नाटो क्या है | What is NATO?

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What is NATO? जब से Russia Ukraine war की शुरुआत हुई है, तब से यह सवाल अधिकतर लोगों के जेहन में आ रहा है, क्योंकि इस युद्ध की एक बड़ी वजह नाटो को भी माना जा रहा है।

Russian invasion of Ukraine के बाद नाटो की खूब चर्चा हो रही है, क्योंकि रूस और यूक्रेन के बीच हो रहे युद्ध के लिए दुनिया के बहुत से देशों द्वारा नाटो को ही जिम्मेवार ठहराया जा रहा है। ऐसे में यह जानना बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है कि नाटो आखिर है क्या? इसके क्या उद्देश्य हैं? इसके सदस्य देश कौन-कौन से हैं और रूस यूक्रेन युद्ध के परिप्रेक्ष्य में नाटो की क्या भूमिका रही है? इस लेख में हम आपको इन सभी सवालों के जवाब देने जा रहे हैं।

What is NATO?

NATO का पूरा नाम उत्तर अटलांटिक संधि संगठन है। नाटो की स्थापना अमेरिका के वाशिंगटन में इसके 12 संस्थापक सदस्यों द्वारा 4 अप्रैल, 1949 को की गई थी। ये 12 देश अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, ब्रिटेन, आइसलैंड, बेल्जियम, पुर्तगाल, डेनमार्क, इटली, नॉर्वे, नीदरलैंड्स और लक्जमबर्ग थे। नाटो, जो कि एक अंतर सरकारी सैन्य संगठन है, इसके सदस्यों की संख्या वर्तमान में 30 है और बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में इसका मुख्यालय स्थित है।

उत्तरी अमेरिका एवं यूरोप के देशों के बीच नाटो एक सैन्य गठबंधन है। नाटो में शामिल हुआ अंतिम देश मैसिडोनिया है, जो कि वर्ष 2020 में इसमें शामिल किया गया था। इससे पहले वर्ष 2017 में मोंटेनीग्रो को नाटो की सदस्यता मिली थी। नाटो के जो 30 सदस्य देश हैं, इसका कोई भी फैसला इन सभी सदस्यों की सामूहिक इच्छा के आधार पर ही किया जाता है।

सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर यह संगठन काम करता है। इसका मतलब यह हुआ कि नाटो के एक या एक से अधिक सदस्यों पर यदि आक्रमण होता है, तो इस आक्रमण को इसके सभी सदस्य देशों पर हुआ हमला मान लिया जाता है। नाटो के अनुच्छेद 5 में यह प्रावधान किया गया है। वर्ष 2001 में 11 सितंबर को संयुक्त राज्य अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमले के बाद पहली बार इस अनुच्छेद को नाटो के संविधान में शामिल किया गया था। नाटो, चूंकि एक सैन्य गठबंधन है, ऐसे में दुनिया के सैन्य खर्च के 70% से भी ज्यादा इसके सदस्य देशों का कुल सैन्य खर्च है। बाकी यूरोपीय देशों से तुलना की जाए, तो इसमें सबसे अधिक खर्च अमेरिका अकेले करता है।

क्यों महसूस हुई नाटो के गठन की आवश्यकता?

सोवियत संघ की तरफ से वर्ष 1948 में बर्लिन की नाकेबंदी कर दी गई थी। ऐसे में जो पश्चिमी यूरोपीय पूंजीवादी देश थे, इन्हें यह भय सताने लगा था कि साम्यवाद का प्रसार अब बहुत ही तेजी से होगा। इसके बाद अमेरिका ने अगुवाई की और नाटो के नाम से एक प्रतिरक्षा संगठन का गठन किया गया, जो कि पश्चिमी यूरोपीय देशों की सुरक्षा के लिए बना था।

सोवियत संघ ने भी नाटो का जवाब दिया और उसने वारसा संधि कर ली। इससे शस्त्रीकरण को काफी प्रोत्साहन मिलने लगा। इसी का परिणाम हुआ कि सोवियत संघ और अमेरिका के बीच रिश्ते बिगड़ते चले गए और दोनों देशों के बीच तनाव में भी बढ़ोतरी होती चली गई।

NATO के उद्देश्य

किसी भी संगठन की स्थापना कुछ उद्देश्यों से की जाती है। NATO की स्थापना के पीछे भी कुछ प्रमुख उद्देश्य रहे थे, जिनका विवरण निम्नवत है:-

  • नाटो की स्थापना के सबसे प्रमुख उद्देश्य को देखें तो यह सोवियत संघ की साम्यवादी विचारधारा के पश्चिमी यूरोप में प्रसार को रोकना था।
  • सदस्य देशों के बीच एकजुटता को बढ़ाना और उनके मध्य सामंजस्य की भावना विकसित करना भी इसका एक महत्वपूर्ण उद्देश्य रहा है।
  • समुद्र में संभावित खतरों से अपने सहयोगियों के बचाव में उनकी सहायता करना NATO का उद्देश्य है।
  • राजनीतिक एवं सैन्य माध्यम से अपने सदस्य राष्ट्रों को आजादी और सुरक्षा की गारंटी प्रदान करना भी नाटो का एक प्रमुख उद्देश्य है।
  • नाटो के एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य में यूरोप में लोकतंत्र, स्वतंत्रता कानून के शासन एवं मानव अधिकारों के समान मूल्यों के आधार पर स्थाई शांति विकसित करना भी शामिल है।
  • किसी भी रूप में आतंकवाद को स्वीकार नहीं करना और नवाचार एवं अनुकूलन के साथ-साथ उपकरणों के निर्माण को बढ़ावा देते हुए वर्तमान व भविष्य के खतरों से निबटना भी NATO के सबसे प्रमुख उद्देश्यों में से एक है।
  • नाटो का यह प्रयास है कि वह अपने सदस्य देशों के इलाकों की सुरक्षा करें और जहां तक मुमकिन हो, संकट को कम करने की दिशा में समुचित कदम उठाए।
  • NATO का अंतिम, मगर महत्वपूर्ण उद्देश्य यह भी है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो नए खतरे पैदा हो रहे हैं, उनसे निबटने के लिए वह अपने सदस्य देशों को न सिर्फ सामूहिक सुरक्षा मुहैया कराएगा, बल्कि संकट की स्थिति पैदा होने पर उसका प्रबंधन करने के साथ-साथ सहकारी सुरक्षा को भी बढ़ावा देने का काम करेगा।

नाटो की जिम्मेवारियां

Russia Ukraine war की शुरुआत होने से पहले ही NATO चर्चा का केंद्र बना हुआ था। ऐसे में नाटो की जिम्मेवारियों या इसके कार्यों के बारे में भी जान लेना जरूरी है, जो निम्नवत हैं:-

  • नाटो का सबसे प्रमुख कार्य यह है कि वह सामूहिक सुरक्षा, संकट के प्रबंधन एवं सहकारी सुरक्षा सुनिश्चित करे, जिस का निर्धारण वर्तमान रणनीतिक अवधारणा (2010) के तहत किया गया है।
  • NATO का यह कार्य भी कम महत्व का नहीं है कि नई प्रौद्योगिकियों एवं नई क्षमताओं को विकसित करते हुए वह न केवल आतंकवाद की समस्या से निबटे, बल्कि आतंकवादी हमलों के परिणामों का सही तरीके से प्रबंधन भी करे।
  • शांतिपूर्ण तरीके से विवादों का निबटारा करने के लिए नाटो की ओर से राजनयिक कोशिशें की जाती हैं। यदि इन प्रयासों को नाकामयाबी हासिल होती है, तो ऐसे में संकट के प्रबंधन के लिए सैन्य ताकत का इस्तेमाल भी इसे करना पड़ता है।
  • नि:शस्त्रीकरण को बढ़ावा देना, इसके प्रसार को रोकना और हथियारों का नियंत्रण करना भी नाटो के प्रमुख कार्यों में से एक है। इस तरह से यह गंठबंधन न केवल सुरक्षा उद्देश्यों को सुनिश्चित करने की दिशा में काम करता है, बल्कि सामूहिक सुरक्षा एवं राजनीतिक अस्थिरता में भी यह अपना अहम योगदान देता है।
  • लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रोत्साहित करने के लिए नाटो वचनबद्ध है। यह अपने सदस्य देशों की समस्याओं का समाधान तो निकालता ही है, साथ में यह विश्वास पैदा करने का भी काम करता है। इसके अलावा रक्षा एवं सुरक्षा मामलों को लेकर यह परामर्श लेने और सदस्य देशों के बीच पारस्परिक सहयोग की मंजूरी भी प्रदान करता है।

Russian invasion of Ukraine और NATO की भूमिका

जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिली चुनावी जीत के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए यह कहा है कि युद्ध भले ही दो देश यानी कि रूस और यूक्रेन लड़ रहे हों, लेकिन इससे अप्रत्यक्ष रूप से पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है। यह बात बिल्कुल सही भी है, क्योंकि रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग की वजह से भारत सहित दुनिया के बहुत से देशों में महंगाई बढ़ने लगी है। ऐसे में हर कोई जंग का जल्द-से-जल्द पटाक्षेप चाहता है। इस परिप्रेक्ष्य में नाटो की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यूक्रेन का झुकाव नाटो की तरफ काफी समय से रहा है और रूस के यूक्रेन पर हमला करने के पीछे की यह भी एक बड़ी वजह रही है।

रूस यह आरोप लगाता रहा है कि यूक्रेन अपनी धरती का इस्तेमाल करने की अनुमति NATO को दे रहा है। रूस का यह भी कहना है कि यूक्रेन का पूर्वी हिस्सा, जो कि रूस के साथ बॉर्डर साझा करता है, वहां पर बड़ी संख्या में नाटो के सैनिक जमा हो गए हैं। रूस का यह आरोप है कि यूक्रेन के नाटो को अपनी जमीन का इस्तेमाल करने की अनुमति देने की वजह से रूस को खतरा हो सकता है। इसी को आधार बनाते हुए रूस ने यूक्रेन के खिलाफ जंग शुरू की है। तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक जंग का अंत होता नहीं दिख रहा है। अब जब रूस ने यूक्रेन पर जबरदस्त धावा बोल रखा है, तो ऐसे में यूक्रेन NATO से यह उम्मीद लगाए बैठा है कि वह उसे हरसंभव मदद मुहैया कराए।

और अंत में

इस लेख को पढ़कर आपको इस सवाल का जवाब मिल चुका है कि What is NATO? इस वक्त रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन झुकने के लिए तैयार नहीं दिख रहे हैं। वहीं यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की लगातार अपने देश को नो फ्लाई जोन बनाए जाने की मांग कर रहे हैं, मगर नाटो तो की तरफ से अब तक इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है। ऐसे में सवाल यह खड़ा हो रहा हैं कि जिस NATO की वजह से यूक्रेन पर यह संकट आया है और जिस नाटो पर यूक्रेन अब तक इतना भरोसा करता रहा है, क्या उसी NATO ने यूक्रेन को अकेला छोड़ देने का फैसला कर लिया है? इसका जवाब तो आने वाले वक्त में ही मिल पाएगा।

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