गुप्तकाल के बाद कुछ ऐसे थे सामाजिक और आर्थिक हालात

2036
Post-Gupta Period

Post Gupta Period में बहुत से सामाजिक और आर्थिक बदलाव हुए, जिससे समाज के अलग-अलग पक्ष काफी हद तक प्रभावित हुए थे। Post Gupta Period की History UPSC Exam के लिए History की तैयारी के हिसाब से बेहद महत्वपूर्ण है। इस लेख में हम आपको Post Gupta Period में Social and Economic Conditions के बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं। दरअसल, गुप्त काल में जो भूमिदान की परंपरा का आगाज हुआ था, बाद में वह विकसित होता चला गया और यही आखिरकार सामंती व्यवस्था के रूप में उभर कर सामने आया। इसकी वजह से कई सामंतीय पदों का सृजन हुआ, जिनका आधार भूमि और सैनिक शक्ति थी। इसका प्रभाव वर्ण व्यवस्था पर भी पड़ा। इसके ढांच में बदलाव देखने को मिले। परिणाम यह हुआ कि कई जातियों के उद्भव का मार्ग प्रशस्त हो गया।

ह्वेनसांग का विवरण

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने जो यात्रा विवरण लिखा है, उसमें उसने बताया है कि भारतीयों का रहन-सहन कैसा था। उनके रीति-रिवाज किस तरह के थे। पहले तो यह देश सिंधु के नाम से ही जाना जाता था, मगर कालांतर में इंदु यानी कि हिंद कहलाने लगा। ह्वेनसांग ने जातियों में देश के विभक्त होने के बारे में लिखा था, जिसमें उसने ब्राह्मणों की ख्याति उनकी पवित्रता एवं साधुता की वजह से होने एवं इस देश को ब्राह्मणों का देश होने की बात लिखी थी। यही नहीं, समाज के चार वर्णों में बंटे होने का उल्लेख करते हुए ह्वेनसांग ने समाज में ब्राह्मणों का सम्मान होने और उपाध्याय व आचार्य आदि कहकर उन्हें संबोधित किये जाने की बात भी अपने यात्रा वृत्तांत में लिखी थी। अध्ययन-अध्यापन के साथ यजन-याजन को ही ह्वेनसांग ने ब्राह्मणों का प्रमुख कार्य बताया था और सामाजिक अस्थिरता के इस काल में व्याप्त होने एवं बाह्य आक्रमणों के डर की बात भी लिखी थी। ह्वेनसांग के विवरण में बताया गया है कि अन्य व्यवसायों में भी ब्राह्मण लग गये थे और खेती तक करने लगे थे।

चालुक्य नरेश कुमारपाल का लेख

चालुक्य नरेश कुमारपाल का लेख जो कि 1144 ईस्वी का है, उसमें ब्राह्मणों के व्यापार करने का भी उल्लेख मिलता है। इसमें बताया गया है कि वेदज्ञ ब्राह्मण को मनुस्मृति के टीकाकार मेधातिथि की ओर से सेनापति एवं राजपद जैसे पदों को स्वीकार करने की अनुमति प्रदान की गई थी। इसी काल में राजपूतों के अभ्युदय की जानकारी मिलती है, जिन्हें कि क्षत्रिय माना जा सकता है। भले ही राजपूत योद्धा हुआ करते थे, मगर अन्य साधनों को भी वे जीविका के लिए अपनाया करते थे। एक वर्ग जहां क्षत्रियों का राजा था तो वहीं दूसरा वर्ग सामंत भी था। दूसरे वर्ग में वे लोग शामिल थे, जो खेती करके, व्यापार करके और शिल्प आदि से जुड़कर अपनी आजीविका अर्जित कर रहे थे। विशेषकर वैश्य वर्ग के लोगों का गुजारा तो खेती करके, पशुओं को पालकर और व्यापार आदि करके ही हो रहा था। हालांकि, Post Gupta Period में खेती करने और पशुपालन जैसे काम का उन्होंने त्याग कर दिया था। अब वे व्यापार से जुड़ गये थे। व्यापारियों के पास अच्छी-खासी संपत्ति हो गई थी। राजकीय पदों पर भी इन्हें नियुक्त किया जा रहा था।

पाराशर स्मृति का विवरण

पाराशर स्मृति में यह उल्लेख मिलता है कि सूद पर भी ये रुपये दिया करते थे। वैश्यों ने अहिंसा के सिद्धांतों के प्रभाव, जिन्हें कि बौद्ध-जैन और वैष्णव धर्म में प्रतिपादित किया गया था, के जरिये सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने की ठान ली थी और यह वजह रही थी कि कृषि और पशुपालन से विमुख होकर उन्होंने अपनी आजीविका का साधन व्यापार को ही बना लिया था। इस तरह से व्यापारी वर्ग की ताकत बहुत बढ़ गई थी। इसी कारण से गुजरात के कई व्यापारियों से चालुक्य नरेशों के संघर्ष की भी नौबत आन पड़ी थी। जाहिर सी बात है कि ऐसा व्यापारियों के अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाये बिना नहीं हुआ होगा। राजा के मंत्रिपरिषद तक में बड़ी संख्या में व्यापारियों को प्रवेश मिलने लगा था।

Post Gupta period में शूद्रों की स्थिति

Post Gupta Period की History पर नजर डालते हैं तो शूद्रो की आर्थिक स्थिति में इस दौरान सुधार देखने को मिलते हैं। मेधातिथि ने बताया है कि देवल और पाराशर जैसे स्मृतिकारों की ओर से भी शुद्रों को कृषि, पशुपालन और वाणिज्य के साथ किसी भी तरह के व्यवसायों को अपनाने की छूट दे दी गई थी। हालांकि, शूद्रों की आर्थिक स्थिति सुधरने एवं धार्मिक क्षेत्र में उन्हें कुछ अधिकार मिलने के बावजूद उनकी सामाजिक स्थिति में ज्यादा बदलाव देखने को नहीं मिले। जिस लोकधर्म का उदय पुराणों में हुआ, उसी का अनुसरण शूद्रों द्वारा करने का उल्लेख मिलता है। इस काल में अस्पृश्यता में वृद्धि देखने को मिलती है। अब चांडालों के साथ नट, धोबी, वरूड, चमार, धीवर, कैवर्त, भेद और भिल्ल जातियों को भी स्मृतियों में अस्पृश्य मान लिया गया था। इन जातियों की संख्या पुराणों में अठारह तक पहुंच गई थी। हालांकि, विवाह के वक्त, या फिर देवयात्रा, यज्ञोत्सव या फिर देश पर बाहरी आक्रमण जैसे समय में अस्पृश्यता की भावना नहीं रखी जाती थी।

स्त्रियों की दशा

इस काल में स्त्रियों की दशा और बिगड़ी, क्योंकि उन्हें शिक्षा से वंचित करने के साथ-साथ 8 से 10 वर्ष की आयु में ही कई स्मृतिकारों एवं निबंधकारों द्वारा उनका विवाह करने की घोषणा की गई। हालांकि, ब्राह्मण एवं क्षत्रिय आदि वगों में कई स्त्रियां विदुषी भी होती थीं जैसे कि सुंदरी, अवंति और लीलावती आदि। माता-पिता ही बेटियों का विवाह तय करते थे। कुछ उच्च वर्ग में स्वयंवर का प्रचलन था। अन्तर्जातीय विवाह 10वीं शताब्दी तक चलता रहा, मगर बाद में यह कम होते-होते लुप्त ही हो गया। जहां शंखलिखित, विज्ञानेश्वर, पाराशर, अंगिरा, अपरार्क और हरित द्वारा सतीप्रथा की प्रशंसा की गई, वहीं मेधातिथि ने आत्महत्या करार दिया और वेदों में इसके वर्जित होने का हवाला दिया। उस वक्त समाज में वेश्यावृत्ति व कन्याहरण जैसी कुप्रथाएं भी देखने को मिली थीं।

निष्कर्ष

Post Gupta Period में Social and Economic Conditions के बारे में यहां विस्तार से आपने पढ़ा। UPSC Exam के लिए History की तैयारी करते वक्त यह आपके काम आयेगी, क्योंकि Post Gupta Period को लेकर अक्सर सवाल पूछे जाते हैं।

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