Coinage of India: प्राचीन भारत के सिक्के

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इस लेख में हम आपको coinage of India के बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं, जो आपका सामान्य ज्ञान बढ़ाने के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं में भी आपके बहुत काम आएगी।

बचपन से ही हम तरह-तरह के सिक्के देखते आ रहे हैं। यहां तक कि जब हम किसी संग्रहालय भी जाते हैं, तो वहां पर भी हमें बड़े ही प्राचीन सिक्के देखने के लिए मिल जाते हैं। इन सिक्कों को देखकर अक्सर हमारे दिमाग में यह सवाल आता है कि आखिर इन सिक्कों को बनाया किसने होगा और कब ये सिक्के चलन में रहे होंगे। भारत में सिक्कों का क्या इतिहास रहा है, इसे लेकर विद्वानों के बीच हमेशा मतभेद रहे हैं। जहां कई का मानना है कि सिक्कों का चलन भारत में पश्चिमी देशों की देन है, तो वहीं कई विद्वान यह भी मानते हैं कि भारत में स्वतंत्र रूप से सिक्कों का अपना खुद का इतिहास रहा है।

ऐसे में ancient Indian coins history को बहुत ही अच्छी तरह से समझना एकदम जरूरी हो जाता है, क्योंकि ये सिक्के केवल सिक्के नहीं हैं, बल्कि इन सिक्कों में हमारा गौरवमयी इतिहास भी छिपा हुआ है। कई ऐतिहासिक और पुरातात्विक सर्वेक्षण एवं अनुसंधान में यह बात सामने आ चुकी है कि भारत में कम-से-कम कम छठी सदी ईसा पूर्व में सिक्के स्वतंत्र तरीके से तैयार किए गए थे।

भारत के प्राचीन सिक्कों के स्वतंत्र होने के पीछे तर्क

1) ग्रीक सिक्कों से भिन्नता: History of coins in India UPSC के लिहाज से एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। ऐसे में आपके लिए यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि विल्सन और प्रीसेग जैसे विद्वानों ने भारत में सिक्कों को लेकर यह बताया था कि वैक्ट्रियन ग्रीक का अनुकरण करते हुए भारत में सिक्कों की शुरुआत हुई थी। हालांकि, इस बात को कनिंघम ने पूरी तरीके से नकारा है। उन्होंने कहा था कि ग्रीक सिक्कों से भारतीय सिक्कों ने कहीं भी प्रेरणा नहीं ली है। यदि ऐसा होता तो भारतीय सिक्के बिल्कुल ग्रीक सिक्कों की तरह होते।

2) दोनों सिक्कों में भिन्नता: डॉ अल्केतर ने इसके बारे में थोड़ा स्पष्ट तरीके से बताया है। ग्रीक सिक्कों की जब हम बात करते हैं, तो ये गोलाकार होते थे, लेकिन जब हम भारतीय आहत सिक्कों पर नजर डालते हैं, तो ये चौकोर आकार के नजर आते हैं। यहां तक कि जब हम अभिलेख के आधार पर दोनों में समानता का आकलन करने का प्रयास करते हैं, तब भी हम यही पाते हैं कि आहत सिक्कों पर हमें किसी तरह का कोई अभिलेख खुदा हुआ नहीं मिला है, जबकि ग्रीक सिक्कों पर इस तरह के अभिलेख देखने के लिए मिल जाते हैं।

3) चित्र वाला अंतर: एक और अंतर भी ग्रीक सिक्कों और भारत के आहत सिक्कों में यह देखने के लिए मिलता है कि ग्रीक सिक्कों के आगे वाले भाग पर राजा के चित्र बने हुए दिखते हैं, तो वहीं पीछे वाले भाग पर धार्मिक चित्र बने हुए दिख जाते हैं। वहीं, आहत सिक्कों पर हम इस तरह का कोई भी चित्र नहीं पाते। इन पर हमें केवल भारतीय चिह्न देखने के लिए मिलते हैं।

4) सिकंदर को दिए गए थे सिक्के: कार्टियस ने यह बताया है कि जब सिकंदर दुनिया पर विजय पाने के लिए निकला था और भारत पर उसने धावा बोला था, तब तक्षशिला पहुंचने पर उसके स्वागत के दौरान उसे चांदी के सिक्के उपहार स्वरूप भेंट किए गए थे। इस बात से यह पूरी तरीके से साबित होता है कि सिकंदर के आने से पहले ही चांदी के सिक्कों का भारत में चलन हुआ करता था।

5) तक्षशिला में खुदाई: भारत के प्राचीन सिक्के कितने ज्यादा पुराने हैं, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जो प्राचीन ग्रीक सिक्के मिले थे, वे देखने में नए लगते थे, जबकि जो आहत सिक्के प्राप्त हुए थे, वे घिसे हुए नजर आ रहे थे। जब तक्षशिला में मार्शल की खुदाई हुई थी, तब यह बात पूरी तरीके से साबित हो गई थी।

6) यूनानी सिक्कों में भारतीयता की झलक: डॉ अल्केतर ने यह बताया है कि ग्रीक सिक्कों से तुलना करने पर प्राचीन भारतीय सिक्के कम-से-कम 100 साल और पुराने हो सकते हैं। इस बारे में डॉ उपाध्याय ने भी यह लिखा है कि यूनानी राजा दिमितस ने जो सिक्के चलाए थे, उनमें भी भारतीयता की झलक देखने के लिए मिल जाती है।

प्राचीन भारतीय सिक्कों की उत्पत्ति

जब आप यहां coinage of India के बारे में पढ़ रहे हैं, तो ऐसे में यह जानना भी बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर प्राचीन भारतीय सिक्कों की उत्पत्ति किस तरह से हुई होगी। दरअसल इसे लेकर कई तरह के सिद्धांत प्रचलित हैं, जो निम्नलिखित हैं:

1) मध्य प्रदेश में उत्पत्ति: जे ए डिकौडर डयकस जैसे विद्वानों ने यह बताया है कि ईरान में जो सिगलोई सिक्कों का चलन था, उसी के अंतर्गत भारत के सिक्के हुआ करते थे। हालांकि भारतीय पंचमार्क सिक्कों का जब अच्छी तरह से विश्लेषण किया गया, तो पाया गया कि ये पूरी तरीके से ईरानी सिगलोई सिक्कों से अलग थे। वह इसलिए कि राजा के चित्र पंचमार्क सिक्के पर बने हुए नहीं मिले। इन पर आहत का चिन्ह भी नहीं नजर आया। ऐसा माना जाता है कि मध्य प्रदेश में पंचमार्क सिक्कों की उत्पत्ति हुई थी, क्योंकि बेहद प्राचीन पंचमार्क सिक्के मध्यप्रदेश में खुदाई के दौरान मिले हैं।

2) छठी सदी ईसा पूर्व में उत्पत्ति: कैनेडी व स्मिथ जैसे विद्वानों ने यह मत रखा था कि भारत के पंचमार्क सिक्के पूरी तरीके से बेबीलोनिया के सिक्कों से मिलते-जुलते हैं। उन्होंने इसका आधार यह दिया कि ये दोनों ही समान हैं। साथ ही इन पर किसी तरह के अभिलेख खुदे हुए नहीं मिलते हैं। हालांकि, भारतीय पंचमार्क सिक्कों का विश्लेषण करने पर यह पाया गया कि इनका तौल एक ग्रेन हुआ करता था, जबकि बेबीलोनियन सिक्कों का तौल 132 ग्रेन था। डॉ अल्केतर ने भी यही बताया है कि बेबीलोनिया का सिक्का ज्यादा से ज्यादा 525 ईसा पूर्व पुराना हो सकता है, जबकि भारतीय सिक्के छठी सदी ईसा पूर्व से ही चलन में थे।

3) जातक ग्रंथों में प्राचीन भारतीय सिक्के: जातक ग्रंथों में शतमान, निष्क, स्वर्ण, कर्षापण और कृष्णाल जैसे नाम पढ़ने के लिए मिल जाते हैं। इनमें जो कहानियां लिखी गई हैं, उनके आधार पर यह पता चलता है कि निष्क और कर्षापण सोने और तांबे के सिक्के हुआ करते थे। विनय स्पटिक में भी राजगृह में सिक्कों के प्रचलन के बारे में बताया गया है।

Ancient Indian coins history: बिन्दुवार जानकारी

  • महात्मा बुद्ध के समय भी भारत में सिक्कों का चलन हुआ करता था और ये आहत सिक्के कहे जाते थे। इन्हें ही पंचमार्क सिक्कों के नाम से भी जाना जाता है। पेड़-पौधे, आधा चंद्रमा, मछली, हाथी और सांप जैसी आकृतियां इन सिक्कों पर बनी होती थीं। इन्हें ठप्पा मारकर चांदी या फिर तांबे से बनाया जाता था। यही वजह है कि ये आहत सिक्के कहे जाते थे।
  • आहत सिक्के, जो सबसे प्राचीन हैं, सबसे ज्यादा मगध और उत्तर प्रदेश में ये पाए गए हैं।
  • जब कुषाण शासक कडफिसस द्वितीय का शासन चल रहा था, तो सबसे पहले उसने सोने के सिक्के चलाए थे। इसके बाद भारत में तांबे के सिक्के कनिष्क द्वारा चलाए गए थे।
  • यहां तक कि मौर्योत्तर काल में भी चांदी के शतमान के साथ सोने के निष्क, तांबे के काकिनी और सोने के सुवर्ण व पल सिक्कों का चलन था।
  • सोने के सिक्के गुप्तकाल में भी चलन में हुआ करते थे। वैसे पूर्वकालीन कुषाणों के शासन के वक्त सोने के सिक्कों में जो शुद्धता हुआ करती थी, वह इस काल में सिक्कों में देखने के लिए नहीं मिली।
  • बाद में कर्षापण सिक्के भी बनाए गए थे, जो कि मूल रूप से चार धातुओं सोना, चांदी, सीसा और तांबे के मिश्रण से बना होता था।
  • गुप्तकाल में जो सोने के सिक्के चलाए गए थे, वे दीनार के नाम से जाने जाते थे और उस दौरान लेन-देन में कौड़ियां इस्तेमाल में आती थीं।
  • जब कुषाणों का शासन भारत में चल रहा था, तब 124 ग्रीन वाले तौल के स्वर्ण सिक्के चलाए गए थे, जबकि गुप्त काल में 144 ग्रेन के तौल वाले सोने के सिक्कों का चलन था।
  • मौर्योत्तर काल में सोना और चांदी के अलावा तांबा, कांसा और पोटिन से बने हुए सबसे ज्यादा सिक्के चलाए गए थे।
  • बाद में सोने के सिक्कों को 650 ईस्वी से 1000 ईस्वी के दौरान चलन से बाहर कर दिया गया था।
  • प्रतिहार शासकों, जिन्होंने 9वीं शताब्दी के दौरान शासन किया था, उनके भी कई सिक्के खुदाई के दौरान मिले हैं। उसी तरीके से उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्सों, गुजरात एवं राजस्थान में 7 वीं सदी से 11 वीं शताब्दी के दौरान के गधैया सिक्के मिले हैं, जिन पर कि अग्रवेदिका का चित्र बना हुआ है।
  • जिस तरीके से ड्रामा तांबे के सिक्के ग्रीक शासकों ने चलाए थे, उसी तरीके से पाल और प्रतिहार शासकों द्वारा भी चांदी के द्रम्म सिक्के चलाए गए थे।

और अंत में

History of coins in India UPSC में आपसे सवाल के रूप में जरूर पूछी जा सकती है। ऐसे में इस लेख के मुताबिक यदि आप अपना उत्तर लिखते हैं, तो इससे इस बात की पूरी संभावना है कि आपको अच्छे अंक मिलें। परीक्षा के अलावा भी इस लेख को पढ़ने के बाद प्राचीन भारतीय सिक्कों के बारे में आपकी जानकारी पहले से अधिक समृद्ध हुई होगी, ऐसी हम उम्मीद करते हैं। ऐसे में आप इस लेख को अपने दोस्तों के साथ भी शेयर कर सकते हैं, ताकि उन्हें भी इसका लाभ मिल सके।

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