गुप्तोत्तर काल के इतिहास के कुछ ऐसे तथ्य जो शायद ही आपको पता होंगे

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Post-Gupta Period

इतिहास की प्रवृति उत्थान और पतन की रही है। यही प्रवृति गुप्त वंश की भी दिखाई देती है। ५वीं शताब्दी यानि ५५० ई॰पू॰ तक गुप्त साम्राज्य के सूरज का अस्त हो गया था। गुप्त साम्राज्य के अंतिम वंशज स्कंदगुप्त का शासन हूणों के साथ आक्रमण करते हुए बीत गया और यहीं से गुप्त शासन के अंत की शुरुआत मानी जा सकती है। हालांकि स्कंदगुप्त के बाद उसके उत्तराधिकारियों ने ५५० ई.पू. तक शासन किया था लेकिन इस बात के न तो कोई ऐतिहासिक प्रमाण हैं और न ही प्रलेखों में कुछ मिलता है।

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गुप्त्तोत्तर काल (Post-Gupta Period):

गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद भारत की राजनीति और भौगोलिक सीमाओं के टुकड़े होने शुरू हो गए थे। इस समय गुप्त शासन में एकजुट हुई राजनीतिक शक्ति के प्रतीक विभिन्न सामंतों और शासकों ने स्वयंभू शासक घोषित करके अपनी स्व्घोषित स्वतन्त्रता प्राप्त कर ली। इसके साथ ही गुप्त वंश से जुड़े कुछ राजनीतिक अधिकारियों ने अवसर का लाभ उठाते हुए अपने-अपने वंश की स्थापना करने का प्रयास किया जिसे उत्तरगुप्त वंश शासकों के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त गुप्त शासक के पतन के बाद प्रमुख रूप से भारत में पाँच राजनैतिक शक्तियों का उदय दिखाई देता है। इन शक्तियों को हूण, मौखरि, मैत्रक, पुष्यभूति और गौड़ के रूप में दिखाई देती हैं।

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उत्तरगुप्त वंश:

गुप्त वंश की पताका गिरने के बाद मगध और मालवा क्षेत्रों में उत्तरगुप्त वंश ने लगभग दो शताब्दियों तक शासन किया था। इस वंश क्रम में कृष्णगुप्त के बाद हर्षगुप्त, जीवितगुप्त, कुमारगुप्त, दामोदर गुप्त, महासेनगुप्त, माधवगुप्त, आदित्यसेन आदि विभिन्न शासकों का उल्लेख मिलता है।

मैत्रक:

गुप्तकाल के एक सैनिक अधिकारी भट्टार्क और उसके उत्तराधिकारियों ने सौराष्ट्र में अपना शासन स्थापित कर लिया। बौद्ध धर्म के अनुयायी मैत्रक वंश के शासक शिक्षा और वाणिज्य के विस्तार में सफल हुए थे। यह वंशज अरब शासकों को भारत से दूर रखने में सफल हुए थे।

हूण:

कुमारगुप्त के शासनकाल में सबसे पहले मध्य एशिया से हूण प्रजाति का आगमन हुआ था। गुप्त साम्राज्य के कुमारगुप्त और स्कंदगुप्त ने हूणों को भारत सीमा से बाहर रखा था। लेकिन इस वंश के समाप्त होते ही तीस वर्ष के अंदर हूणों ने भारत को जीत कर कम समय के लिए राज्य कर लिया। उत्तर भारत में सफलतापूर्वक राज्य करते हुए ५३० ई.पू. के पास अंतिम हूण शासक मिहिरकुल, यशोवर्मन द्वारा पराजित हो गया।

मौखरि:

गुप्त साम्राज्य के एक सामंत हरिवर्मा ने मौखरि वंश की नींव रखते हुए कन्नौज को अपना केंद्र बनाते हुए अच्छी तरह से राज्य किया था। इस वंश का अंतिम शासक ग्रहवर्मा अंतिम शासक सिद्ध हुआ क्यूंकी इसकी मृत्यु के बाद मौखरि वंश समाप्त हो गया था।

पुष्यभूति:

दिल्ली के उत्तरी भाग में पुष्यभूति नाम के सामंत ने अपना साम्राज्य स्थापित किया था। पुष्यभूति वंश का शासक हर्षवर्धन एक प्रमुख शासक के रूप में सामने आया था। इसने बहुत कुशलता से अपने समकालीन सामंतों पर विजय प्राप्त करते हुए समूचे उत्तर भारत को अपने अधीन कर लिया था।

गौड़:

हर्षवर्धन के समकालीन गौड़ शासकों ने बंगाल पर थोड़े समय ही राज्य किया था। इस वंश के अंतिम शासक शशांक की हर्षवर्धन ने अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए करी थी।

हर्षवर्धन:

हर्षवर्धन के बारे में विभिन्न प्रलेखों जैसे बाणभट्ट के हर्षचरित, हयेंसांग संस्मरण और विभिन्न प्रलेखों और सिक्कों के माध्यम से पता चलता है।

हर्षवर्धन के पिता प्रभाकरवर्मन पुष्यभूति वंश के पहले शासक थे। हर्ष को शासक बनने का मौका ६०६ ई. में मिला जब उसके भाई राज्यवर्धन जो थानेशवर (हरियाणा) के शासक थे और उनकी गौढ़ शासक शशांक ने हत्या कर दी थी। हर्ष ने इस घटना की बदला लेते हुए अपनी बहन जो मौखरि शासक ग्रहवर्मा की पत्नी थी और मालवा के राजा देवगुप्त द्वारा अपने पति की हत्या के बाद विंध्य के जंगलों में जीवनयापन कर रही थी, को बाहर लाकर कन्नौज अपने राजग्रह में शासन सौंप दिया था। इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से हर्ष ने कन्नौज पर शासन किया था।

इसके अलावा हर्ष ने पंजाब, बंगाल, मिथिला और उड़ीसा जैसे उत्तरी भारत भी अपनी राज्यसीमा में मिला लिए थे। हर्ष ने कुशलतापूर्वक लगभग पूरे उत्तर भारत पर शासन करते हुए अपने राज्य को शिक्षा, धर्म, व्यापार और सैन्य शक्ति को मजबूत कर दिया था। एक विद्वान और साहित्यकार होने के कारण हर्ष के राज्य में बाणभट्ट और मयूर राजकीय सम्मान प्राप्त कवि थे। कहते हैं हर्ष ने न केवल भारत बल्कि नेपाल और कश्मीर तक शासन किया था।

सामंतवाद:

गुप्त वंश के अवसान के निकट समनटवाद प्रथा ने जन्म ले लिया था। इस समय सामाजिक व्यवस्था वर्ण व्यवस्था के अनुरूप हो गई थी, लेकिन यह व्यवस्था स्थितीनुरूप थी। जहां वैश्य कृषक और कृषक शूद्र का जीवन और व्यवसाय अपनाने के लिए मजबूर थे। इस समय जिस नए सामाजिक ढांचे का उदय हुआ उसे सामंतवाद कहा जाता है। इसके अंतर्गत राजा अपने विश्वस्त और चुने हुए अधिकारियों को भूदान करता था। ये अधिकारी जागीरदार के रूप में अपनी सुरक्षा के लिए सेना रखते थे। राजा की इस कृपा के बदले, राजा का नाम उनके हर निर्माणकार्य में, लगान पर दी हुई भूमि पर लिए गए राजस्व में चुकाना होता था। राजा के समान बलशाली लेकिन अधीनस्थ होते हुए भी कुछ सामंत अपने उपसामंत रखने लगे और सामंतवाद की कड़ी को आगे बढ़ाने लगे।

गुप्त वंश के बाद का समय केवल हर्षवर्धन के कारण उल्लेखनीय रहा है। हर्ष के शासन काल में साहित्य, धर्म और व्यापार अपने चरम सीमा पर था जो उसके अंत के साथ ही समाप्त भी हो गया था।

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