रानी विक्टोरिया के राज में सोने की चिड़िया को किसने लूटा

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British raj me bharat ka vyapar

एक समय था जब भारत को सोने की चिड़िया का नाम दिया जाता था। उस समय की किवदंतियों के अनुसार “भारत में इतना सोना है कि लोगों को कुछ काम करने की भी जरूरत नहीं है”। इसी सोने के आकर्षण में बंधकार न जाने कितने आक्रमणकारियों ने यहाँ आक्रमण किए, कुछ जीत गए तो कुछ मुंह की खा कर गए। मुगल शासक जैसे कुछ यहाँ बस गए और इस देश के विकास में योगदान दिया तो वहीं ब्रिटिश साम्राज्य के नुमाइंदे व्यापारी बन कर आए और देश को लूटकर अपने देश चले गए। क्या कभी आपने सोचा है कि ऐसा क्या था कि भारत को में ब्रिटिश साम्राज्य क्यों व्यापारी से शासक बन गया और उस समय भारत की आर्थिक और व्यापारिक दशा क्यों इतनी गिर गई कि सोने कि चिड़िया कहलाने वाला देश एक गरीब आयातक बन कर रह गया।

ब्रिटिश काल से पहले का भारत :

पंद्रहवीं शताब्दी में जब वास्कोडिगामा ने सबसे पहले समुद्र के रास्ते अमरीका से भारत पहुँचने का रास्ता खोज निकाला था उस समय भारत पूरी तरह से कृषि प्रधान देश था। इसके बाद स्पेन की लूट के बाद समर्द्ध हुए अमरीका के लोग भारत से आयात करने लायक स्वर्ण जुटा चुके थे।

इस समय भारत के पहले से ही पश्चिम और पूर्व एशिया के साथ रोम से भी अच्छे व्यापारिक संबंध थे। इन देशों में भारत का कपड़ा, धातु और अनाज आदि का निर्यात होता था। बदले में भारत में पर्याप्त मात्रा में स्वर्ण भारत की ओर आ जाता था। इस तथ्य का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी में भारत आए फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने अपने यात्रा वृतांत में लिखा है कि भारत में मिश्र से कहीं अधिक विकसित और समृद्ध देश है। इस देश से चावल, शक्कर, सूती-रेशमी कपड़ा, मक्खन का भरपूर निर्यात होता है। यहाँ के लोग अपने उपभोग की वस्तुओं का उत्पादन स्वयं ही कर लेते हैं। सिंचाई के लिए गंगा नदी से नहरों का जाल बिछाया है जो राजमहल से समुद्र तक फैला है। इस कथन से यह बात स्पष्ट है कि ब्रिटिश व्यापारियों के भारत आने से पूर्व भारत केवल एक निर्यातक देश था। आयात नाम मात्र का था। इस प्रकार भारत का व्यापारिक संतुलन सकारात्मक था और निर्यात में प्राप्त स्वर्ण मुद्रा के कारण स्वर्ण भंडार में कोई कमी नहीं थी। यह उस समय के पूर्ण स्वावलंबी भारत की तस्वीर थी।

भारत में ब्रिटिश व्यापारियों क्यों आए थे :

इस समय हालेंड, फ्रांस और पुर्तगाल के व्यापारी अरब सागर के रास्ते भारत में प्रवेश करके अपना व्यापार शुरू कर चुके थे। लेकिन अंग्रेज़ कंपनी के व्यापारीयों ने अपनी सैन्य शक्ति व अपनी तोपों के बल पर समुद्री रास्ते पर अधिकार करके भारत के व्यापार पर भी एकाधिकार करना शुरू कर दिया।

भारत में उस समय मुगल शासन अपनी जड़ें खो चुका था और चन्द्रगुप्त द्वारा स्थापित अखंड भारत छोटी-छोटी इकाइयों में बंट चुका था। लेकिन इसके बावजूद भारत का हस्तशिल्प और कुटीर उध्योग स्वावलंबी था और निर्यात की तुलना में अभी भी आयात कम ही था।

अठारहवीं सदी की शुरुआत में अंग्रेज़ कंपनी ने जब सूरत के रास्ते भारत में कदम रखा तब वे एक व्यापारी की शक्ल में आए थे। लेकिन उनका उद्देशय केवल व्यापार न करके बल्कि इसको आर्थिक रूप से कमजोर करके अपना व्यापारिक और राजनैतिक वर्चस्व स्थापित करना था। इस कूटनीति के तहत अंग्रेज़ व्यापारी ने व्यापार की आड़ में पहले अपने लिए किले और गोदाम बनाए और उनकी सुरक्षा के नाम पर सेना स्थापित करनी शुरू कर दी थी।

अँग्रेजी शासन में भारत में व्यापार की स्थिति:

ब्रिटिश शासन के स्थापित होने से पूर्व भारत का आंतरिक और विदेशी व्यापार पूर्ण रूप से संतुलन में था। कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था होने के कारण कुटीर उध्योग भारतीय व्यापार की रीढ़ की हड्डी माना जाता था। लेकिन ब्रिटिश व्यापारियों ने कूटनीति के चलते अपनी मशीनों से बने माल को यहाँ बेचने के लिए सबसे पहले इसी मजबूत हिस्से पर वार किया था। इस कारण जहां पहले भारत से सूती कपड़ा और रेशम का निर्यात होता था, वहीं अब निर्मित वस्तु के रूप में इंग्लैंड से कपड़े का आयात करना शुरू हो गया।

धन निकासी का दौर:

1847 की क्रान्ति की असफलता के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने भारत पर पूरी तरह से कब्जा करके राजनैतिक और आर्थिक शोषण आरंभ कर दिया था। जहां एक ओर अठारहवीं सदी तक भारतीय खेती का उद्देश्य स्थानीय व देश की आंतरिक खाद्यान जरूरतों को पूरा करना भर था। वहीं इस क्रांति के बाद ब्रिटिश शासकों ने अपने लाभों को बढ़ाने के लिए उन फसलों के निर्यात पर बल दिया जिनका अंतर्राष्ट्रीय बाजार बहुत अच्छा था। परिणामस्वरूप भारत के राज्य पंजाब, असम, दक्षिण भारत, बंगाल आदि इंगलेंड के लिए दूध देने वाली गाय बन गए थे। इन राज्यों से कपास, चाय, पटसन, चमड़ा एवं खालों का निर्यात सस्ती दर पर किया जाने लगा।

इसके साथ ही इंग्लैंड का चीन से व्यापार बढ़ चुका था तो इस कारण चीन को बेचने के लिए अफीम का उत्पादन भी भारत के किसानों के द्वारा किया जाता था। इस प्रकार भारत से अफीम का निर्यात भी होने लगा।

इंग्लैंड में गेहूँ महंगा था इसलिए वहाँ के श्रमिकों की मांग पूरी करने के लिए भारत में अच्छी किस्म के समस्त गेहूँ का निर्यात सस्ते दामों पर किया जाने लगा। लेकिन आंतरिक जरूरत पूरी न होने के कारण इसका महंगी दर पर आयात भी किया जाने लगा।

इस प्रकार निर्यात के माध्यम से आने वाली मुद्रा में कमी हो गयी थी। इसके अतिरिक्त निर्यात से होने वाली आय का प्रयोग ब्रिटिश सरकार अपनी देनदारियों के भुगतान के लिए करती थी। परिणामस्वरूप विदेशी मुद्रा भंडार खाली होने लगा। कुछ अर्थशास्त्री इस समय को धन निकासी का दौर भी कहते हैं।

इस प्रकार कृषि में स्वावलंबी भारत धीरे-धीरे ज़रूरत की फसल जैसे गेहूँ और धान का आयात करने लगा। इस प्रकार जहां एक ओर कृषि के उत्पादन का संतुलन बिगड़ गया वहीं दूसरी ओर विदेशी व्यापार में भी संतुलन बिगड़ चुका था।

मशीनी युग का आरंभ:

भारत में अंग्रेज़ व्यापारी औधोयगिक क्रान्ति से होने वाली उनकी हानि को लाभ में परिवर्तित करने के लिए आए थे। इसके लिए उन्होनें सबसे पहले हाथ से काम करने वाले श्रमिकों से उनका रोजगार छीनकर मशीनों से उत्पादन पर ज़ोर दिया। इसके लिए सबसे पहले वस्त्र उध्योग में मशीनों का उपयोग शुरू हो गया। याध्यापि भारत का लौह उध्योग आंतरिक ज़रूरत पूरी करने में सक्षम था। लेकिन बड़ी-बड़ी मशीनों के निर्माण के लोहे का आयात विदेशों से किया जाने लगा। हालांकि इससे पहले भारत के बने पानी के जहाज निर्यात किए जाते थे जिसके सबसे बड़े खरीदार योरोपीय व्यापारी थे। लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों ने इन श्रमिकों की कुशलता का लाभ न उठाते हुए कच्चा लोहा इंग्लैंड से आयात करना शुरू कर दिया था। इस कारण भारत से मुद्रा के रूप में स्वर्ण भंडार में बड़ा छेद होना शूरु हो गया था।

असंतुलित विदेशी व्यापार:

ब्रिटिश शासन काल में विदेशी व्यापार में वृद्धि हुई लेकिन यह वृद्धि प्रेरित और असंतुलित थी। इस समय ब्रिटिश सरकार द्वारा उन वस्तुओं का निर्यात किया जाता था जिन्हें इंगलेंड द्वारा कच्चे माल के रूप में प्रयोग किया जाना था। इसके अलावा इंग्लैंड के अलावा भारत का विदेशी व्यापार चीन, श्रीलंका और ईरान से होता था। लेकिन यह व्यापार इंग्लैंड को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया जाता था। इस कारण निर्यात से प्राप्त होने वाली स्वर्ण या चांदी की संग्रह पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। निर्यात के माध्यम से प्राप्त होने वाली धन राशि का व्यय अँग्रेजी सरकार के दूसरे देशों से होने वाले युद्धों के खर्चों के भुगतान में निकल जाता था।

भारत के व्यापार का नकरात्मक प्रभाव:

इंग्लैंड के औध्योगिकरण का विकास भारत की पूंजी के आधार पर हुआ था। जबकि ब्रिटिश तर्कशास्त्री भारत में हुए औध्योगिक और रेलवे के विकास का हवाला देते हैं। इस तर्क के आलोचकों का मत है कि अंग्रेजों ने रेलवे और सड़कों का विकास अपने व्यापारिक दृष्टिकोण से किया था। भारत के ग्रामीण इलाकों से कच्चा माल बन्दरगाहों और हवाई अड्डों तक पहुँचने के उद्देश्य से सड़कों और रेलवे लाइनों का प्रावधान किया गया। इसके अतिरिक्त भारत में भारी उदद्योग भी वही लगाए गए जिसमें इंग्लैंड के द्वारा कच्चे माल के साथ लोहे व इस्पात की पूर्ति हो सके। इस प्रकार हर दृष्टि से केवल इंग्लैंड के विकास को ध्यान में रखकर ही भारत की आर्थिक व व्यापारिक नीतियों का निर्माण व विकास किया गया।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के संगठित भारत जिसे सोने कि चिड़िया का दर्जा दिया गया था, उसके पर नोंचने का काम ब्रिटिश काल में रानी विक्टोरिया के अधिकारियों ने किया था।

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