कहानी भारतीय हॉकी की ओलम्पिक यात्रा की

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Indian hockey Olympics


दोस्तों 5 अगस्त 2021 को जब भारतीय हॉकी टीम जर्मनी के साथ ब्रॉन्ज़ मेडल के लिए खेल रही थी। तब पूरे देश की नजर टीवी स्क्रीन पर गढ़ी थी और सभी के ज़ेहन मे एक ही गीत गूंज रहा था – “चक दे, चक दे इंडिया”। मैं यक़ीन के साथ कह सकता हूँ कि भारतीय टीम की जर्मनी को हराकर ब्रॉन्ज़ पदक जीतने की ख़ुशी, उसके ओलम्पिक मे गोल्ड पदक जीतने सरीख़ी ही रही होगी। आज के इस लेख मे मैं भारत हॉकी के उस स्वर्णिम इतिहास को आपके सामने रखने जा रहा हूँ , जिसने भारत को विश्व पटल पर पहचान दिलाने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि आज आपको अपने इस प्रश्न का उत्तर तो अवश्य मिल जायेगा आखिर भारत का राष्ट्रीय खेल “हॉकी” क्यों हैं। साथ मैं जानेंगे कि कैसे ओलम्पिक मे धन एकत्रित करके पहुंचने वाला यह देश स्वर्ण जीतकर चमत्कार करता है। तो चलिए दोस्तों शुरू करते हैं आज का यह लेख “कहानी भारतीय हॉकी की ओलम्पिक यात्रा की “

इस लेख मे हम आपके लिए लाये हैं –

  • ऐसे शुरू हुआ भारतीय हॉकी टीम का ओलम्पिक सफर.
  • जब ब्रिटेन को ओलम्पिक से लेना पड़ा था नाम वापिस.
  • ऐसे लिखा गया 1928, एम्स्टर्डम ओलम्पिक का स्वर्णिम इतिहास.
  • 1932 लॉस एंजिलिस ओलंपिक का सफर.
  • कहानी बर्लिन ओलम्पिक 1936 की.
  • कहानी भारतीय हॉकी टीम की ओलम्पिक यात्रा की.
  • 1956 मेलबर्न ओलम्पिक में लगाया स्वर्ण का छक्का.
  • 1964 टोक्यो ओलम्पिक में फिर से  की स्वर्णिम वापसी. 
  • 1980 मॉस्को ओलम्पिक में 8वी बार बने हॉकी के बेताज बादशाह.
  • 2020 टोक्यो ओलम्पिक में की कांस्य के साथ वापसी.
  • खेल के प्रति हमेशा निष्ठावान एवं भेदभाव रहित रहे ब्रिटिश.
  • कोलकाता की हमेशा ऋणी रहेगी भारतीय हॉकी.

ऐसे शुरू हुआ भारतीय हॉकी का ओलम्पिक सफर

  • भारत मे हॉकी का सफर ब्रिटिश हुकूमत के साथ शुरू हुआ था। उस समय हॉकी और फुटबॉल अंग्रेजों के प्रिय खेल हुआ करते थे। चूँकि भारत उस समय गुलाम था। इसी वजह से भारत में हॉकी लोकप्रिय हो गया था।
  • पुरुष हॉकी को 1920, एंटवर्प ओलम्पिक मे शामिल किया गया था। उस साल ग्रेट ब्रिटेन ने इसमें गोल्ड मेडल जीता था। उसके बाद 1924, पेरिस ओलम्पिक से हॉकी को हटा दिया गया था।शायद इसका कारण कम देशों के द्वारा हॉकी खेला जाना रहा होगा।
  • भारत मे ध्यानचंद और अन्य ब्रिटिश खिलाडियों के कारण हॉकी की लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी। उस समय भारतीय हॉकी संघ ने विश्व ओलम्पिक संघ को आग्रह करके हॉकी को 1928 ,एम्स्टर्डम ओलम्पिक के लिए लिस्ट करा लिया गया था।
  • हॉकी को ओलम्पिक मे लिस्ट करने के पश्चात् भारतीय हॉकी संघ के सामने यह समस्या खड़ी हो गयी कि पूरे देश से सर्वश्रेष्ठ खिलाडियों का चयन कैसे किया जाये।
  • भारतीय हॉकी संघ ने इसका उपाय निकलते हुए, राष्ट्रीय स्तर की हॉकी चैंपियनशिप आयोजित की थी। उस समय यह आयोजन बंगाल हॉकी संघ के तत्वाधान मे कोलकाता मे किया गया था।
  • इस चैंपियनशिप मे पंजाब, यूपी (संयुक्त प्रांत), बंगाल, राजपूताना और सेंट्रल प्रोविंस आदि हॉकी संघों ने अपनी-अपनी टीम भेजी थी। इस चैंपियनशिप का फाइनल मुकाबला यूपी (संयुक्त प्रांत) और राजपूताना के बीच खेला जिसमे यूपी (संयुक्त प्रांत) ने 3-1 से जीत हासिल की थी।
  • इस हॉकी चैंपियनशिप के बाद भारत के सर्वश्रेठ 15 खिलाड़ियों की एक टीम बनायीं गयी , जिसमे ध्यानचंद भी शामिल थे।
  • 10 मार्च 1928 को 15 सदस्यीय भारतीय हॉकी टीम जयपाल सिंह के नेतृत्व मे मुंबई से  “केसर-ए-हिन्द” जहाज से  इंग्लैंड के लिए रवाना हुई थी।
  • भारतीय टीम मे जयपाल सिंह, सईद युसूफ, रिचर्ड एलन, माइकेल गेटले, विलियम गुडसीर, लेसली हेमंड, फरोज़ खान, माइकल रॉक, खेरसिंह, ब्रूम पिन्नीगर, रेक्स नोरिस, जॉर्ज मार्थिवंस, फ्रेडरिक सीमैन, शौकत अली और ध्यानचंद आदि खिलाड़ी शामिल थे।
  • उस समय हॉकी टीम की हौसला आफजाई के लिए केवल तीन व्यक्ति ही सीपोर्ट पर आये थे , जिसमे भारतीय हॉकी संघ के अध्यक्ष बर्न मुर्डोक, उपाध्यक्ष चार्ल्स न्यूहैम और बंगाल हॉकी संघ के संस्थापक एस भट्टाचार्य शामिल थे।

जब ब्रिटेन को ओलम्पिक से लेना पड़ा था नाम वापिस

  • भारतीय हॉकी टीम 30 मार्च 1928 को इंग्लैंड पहुंची थी।  यहाँ भारतीय टीम के इंग्लैंड की हॉकी टीम के साथ 11 अभ्यास मैच होने थे। जिससे की भारतीय हॉकी टीम यूरोप के हॉकी मैदानों के साथ अभ्यस्त हो जाये।
  • भारतीय टीम ने इंग्लैंड मे उसी के खिलाफ अभ्यास मैचों मे जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए पूरे 9 मैचों मे जीत हांसिल की थी। 1 मैच मे भारतीय टीम की हार तथा 1 मैच टाई रहा था।
  • भारतीय टीम के इस जबरदस्त प्रदर्शन ने इंग्लैंड के हॉकी इतिहास को हिला कर रख दिया था। तब इंग्लैंड के अधिकारियों ने रातों-रात ग्रेट ब्रिटेन हॉकी के ओलम्पिक मे भाग न लेने का फैसला किया था। उन्हें यह डर था कहीं उनके अधीन देश (भारतीय टीम) ने ओलम्पिक के दौरान उनकी टीम को हरा दिया तो विश्व पटल पर उनकी साख को बट्टा लग जायेगा।
  • ध्यानचंद अपनी पुस्तक गोल मे यहाँ भी इंग्लैंड के खेल के प्रति भेदभाव रहित व्यवहार और खेल भावना की प्रशंसा करते हैं। अगर ब्रिटिशर चाहते तो भारत को यहीं पर रोक कर ओलम्पिक मे नहीं जाने दे सकते थे , क्योकि भारत उनका गुलाम देश था। वो जो चाहे निर्णय ले सकते थे या वो भारत और इंग्लैंड की मिलीजुली टीम को ओलम्पिक मे भेज सकते थे। लेकिन उन्होंने खेल भावना को आगे रखते ओलम्पिक मे न खेलने का निश्चय किया था।

ऐसे लिखा गया 1928, एम्स्टर्डम ओलम्पिक का स्वर्णिम इतिहास

  • एम्स्टर्डम ओलम्पिक, 1928  कुल 9 देशों की हॉकी टीम ने भाग लिया था। भारत के ग्रुप मे ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, बेल्जियम और स्विट्ज़रलैंड आदि टीम शामिल थी।
  • 17 मई 1928 को भारत ने अपना ओलम्पिक इतिहास का पदार्पण मैच ऑस्ट्रिया की टीम के खिलाफ साथ खेला था। इस मैच मे भारत की टीम ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए ऑस्ट्रिया की टीम को 6-0 से मात दी थी। भारत की तरफ से ध्यानचंद ने 3 गोल दागे थे।
  • अपने विजयी आगाज को जारी रखते हुए भारत ने अगले मैच मे बेल्जियम को 9-0 से धूल चटाई थी। इस मैच मे भारत के लिए शौकत अली ने 5 गोल दागे थे।
  • भारत ने अपने तीसरे मैच मे डेनमार्क को 5-0 से मात दी थी। इस मैच मे हॉकी के जादूगर ध्यानचंद ने 3 गोल किये थे।
  • अपने आंखरी ग्रुप मैच मे भारत का सामना स्विट्ज़रलैंड के साथ था। भारत ने अपना विजयी अभियान जारी रखते हुए स्विट्ज़रलैंड को 6-0 से पराजित किया था। इसी के साथ ही भारत अपने ग्रुप मे टॉप मे रहते हुए सीधे फाइनल मे प्रवेश कर गया था।
  • 26 मई 1928 को भारतीय हॉकी टीम का स्वर्णिम इतिहास लिखा जाने वाला था। इस दिन भारत का गोल्ड मेडल के लिए नीदरलैंड के साथ मैच था। भारत ने अपने अपराजेय सफर को जारी रखते हुए 3-0 से गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया। इस मैच मे ध्यानचंद ने 2 गोल किये थे।
  • एम्स्टर्डम ओलम्पिक 1928 भारत के लिए काफी मायनो मे यादगार रहा था। इस ओलम्पिक मे भारत अपराजेय रहा था, उसके खिलाफ कोई भी टीम एक भी गोल नहीं कर पायी थी।
  • इस ओलम्पिक मे खेले गए 18 मैचों मे कुल 68 गोल हुए थे। जिसमे से भारतीय टीम ने 29 गोल किये थे। इस ओलम्पिक मे सबसे ज्यादा गोल करने का रिकॉर्ड मेजर ध्यानचंद के नाम रहा था, उन्होंने सर्वाधिक 14 किये थे।
  • जब भारतीय टीम गोल्ड के साथ मुंबई सीपोर्ट मे उतरी थी। उस समय वहाँ हज़ारों की भीड़ ने उनका भव्य स्वागत किया था।

1932 लॉस एंजिलिस ओलंपिक का सफर

  • लॉस एंजिलिस ओलंपिक मे 4–11 अगस्त के बीच हॉकी के मैचों का आयोजन किया गया था। इस बार ओलम्पिक मे केवल 3 टीम जापान, अमेरिका और भारत ही भाग ले रही थी।
  • भारत ने अपने शुरुवाती मैचों मे जापान  को 11-1 तथा अमेरिका को 9-2 से पराजित किया था।
  • गोल्ड मेडल के लिए भारत का सामना अमेरिका के साथ हुआ था। इस मैच मे भारत ने 24-1 से अमेरिका को बुरी तरह से रौंद कर गोल्ड अपने नाम किया था। यह ओलम्पिक इतिहास की सबसे बड़ी जीत थी।
  • फ़ाइनल मुकाबले मे ध्यानचंद ने 8 गोल तथा उनके भाई रूप सिंह ने 10 गोल किये थे। इस प्रकार से इस ओलम्पिक मे भारत ने अपना स्वर्णिम विजय का सफर जारी रखा था।

कहानी बर्लिन ओलम्पिक 1936 की

  • यह ओलम्पिक भारतीय हॉकी इतिहास और हॉकी के जादूगर ध्यानचंद दोनों के लिहाज से बहुत खास रहा था। इस ओलम्पिक मे भारतीय हॉकी टीम मेजर ध्यानचंद के नेतृत्व मे ओलम्पिक मे उतरी थी।
  • बर्लिन  ओलम्पिक में कुल 11 टीमों ने भाग लिया था। भारत को जापान, अमेरिका और हंगरी के साथ ग्रुप A में रखा गया था।
  • भारत ने अपने ओलम्पिक में अपराजेय रिकॉर्ड को कायम रखते हुए, हंगरी को 4-0, अमेरिका को 7-0 और जापान को 9-0 से पराजित करके सीधे सेमीफाइनल में प्रवेश किया था।
  • सेमी -फाइनल में भारत का मुकाबला फ्रांस के साथ था। भारत ने अपने चिर-परिचित अंदाज में शुरुआत करते हुए 10-0 से फाइनल में प्रवेश लिया था।
  • फाइनल मुकाबले में भारत का सामना ओलम्पिक मेजबान जर्मनी के साथ होना था। फाइनल के लिए 15 अगस्त 1936 का दिन चुना गया था। यही वह दिन था जब भारत ने हिटलर के सामने जर्मनी को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था।
  • भारत ने सधी हुई शुरुआत करते हुए ध्यानचंद और रूप सिंह की जुगलबंदी की बदौलत जर्मनी को 8-1 से हराया। ध्यानचंद ने इस मैच में 4 गोल किये थे।
  • वाकई में सही मायनो में 15 अगस्त की तारीख भारत की स्वतंत्रता से पहले ही एक ऐतिहासिक तारीख बन गयी थी। ब्रिटिश उपनिवेश भारत ने उस समय ब्रिटेन को मानसिक तौर पर हिटलर के खिलाफ एक विजय प्रदान की थी।
  • बर्लिन ओलम्पिक में भारतीय हॉकी टीम ने गोल्ड मेडल की हैट्रिक पूरी की थी। फाइनल मे जर्मनी को हराया था, और सबसे बड़ी बात उस समय के मशहूर तानाशाह अडोल्फ हिटलर को ध्यानचंद का खेल देखने को मैदान पर आने को मजबूर किया था।
  • बर्लिन ओलम्पिक के फाइनल मैच मे जर्मनी के खिलाफ ध्यानचंद और उनके भाई रूपसिंह ने फिसलने डर से जूते उतार दिये थे। इस मैच के दौरान ध्यानचंद का एक दाँत जर्मन टीम के गोलकीपर के साथ टकराने से टूट गया था।
  • अडोल्फ हिटलर ने ध्यानचंद की खेल भावना का सम्मान करते हुए उन्हें सैल्यूट किया था। हिटलर ध्यानचंद से बहुत ज्यादा प्रभावित था। ऐसा कहा जाता है कि हिटलर ने ध्यानचंद को जर्मनी से खेलने का प्रस्ताव दिया था।

1956 मेलबर्न ओलम्पिक में लगाया स्वर्ण का छक्का

  • द्वितीय विश्व युद्ध के कारण साल 1940 और साल 1944 में ओलम्पिक का आयोजन नहीं हो पाया था। साल 1948 के ओलम्पिक का आयोजन लंदन में किया गया था।
  • यह पहला अवसर था जब भारतीय हॉकी टीम एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप मे ओलम्पिक मे भाग ले रही थी। इससे पूर्व भारत ने इंग्लैंड के उपनिवेशिक देश के रूप में ही ओलम्पिक खेलों में भाग लिया था।
  • किशन लाल के नेतृत्व और आजादी के जोश से लबरेज भारतीय टीम ने फाइनल मैच में ब्रिटेन को उसी की ज़मीन पर धूल चटाते हुए 4-0 से आजाद भारत का पहला और कुल चौथा गोल्ड जीता था।
  • इस ओलम्पिक में पाकिस्तान की हॉकी टीम ने पहली बार ओलम्पिक में प्रतिभाग किया था और सेमीफइनल तक का सफर तय किया था।
  • साल 1952, हेलसिंकी, फ़िनलैंड ओलम्पिक में भारत ने के डी सिंह की अगुवाई में फाइनल मे नीदरलैंड को 6-1 से हराकर अपना पांचवा गोल्ड मेडल जीता था।
  • साल 1956, मेलबर्न ओलम्पिक में भारत ने फाइनल मे अपने चिर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान को 1-0 से हराकर स्वर्ण पदक का छक्का लगाया था। बलविंदर सिंह सीनियर की कप्तानी मे भारत ने यह कारनामा किया था।  
  • भारतीय हॉकी टीम का ओलम्पिक इतिहास मे लगातार 6 स्वर्ण पदक जीतने का रिकॉर्ड अभी तक कायम है। आज तक कोई भी टीम लगातर 6 गोल्ड मेडल नहीं जीत पायी है।

1964 टोक्यो ओलम्पिक में फिर से की स्वर्णिम वापसी

  • साल 1960 रोम ओलम्पिक भारत की हॉकी टीम के स्वर्णिम अभियान मे अवरोध उत्पन्न करके गया था। भारत अपने स्वर्णिंम सफर को जारी नहीं रख पाया था।
  • रोम ओलम्पिक के फाइनल मुकाबले मे भारत को पाकिस्तान के हाथों गोल्ड गंवाना पड़ा था। इसी ओलम्पिक मे भारत के मिल्खा सिंह ने 400 मीटर की दौड़ मे वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था और चौथे स्थान के साथ दौड़ समाप्त की थी।
  • साल 1964 टोक्यो ओलम्पिक मे भारत ने चरणजीत सिंह की कप्तानी मे अपनी पिछली ओलम्पिक हार का बदला लेते हुए फाइनल मैच मे पाकिस्तान को  मे 1-0 से हराया था। 
  • यह भारत का सातवां गोल्ड मेडल था और भारतीयों लोगों को चीन के साथ युद्ध के बाद मनोवैज्ञानिक स्तर पर सुकून प्रदान करने वाला था।

1980 मॉस्को ओलम्पिक में 8वी बार बने हॉकी के बेताज बादशाह

  • साल 1968 मैक्सिको मे भारत पश्चिमी जर्मनी को पराजित करके कांस्य पदक जीता था। यह ओलम्पिक भारत ने तृतीय स्थान के साथ समाप्त किया था। इस ओलम्पिक मे पाकिस्तान ने दूसरी बार स्वर्ण पदक जीता था।
  • साल 1972 म्यूनिख ओलम्पिक मे भारतीय टीम ने तीसरा स्थान प्राप्त किया तथा नीदरलैंड को हराकर कांस्य पदक के साथ ओलम्पिक समाप्त किया था। इस ओलम्पिक मे पहली बार पश्चिम जर्मनी ने स्वर्ण पदक जीता था और इसी के साथ पहली बार हॉकी का स्वर्ण पदक एशिया के बाहर चला गया था।
  • साल 1976 मॉन्ट्रियल, कनाडा ओलम्पिक मे भारतीय टीम का प्रदर्शन काफी निराशा जनक रहा और उसने सातवें स्थान के साथ ओलम्पिक समाप्त किया था। इस ओलम्पिक मे न्यूजीलैंड ने ऑस्ट्रेलिया को पराजित करके अपना पहला हॉकी स्वर्ण जीता था।
  • साल 1980 मॉस्को ओलम्पिक मे भारत ने अपनी खोयी हुए प्रतिष्ठा को एक बार पुनः प्राप्त करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया था।
  • इस ओलम्पिक मे भारत का नेतृत्व वासुदेव भास्करन का रहे थे। भारत ने फ़ाइनल मे स्पेन को 4-3 से हराकर अपना आठवां गोल्ड मेडल जीता था।
  • मॉस्को ओलम्पिक मे पहली बार महिला हॉकी टीम भी प्रतिभाग कर रही थी। भारतीय महिला टीम ने भी इस ओलम्पिक मे प्रतिभाग किया था। महिला वर्ग मे ओलम्पिक गोल्ड ज़िम्बाब्वे की टीम ने जीता था।

2020 टोक्यो ओलम्पिक में की कांस्य के साथ वापसी

  • टोक्यो ओलम्पिक मे भारतीय हॉकी टीम ने मनप्रीत सिंह के नेतृत्व मे 41 साल बाद भारत को ओलम्पिक मे कोई पदक दिलाया है। भारत ने इस ओलम्पिक मे जर्मनी को 5-4 से हराकर कांस्य पदक अपने नाम किया है।
  • 2020 टोक्यो ओलम्पिक का पुरुष हॉकी गोल्ड मेडल बेल्जियम के नाम रहा तथा महिला वर्ग मे नीदरलैंड ने हॉकी का गोल्ड जीता है।
  • भारतीय हॉकी का 1984 लॉस एंगेल्स से  2016 रियो ओलम्पिक तक का सफर काफी निराशाजनक और उतार-चढ़ाव भरा रहा है।
  • साल 1980 से पहले हॉकी नेचुरल ग्रास ग्राउंड पर खेली जाती थी। इसके बाद हॉकी को आर्टिफिसियल सतह यानि एस्ट्रो ट्रफ पर खेला जाने लगा था। भारतीय टीम इस तरह के मैदानों की अभ्यस्त नहीं थी साथ ही भारत मे खिलाड़ियों को शुरुआत मे इस तरह के अप्राकृतिक मैदान नहीं उपलब्ध हो पाते थे। जिस वजह से भारतीय हॉकी मे उतार का दौर शुरू हो चुका था।
  • इसके अतिरिक्त साल 2008 मे भारतीय हॉकी संघ को समाप्त करके 2009 मे हॉकी इंडिया का गठन किया गया था। हॉकी इंडिया को 2011 मे अंतर्राष्ट्रीय हॉकी संघ मान्यता मिली थी। इस घटना के कारण भी भारतीय हॉकी का खेल प्रभावित हुआ था।
  • 2020 टोक्यो ओलम्पिक मे भारतीय टीम ने मुख्य कोच ग्राहम रीड के मार्गदर्शन मे सेमीफाइनल तक का सफर तय किया। भारतीय हॉकी भविष्य के लिए यह एक सकारात्मक एवं क्रांतिकारी सफर साबित हो सकता है।
  • इस ओलम्पिक मे भारत की महिला हॉकी टीम ने मुख्य कोच Sjoerd Marijne के मार्गनिर्देशन मे झुझारू प्रदर्शन करते हुए सेमी-फाइनल तक का सफर तय किया। भारत की बेटियों ने कांस्य पदक के लिए ब्रिटेन के साथ जिस शानदार खेल का प्रदर्शन किया उसकी सराहना की जानी चाहिए। बेशक भारतीय टीम ने कांस्य गँवा दिया हो लेकिन दुंनिया के सामने यह ऐलान कर दिया है की हम लौट चुके हैं।
  • भारतीय हॉकी पुरुष और महिला दोनों टीमों के इस ओलम्पिक प्रदर्शन से एक बात स्पष्ट हो गयी है कि जल्द ही भारत के हॉकी मे स्वर्णिम दिन लौटने वाले हैं। 

खेल के प्रति हमेशा निष्ठावान एवं भेदभाव रहित रहे ब्रिटिश

  • महान हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद अपनी बुक गोल मे लिखते हैं, कि यद्यपि भारत उस समय ब्रिटिश हुकूमत का गुलाम था और वे लोग भारत की राजनैतिक और सामाजिक स्थिति पर अत्याचार कर रहे थे। किन्तु खेल के प्रति ब्रिटिश बहुत ईमानदार और निष्ठावान थे, हॉकी और अन्य खेलों के प्रति उनकी नीति रंगभेद और नस्लभेद से रहित थी।
  • ब्रिटिश हुकूमत की खेलों के प्रति उदार नीति के कारण ही एम्स्टर्डम ओलम्पिक के लिए भारतीय हॉकी टीम अंग्रेज और भारतीयों से मिलकर बनायीं गयी थी।उन्होंने बिना किसी भेदभाव के भारतीय खिलाड़ियों को हॉकी टीम मे स्थान दिया था।

कोलकाता की हमेशा ऋणी रहेगी भारतीय हॉकी

  • जब भारतीय टीम का चयन 1928, एम्स्टर्डम ओलम्पिक खेलों के लिए किया जा रहा था। उस समय भारतीय प्रत्येक खिलाड़ी को अपने किट और अन्य सामानो का इंतजाम स्वयं करना होता था।
  • इंग्लैंड के लिए रवाना होने वाले सभी खिलाड़ियों का इंतजाम पूरा हो गया था। केवल दो खिलाड़ियों के लिए आवश्यक चीज़ों का इंतजाम नहीं हो पाया था। उस समय भारतीय हॉकी संघ को लगभग 15 हज़ार रुपयों की जरुरत थी। तब कोलकाता की जनता ने यह धन एकत्रित करके भारतीय हॉकी टीम को दिया था।
  • मेजर ध्यानचंद ने अपनी पुस्तक गोल मे इस बात के लिए कोलकाता वासियों का विशेष रूप से धन्यवाद किया है। उनका मानना था कि केवल यही ऐसी घटना थी जिसने भारत को स्वर्णिम हॉकी इतिहास लिखने का मौका दिया था।

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चलतेचलते

दोस्तों मुझे उम्मीद है कि हमारे इस लेख से आपको कम से कम इस प्रश्न का उत्तर तो अवश्य मिल गया होगा कि आखिर क्यों हमारा राष्ट्रीय खेल हॉकी है। हमे गर्व है हमारे देश ने विश्व हॉकी ओलम्पिक मे 28 साल तक अजेय रहने का रिकॉर्ड बनाया। हमारे देश ने हॉकी मे सर्वाधिक 8 गोल्ड मेडल का रिकॉर्ड बनाया है। हमारे देश ने विश्व हॉकी को ध्यानचंद जैसे महान खिलाड़ी दिये, जिनके हॉकी खेल की दुनिया दीवानी थी उन्हें हॉकी का जादूगर कहा जाता था। अब भारत सरकार ने खेल रत्न पुरस्कारों का नाम मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार रखने का निर्णय किया है। इस उम्मीद के साथ की निकट भविष्य मे भारतीय हॉकी के सुनहरे दिन फिर से लौटेंगे और हम दुनिया से गर्व से कह सकेंगे लीजेंड इस बैक”, आज का यह लेख यही समाप्त करते हैं। धन्यवाद!

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