बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन ने तय कर दी देश की आज़ादी

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Partition of Bengal

भारत में अपनी हुकूमत कायम रखने के लिए अंग्रेजों की तो नीति ही ‘फूट डालो और राज करो’ की रही थी। साथ ही राष्ट्रवादी आंदोलनों के दमन के लिए भी उन्होंने विभाजन वाली नीति का सहारा लिया। वर्ष 1905 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बंगाल विभाजन का कदम उठाना इसी दिशा में उठाया गया एक कदम था कि बंगाल जो भारतीय राष्ट्रवाद का तब प्रमुख केंद्र बनकर उभर चुका था, विभाजन करके उसे तितर-बितर कर दिया जाए।

ऐसे हुआ बंगाल का विभाजन

ब्रिटिश सरकार ने सर्वप्रथम 3 दिसंबर, 1903 को बंगाल के विभाजन का प्रस्ताव यह तर्क देकर लाया कि यहां कि विशाल आबादी के कारण प्रशासनिक व्यवस्था सुचारु तरीके से नहीं चल पा रही है और इसके कुशल संचालन के लिए बंगाल का विभाजन करना जरूरी है। हालांकि, सभी जानते थे कि इसका उद्देश्य तो दरअसल बंगाल में सिर उठा चुके राष्ट्रवादी आंदोलनों का दमन था, क्योंकि इसका प्रभाव देशव्यापी हो रहा था।

भाषा के आधार पर विभाजन

  • बंगाली बोलने वालों की जनसंख्या 1 करोड़ 70 लाख की थी।
  • हिंदी और उड़िया बोलने वाले 3 करोड़ 70 लाख की संख्या में थे।
  • इस तरह से बंगाली भाषा वाले बंगाल में बंगाली ही अल्पसंख्यक बन गये।

धर्म के आधार पर विभाजन

  • पश्चिमी बगाल की आबादी 5 करोड़ 40 लाख की थी, जिनमें हिंदुओं की संख्या 4 करोड़ 20 लाख की थी।
  • पूर्वी बंगाल में मुस्लिम बहुसंख्यक थे। यहां 3 करोड़ 10 लाख की आबादी थी, जिनमें मुस्लिम 1 करोड़ 80 लाख की तादाद में थे।
  • लॉर्ड कर्जन ने तो ढाका को पूर्वी बंगाल की राजधानी बनाने की भी बात कह दी थी। कर्जन ने कहा कि इससे मुगलों के शासन के दौरान जो मुस्लिमों के बीच एकता थी, वह फिर से कायम हो पायेगी।
  • इस तरह से बंगाल विभाजन से यह साफ हो गया कि अंग्रेजों ने संप्रदायवाद को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के लिए ऐसा किया था।

ऐसे हुआ विरोध

  • बैठकों का दौर शुरू हो गया। ढाका, चटगांव और मेमनसिंह में अधिकतर बैठकें आयोजित हुईं।
  • के.के. मित्रा, सुरेंद्रनाथ बनर्जी और पृथ्वीशचंद्र राय जैसे उदारवादी नेताओं ने विरोध-प्रदर्शन की अगुवाई की।
  • बंगाली, संजीवनी व हितवादी जैसे अखबार निकालकर बंगाल विभाजन के प्रस्ताव की आलोचना की गई।

प्रभावी हुआ बंगाल विभाजन

  • 19 जुलाई, 1905 को बंगाल विभाजन की घोषणा हुई।
  • 16 अक्टूबर, 1905 को बंगाल के विभाजन की औपचारिक घोषणा हो गई
  • इस दिन को आंदोलनकारियों की ओर से शोक दिवस के रूप में मनाया गया।
  • वंदे मातरम गाते हुए नंगे पांव पदयात्रा भी निकाली गई।
  • पूरे बंगाल में इस दिन को रविंद्र नाथ टैगोर की ओर से राखी दिवस मनाया गया और एक-दूसरे को राखी बांधी गई।

स्वदेशी आंदोलन का आगाज

  • स्वदेशी आंदोलन को बंग-भंग आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है।
  • बंगाल विभाजन के अगले ही दिन सुरेंद्र नाथ बनर्जी और आनंद मोहन बोस के नेतृत्व में दो विशाल जनसभाएं हुईं।
  • स्वदेशी आंदोलन और बहिष्कार आंदोलन का बिगूल फूंक दिया गया।
  • एक ही दिन में 50 हजार रुपये भी जमा कर लिये गये।

स्वदेशी आंदोलन के दौरान गतिविधियां

  • उदारवादियों द्वारा चलाये गये आंदोलन का कोई परिणाम नहीं निकलने पर स्वदेशी आंदोलन पर वर्ष 1905 के बाद उग्र विचारधारा वाले नेताओं का कब्जा हो गया।
  • सरकार की ओर से दमक की कार्रवाई शुरू हुई, जिसके तहत वंदे मातरम गाने पर रोक लगा दिया गया। सार्वजनिक सभाओं पर भी सरकार ने प्रतिबंध लगा दिये।
  • पूरे बंगाल में जनसभाएं शुरू हो गईं। लाला लाजपत राय, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, विपिनचंद्र पाल और अरविंद घोष ने सभाओं में स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने की अपील करनी शुरू कर दी।
  • जिन दुकानों में विदेशी वस्तुएं बेची जा रही थीं, उनके बाहर धरने दिये जाने लगे।
  • विदेशी वस्तुओं की होली भी जलाई जाने लगी।
  • सरकारी कार्यालय, स्कूल, काॅलेज और उपाधियों तक का बहिष्कार किया जाने लगा।
  • अरविंद घोष ने साफ कह दिया कि राजनीतिक स्वतंत्रता ही राष्ट्र के जीवन की सांसें हैं।
  • धोबियों ने विदेशी कपड़े धोने से मना कर दिया।
  • ब्राह्मण विदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल वाले धार्मिक समारोहों का बहिष्कार करने लगे।
  • बारीसल में अश्विनी कुमार दत्त के नेतृत्व में स्वदेशी बंधब समिति ने इस आंदोलन के दौरान लोगों में राजनीतिक जागरुकता फैलाई।

स्वदेशी आंदोलन के आर्थिक प्रभाव

  • विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के कारण स्वदेशी वस्तुओं की मांग बढ़ने से भारतीयों का व्यवसाय चल निकला और वे आर्थिक दृष्टि से मजबूत होने लगे।
  • लघु और कुटीर उद्योगों को स्वदेशी आंदोलन की वजह से प्रोत्साहन मिलना शुरू हो गया। इससे इनकी संख्या तेजी से बढ़ने लगी। साबुन, स्वदेशी वस्त्र, घरेलू उपयोगी की वस्तुओं आदि का निर्माण अपने ही देश में होने लगा।
  • भारतीय ने अपनी खुद के बैंक खोलने शुरू कर दिये। साथ ही बीमा कंपनियां भी खुलने लगीं।
  • दुकान भी खुलने लगे और भारतीय इनमें पूंजी लगाकर आर्थिक तौर पर खुद को सबल बनाने में जुट गये।
  • पार्ले जी विस्कुट का शुरू होना भी स्वदेशी आंदोलन की ही देन थी। दरअसल, 1929 में भारत में एक कंपनी की शुरुआत हुई थी, जिसने जर्मनी से बिस्कुट बनाने वाली एक मशीन खरीदी थी। पहले तो यह किसमी और ऑरेंज कैंडी नामक टाफियां बनाती थी। बाद में यह बिस्कुट भी बनाने लगी, जिसे वर्तमान में पार्ले जी बिस्कुट के नाम से सभी जानते हैं।
  • इसी दौरान प्रफुल्ल चंद्र राय की ओर से लोकप्रिय बंगाल कैमिकल स्वदेशी स्टोर की भी शुरुआत की गयी।
  • भारत से सस्ते दामों पर कच्चा माल अपने यहां ले जाकर और वापस भारत लाकर ऊंचे दामों पर बेचने के अंग्रेजों के खेल को भारतीय जनता ने समझ लिया और अपने देश में कच्चे मालों से उत्पाद करने लगे।
  • कपड़ों की मिलें, फैक्ट्रियां, दुकान, बैंक व बीमा कंपनी आदि अपने देश में ही खुलने लगे, जिससे अपनी खुद की आर्थिक स्थिति में सुधार आने लगा।

स्वदेशी आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव

  • स्वदेशी आंदोलन के तहत विभिन्न गतिविधियों जैसे कि लोकप्रिय उत्सवों का आयोजन, मेले व सभाओं आदि के जरिये राजनीतिक चेतना का प्रचार-प्रसार तेजी से होने लगा।
  • परंपरागत लोक नाट्यशालाओं के जरिये बंगाल में स्वदेशी आंदोलन ने बड़े पैमाने पर लोगों में राजनीतिक चेतना जगाई।
  • लोकमान्य तिलक की ओर से महाराष्ट्र में शुरू हुए गणपति व शिवाजी उत्सव ने भी स्वदेशी आंदोलन के तहत लोगों को राजनीतिक रूप से जागरुक बनाने का काम किया।
  • स्वदेशी आंदोलन के फलस्वरुप लोगों को यह समझ होने लगी कि आखिर राष्ट्र की उनके लिए क्या महत्ता है और इसके प्रति निष्ठा क्यों जरूरी है।
  • इस आंदोलन के कारण जो राजनीतिक चेतना फैली, उसके परिणामस्वरुप समाज में फैली जातिगत विसंगति के साथ बाल विवाह, दहेज प्रथा और शराब के सेवन जैसी सामाजिक बुराईयों से लड़ पाना आसान प्रतीत होने लगा।
  • रविंद्रनाथ टैगोर ने जो शांति निकेतन की स्थापना की, उससे प्रेरित होकर कलकत्ता में नेशनल काॅलेज के साथ अन्य शैक्षणिक संस्थान भी खुले, जिसने राजनीतिक तौर पर देशवासियों में नई समझ पैदा की और उन्हें राजनीतिक तरीके से परिपक्व भी बनाया।
  • रविंद्रनाथ टैगोर ने इसी दौरान प्रसिद्ध अमार सोनार बांग्ला नामक गीत लिखा, जो आज बांग्लादेश का राष्ट्रगान भी है।
  • महिलाओं में भी राजनीतिक चेतना आई और उन्होंने भी बढ़-चढ़कर आंदोलन में हिस्सा लेना शुरू कर दिया।

उम्र विद्रोह एवं स्वतंत्रता आंदोलन

  • राष्ट्रवादी विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए उग्र दलों के नेताओं ने समाचारपत्रों के प्रकाशन के साथ उत्सवों का आयोजन शुरू कर दिया। लोकमान्य तिलक की ओर से अंग्रेजी में मराठा तो मराठी में केसरी नामक अखबार निकाले गये।
  • तिलक ने ही 1895 में शिवाजी उत्सव का आयोजन शुरू करवाया।
  • अखबारों, पत्रिकाओं और उत्सवों के जरिये भारतीयों के बीच यह संदेश दिया जाने लगा कि आजादी के लिए तकलीफें सहने के साथ बड़े बलिदानों के लिए भी तैयार रहना पड़ेगा।
  • स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव अखिल भारतीय स्तर पर हुआ। विशेषकर युवाओं के बीच जागृति फैली और उग्रराष्ट्रवाद से प्रभावित होकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में कूदना शुरू कर दिया। अंग्रजों द्वारा किये जाने वाले अमानवीय बर्ताव भी उन्हें डिगा नहीं सके।

निष्कर्ष

बंगाल के विभाजन के परिणामस्वरुप जो स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ, उसके बारे में यदि यह कहा जाए कि इसने भारत की आज़ादी की घड़ी को और नजदीक ला दिया, तो यह अतिशयोक्ति बिल्कुल भी नहीं होगी, क्योंकि यह आंदोलन उस वक्त हर भारतीय यह एहसास दिलाने में सफल रहा कि देश को आजाद कराने में वे किस तरह से अपना योगदान दे सकते हैं। इससे लोगों ने स्वदेशी के महत्व को समझा और आर्थिक दृष्टि से मजबूत बनकर गुलामी की दासता से मुक्त होकर आजाद भारत में सांस लेने का सपना भी देखने लगे। स्वदेशी आंदोलन में जनता की बढ़ती भागीदारी को देखकर स्वतंत्रता आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे नेताओं में भी नई जान आ गई और अपना सर्वस्व न्योछावर करने की भावना के साथ वे और तन-मन से देश को आजाद कराने की लड़ाई में जुट गये। क्या आपको नहीं लगता कि स्वदेशी आंदोलन की जरूरत आज भी है, ताकि स्वदेशी वस्तुओं को अपनाकर हम अपने देश को आर्थिक रूप से और मजबूत एवं आत्मनिर्भर बना सकें?

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