जानिए, क्या है Bru-Reang Refugee Agreement और क्यों पड़ी इसकी जरूरत

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Bru-Reang Refugee Agreement बीते कुछ दिनों से चर्चा में रहा है, जब से बीते 16 जनवरी को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में भारत सरकार, त्रिपुरा सरकार, मिजोरम सरकार और ब्रू-रियांग के प्रतिनिधियों के बीच नई दिल्ली में इस समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। यह चार पक्षीय समझौता दरअसल त्रिपुरा में मिजोरम के Bru-Reang Refugees को बसाने के लिए किया गया है। इस समझौते से 23 वर्षों से चली आ रही समस्या का समाधान होने जा रहा है। समझौते के फलस्वरूप करीब 34 हजार लोग त्रिपुरा में बसाये जाएंगे। इस लेख में विस्तार से हम आपको बता रहे हैं कि Bru-Reang Refugee कौन हैं और Bru-Reang Refugee Agreement क्या है?

Bru-Reang Refugee Agreement में किये गये प्रावधान

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से Bru-Reang Refugee Agreement के बारे में अलग-अलग बिंदुओं में जानकारी उपलब्ध कराई गई है। वर्ष 1997 में जातीय तनाव पैदा होने की वजह से लगभग पांच हजार Bru-Reang Refugees को मिजोरम से त्रिपुरा में शरण लेना पड़ा था। त्रिपुरा में इन्हें कंचनपुर के साथ उत्तरी त्रिपुरा में अस्थाई शिविर बनाकर रखा गया था। हालिया समझौते के मुताबिक 34 हजार 200 ब्रू-रियांग शरणार्थी त्रिपुरा में बसाये जा रहे हैं। Bru-Reang Refugee Agreement में किये प्रावधान निम्नवत् हैं:

  • त्रिपुरा में स्थाई तौर पर ब्रू-रियांग शरणार्थियों को बसाया जायेगा।
  • सभी विस्थापित परिवारों को 40×30 फीट का आवासीय प्लॉट देने का प्रावधान है।
  • आर्थक मदद हर परिवार को उपब्लध कराई जायेगी।
  • चार लाख रुपये हर परिवार को फिक्स डिपाजिट में मिलेंगे।
  • 5,000 प्रतिमाह नकद सरकार की ओर से दो वर्षों तक सभी परिवारों को मदद स्वरूप दिये जाएंगे।
  • सभी परिवारों को 2 वर्षों तक राशन नि:शुल्क मिल पायेगा।
  • इन परिवारों को डेढ़ लाख रुपये की आर्थिक सहायता घर बनाने के लिए दी जायेगी।
  • Bru-Reang Refugee Agreement के तहत भूमि की व्यवस्था त्रिपुरा सरकार की ओर से की जायेगी।
  • केंद्र सरकार की ओर से भी 600 करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता इसके लिए दी जा रही है।
  • जा अधिकार त्रिपुरा के नागरिकों को हैं, वे सभी अधिकार Bru-Reang Refugees को भी प्राप्त होंगे।
  • त्रिपुरा की मतदाता सूची में सभी ब्रू-रियांग शरणार्थियों के नाम भी शामिल होंगे।
  • केंद्र के साथ राज्य सरकार की सभी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठा ब्रू-रियांग शरणार्थी भी उठा पाएंगे।

Bru-Reang Refugees के पुनर्वास के लिए सरकार के प्रयास

जब से ब्रू-रियांग समुदाय के लोगों ने 1997 में मिजोरम से भागकर त्रिपुरा में शरण ली, तभी से भारत सरकार की कोशिश इन्हें स्थाई रूप से बसाने की रही है। त्रिपुरा पहुंचे इन्हें छ: माह ही बीते थे कि इनके लिए राहत पैकेज की घोषणा तब केंद्र सरकार की ओर से कर दी गई थी। इस राहत पैकेज के अंतर्गत हर व्यक्ति को 600 ग्राम और नाबालिग को 300 ग्राम चावल रोजाना के हिसाब से दिया जा रहा है। साथ ही कई चरणों में इनके पुनर्वास के लिए वर्ष 2014 तक मिजोरम एक हजार 622 परिवारों को वापस लाया गया था।

समय-समय पर मिजोरम सरकार की ओर से इनके पुनर्वास और इन परिवारों की देखभाल के लिए कदम उठाये जाते रहे हैं। वर्ष 2018 में तीन जुलाई को भारत सरकार, मिजोरम सरकार, त्रिपुरा सरकार एवं ब्रू-रियांग के प्रतिनिधियों के बीच विस्थापित परिवारों को दी जा रही सहायता में थोड़ी बढ़ोतरी को लेकर समझौता हुआ था। तब पांच हजार 407 परिवारों के 32 हजार 876 लोगों के लिए 435 करोड़ रुपये के राहत पैकेज का ऐलान किया गया था। इसके अलावा तब सभी परिवारों को लिए चार लाख रुपये की फिक्स्ड डिपाजिट और 5,000 रुपये प्रतिमाह दिया जाना आदि भी समझौते के तहत सुनिश्चित हुआ था। इसके अलावा मिजारम में इन्हें मतदान का अधिकार देने की भी बात हुई थी, लेकिन यह धरातल पर नहीं उतर सका था। इसकी वजह यह रही थी कि अधिकांश विस्थापितों ने मिजोरम लौटने से मना कर दिया था।

प्रयास आगे भी ब्रू-रियांग परिवारों को मिजोरम लौटाने के लिए जारी रहे, मगर सुरक्षा चिंताओं से बहुतों ने वापस जाने से मना कर दिया। बीते अक्टूबर में भी त्रिपुरा के राहत शिविरों में रह रहे करीब 35 हजार शरणार्थियों को वापस मिजोरम भेजने की प्रक्रिया शुरू की गई, पर इनमें से केवल 860 ही वापस गये। बीते दिसंबर में ब्रू-शरणार्थी मंच का त्रिपुरा सरकार से समझौता हुआ और उन्होंने फिर अपने विरोध को वापस लिया।

Who are Bru- Reang Refugee?

देश के पूर्वोत्तर में ब्रू नामक जनजाति निवास करती है। इनका फैलाव तो पूर्वोत्तर के कई इलाकों में है, लेकिन मिजोरम के मामित एवं कोलासिब जिलों में ये प्रमुखता से बसते हैं। पूर्वोत्तर भारत के अलावा इनका कुछ समूह बांग्लादेश में चटगांव के पहाड़ी इलाकों में भी निवास करता है। त्रिपुरा में भी ब्रू नाम से एक जाति समूह निवास करता है, मगर यहां इन्हें रियांग नाम से जाना जाता है। इनकी भी भाषा ब्रू ही है। वैसे, इनकी भाषा की कोई लिपि नहीं है। हालांकि, ये जहां बसे हैं, वहां की भाषा बोलते हैं। पूर्व में ब्रू समुदाय के लोग झूम खेती करते थे, जिसमें वनों के एक हिस्से को साफ करके इसे खेती करने लायक बनाया जाता है। साथ ही इनकी प्रवृत्ति बंजारों की तरह भी रही है।

क्या है ब्रू समुदाय का इतिहास?

वर्ष 1997 में ब्रू जनजाति और मिजो समुदाय के बीच हिंसक झड़प हुए थे। चूंकि ब्रू अल्पसंख्यक थे, ऐसे में उन्हें भागकर त्रिपुरा में शरण लेना पड़ा था। इन्हें शरणार्थी शिविरों में रहते हुए दो दशक से भी अधिक का वक्त बीत चुका है। लंबे अरसे से इनकी ओर से अधिकारों की मांग की जा रही थी। वैसे, म्यांमार के शान प्रांत का यह आदिवासी समूह खुद को मूल निवासी मानता है। कई सदी पूर्व ये लोग वहन से भारत आये थे और मिजोरम में बस गये थे। मिजोरम में मिजो जनजाति ब्रू समुदाय के लोगों को बाहरी के तौर पर देखती है।

निष्कर्ष

अब आपको समझ आ गया होगा कि आखिर Bru- Reang Refugee कौन हैं और Bru-Reang Refugee Agreement क्या है? ब्रू समुदाय के लोगों की सुरक्षा के लिए सरकार द्वारा किये गये इस समझौते से इनके जानमाल की सुरक्षा हो पायेगी।

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