। यह बात है खेजडली आंदोलन की जिसका आरंभ 1730 में बिशनोई समाज की औरतों ने पेड़ों से लिपटकर उन्हें कटने से रोकने  के प्रयास में अपनी जान गंवाई थी। इस मुहिम की शुरुआत बिश्नोई समाज की साधारण महिला अमृता देवी ने अपनी गुरु जांभोजी महाराज की जय बोलते हुए पेड़ से लिपटकर की थी। “सिर साटे रुख रहे तो भी सस्तो जाण” बोलते हुए अपनी गर्दन कटवाने वाली वो पहली महिला थीं। अपनी माँ का अनुसरण करती हुई उनकी तीनों पुत्रियाँ भी इसी प्रकार पेड़ों से लिपटकर अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देतीं हैं। इस प्रकार इस आंदोलन में आसपास के 84 गांवों के 383 लोगों ने अपने प्राणों की आहुती दी थी। जब यह सूचना जोधपुर के महाराजा तक पहुंची तब उन्होनें पेड़ों के काटने पर प्रतिबंध लगाया था। इस प्रकार अमृता देवी की बोयी हुई चिंगारी ने पेड़ों के काटने को रोक दिया था।

चमोली का चिपको आंदोलन :

मार्च 1974 में शुरू हुआ चिपको आंदोलन उस बाढ़ का परिणाम था जो 1970 में उत्तराखंड में भारी विनाश लेकर आई थी। इस बाढ़ ने न केवल आम जीवन को तहस नहस किया था बल्कि आधारभूत सेवा व सुविधाओं को भी नष्ट कर दिया था। इस बाढ़ का सीधा कारण पेड़ों की कटाई के कारण ज़मीन की कमजोरी को माना गया था।

उत्तराखंड इस नुकसान से उबरा भी नहीं था कि 1972 में सरकारी वन विभाग नें वहाँ उगने वाले अंगू के पेड़ों को ग्रामवासियों को देने से मना कर दिया। इसके स्थान पर यह पेड़ काटने का ठेका खेल का सामान बनाने वाली एक साइमंड नाम की कंपनी को दे दिया गया।

वन विभाग के इस आदेश से वहाँ के गांव वालों की इन पेड़ों से रोज पूरी होने वाली जरूरतों पर ताला पड़ गया था। गांव वालों का कहना था कि यह अंगू के पेड़ उनके रोजी-रोटी का साधन हैं और अब इसका लाभ उनको न मिलकर एक बाहरी व्यक्ति को मिलेगा जो उस इलाके के लोगों के साथ अन्याय है। इसके अलावा ग्रामीण बुज़ुर्गों ने वन विभाग को इतने बड़े पैमाने पर पेड़ काटने से होने वाले ज़मीन के क्षरण की ओर भी ध्यान दिलाने की कोशिश की। लेकिन वन विभाग व सरकार ने किसी बात पर ध्यान नहीं दिया।

15 मार्च को ग्रामीण लोगों ने इस आदेश के विरुद्ध जनसभा करते हुए मार्च निकाला जिसका विशाल रूप 24 मार्च को दिखाई दिया। उसके अगले दिन 25 मार्च को सरकार ने कुटनीति का प्रयोग करते हुए एक घोषणा कारवाई जिसमें उन लोगों को आमंत्रित किया गया जिनकी ज़मीन सरकार ने अधिग्रहित की थी। सरकार ने उन्हें इस जमीन के बदले मुआवजा प्राप्त करने के लिए सबको 25 मार्च का दिन दिया।

इस प्रकार एक ओर तो ग्रामीण पुरुष और युवा समुदाय सरकारी विभाग में अपने मुआवजे के इंतज़ार में बैठा था तो दूसरी ओर सरकारी आदेश का सहारा लेकर साइमंड कंपनी के अधिकारी पेड़ काटने वन में घुस गए।

इस नाज़ुक स्थिति को महिलाओं ने समझा और गौरा देवी के नेतृत्व में गांव की सभी 27 महिलाएं पेड़ों से चिपक कर खड़ी हो गईं। न केवल इतना बल्कि उन्होनें वन काटने आए मजदूरों से प्रेम से रोकने की कोशिश की और इसमें असफल होने पर उन्होने हार नहीं मानी।

वन अधिकारियों द्वारा अपमानित होने पर भी गौरा देवी और उनकी साथियों ने ऋषिगंगा से जुड़े नाले का पुल पूरी तरह से नष्ट कर दिया। इस प्रकार उन्होनें बिना डरे पेड़ काटने आए लोगों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।

चिपको आंदोलन का असर:

गौरा देवी की दहाड़ जब देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंची तब समस्त वैज्ञानिक व पर्यावरणविद भी उनके समर्थन में खड़े हो गए। इन लोगों ने सरकार को चेतावनी देते हुए स्पष्ट किया कि रैंणी, ऋषि गंगा, पाताल गंगा, गरुड़ गंगा, विरही, मन्दाकिनी, कुवारी पर्वत आदि के आस-पास के जंगल काटने से पर्यावरण को भयानक परिणाम झेलने पड़ सकते हैं।

चिपको आंदोलन को राष्ट्रिय नेता सुंदरलाल बहुगुणा का पूर्ण समर्थन व सहयोग प्राप्त था। इस आंदोलन की जीत उस समय मानी गई जब तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने हिमालय क्षेत्र में 15 वर्षों के लिए पेड़ों की कटाई पर रोक लगाने का आदेश पारित किया था।

शेष भारत में प्रभाव:

चमोली में उठी चिपको आंदोलन की चिंगारी की सफलता ने इस आग को देश के विभिन्न क्षेत्रों में भी फैला दिया था। देश की चारों दिशाओं में फैला यह आंदोलन उत्तर के हिमालय के साथ दक्षिण के कर्नाटक को अपनी लपेट में ले चुका था। पूर्व में बिहार से लेकर पश्चिम के राजस्थान राज्य भी इस प्रकार के आंदोलन से अछूते नहीं रहे थे।

इस आंदोलन की सफलता विंध्य पर्वतमाला में वृक्षों की कटाई पर स्थायी रोक के रूप में दिखाई देती है। इसके अतिरिक्त विश्व भर के पर्यावरणशास्त्री प्राकृतिक संसाधन नीति के निर्माण के लिए भी एकजुट हो गए हैं।

क्या आज भी चिपको आंदोलन की ज़रूरत है?

सदी के सबसे बड़े अहिंसक आंदोलन की ज़रूरत आज फिर से प्रतीत हो रही है। इसका कारण है कि समस्त भूमि ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से जूझ रही है। इसके अलावा भारत में अगर देखा जाए तो सरकारी रिपोर्ट का एक हिस्सा भी सत्य है तो हरियाणा का लगभग 15,000 वर्ग किमी का जंगल ज़मींदोज़ हो चुका है। इस रिपोर्ट में अपना सुर मिलाते हुए सेण्टर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस, बैंगलोर के  प्रोफेसर है, प्रो टी वी रामचंद अपने के शोध रिपोर्ट में व्यक्त करते हैं कि पिछले 10 वर्ष के भीतर ही देश के हर भाग में से जंगली हिस्सा खत्म हो चुका है। उनकी रिपोर्ट को माने तो उत्तरी भारत से 2.84%, मध्य भारत का 4.38% और दक्षिणी-पश्चमी घाट का 5.7% जंगल इतिहास बन चुका है।

इसके अलावा एक और रिपोर्ट का कहना है कि हर वर्ष एक चंडीगढ़ जितनी भूमि विकास के नाम पर गैर प्राकर्तिक कार्य के लिए उपयोग होती है। इन कार्यों में रक्षा परियोजना, बांधों का निर्माण, विद्युतगृह का निर्माण के साथ सड़क निर्माण शामिल हैं।

वातावरण  में बढ़ता कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर और तेज़ी से होता मिट्टी का कटाव प्रकृति का सबसे घातक रूप बनता जा रहा है। फसलों का उत्पादन हर संभव प्रयासों के बावजूद पहले की तुलना में एक चौथाई रह गया है। पहाड़ों से जनसंख्या का पलायन शहरों में एक अलग ज्वलंत समस्या हो गई है।

इसके अलावा बढ़ती जनसंख्या के दबाव के कारण फैलता रिहायशी इलाका और उसकी पूरी करने वाली जरूरतों के लिए बढ़ता पेड़ों का कटान एक अलग चिंता का विषय बनता जा रहा है। बढ़ता प्रदूषण, और इससे उपजी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ एक और चिपको आंदोलन की पुकार कर रहे हैं।

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