शून्य जुताई तकनीक (Zero Tillage Technology) क्या है?

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Zero Tillage Technology

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दोस्तों, आज के समय में किसान पारम्परिक तरीकों के स्थान पर नवीन तकनीकों से खेती करके बिना मिट्टी के भी फसल उगा रहा है , वो मौसमी फल और सब्जियों को भी साल भर उगा सकता है, बिना जुताई के खेतों से बीज रोपित कर सकता है और परम्परागत खेती की तुलना में अधिक लाभ कमा सकता है, आज 21सदी में यह सब विज्ञान की मदद से संभव हो गया है। दोस्तों आज आपको बिना जुताई के खेती कैसे करें?, शुन्य जुताई किसे कहते हैं?, बिना जुताई के उन्नत उत्पादन की तकनीक क्या है? जैसे अनेक प्रश्नो के उत्तर इस लेख में मिलने वाले हैं, तो चलिए शुरू करते हैं आज का हमारा लेख  शून्य जुताई तकनीक (Zero Tillage Technology) क्या है? 

शून्य जुताई तकनीक (Zero Tillage Technology) क्या है?

मिट्टी की जुताई करने से तात्पर्य है, मिट्टी को खोदना, उलट-पलट करना और उसकी स्थायी आवरण संरचना में फेरबदल करना। चूँकि यहाँ हम जीरो जुताई तकनीक की बात कर रहे हैं, यह आसानी से अपनायी जाने वाली ऐसी तकनीक है , जिसमे हम किसी फसल की बुआई बिना खेत जुताई के की जा सकती है। शून्य जुताई तकनीक में भूमि की जुताई किये बिना ही सीधे बीज रोपित किये जाते हैं। इसमें स्थायी मिट्टी के आवरण संरचना में कोई बदलाव नहीं होता है। शून्य जुताई तकनीक में बिना जमीन की तैयारी के फसल के बीज बोए जाते हैं, और बीजों को मिट्टी में दबा दिया जाता है।

शून्य जुताई तकनीक की जरुरत क्यों हैं?

पारम्परिक तौर पर गेहूं की बुआई हेतु खेत की 5-6 बार जुताई की आवश्यकता होती है। जिसकी वजह से बुआई में देरी तथा धन की लागत बढ़  जाती है। जिससे आगे चलकर कम पैदावार, कम लाभ तथा नुकसान आदि उठाने पड़ते हैं, यदि इस बात पर गौर किया जाये तो फसल की बुआई में 10 दिन की देरी उसके प्रति हेक्टेयर उत्पादन में 30-35 किलोग्राम कम पैदावार का कारण बनती है। अब यदि परम्परागत तरीके के स्थान पर शून्य जुताई तकनीक का इस्तेमाल किया जाये तो अधिक उत्पादन, समय बचत, धन बचत उत्पादन लागत में कमी आदि लाभ लिए जा सकते हैं। इसीलिए भारत जैसे कृषि प्रधान देश में सभी कृषि क्षेत्रों में शून्य जुताई तकनीक अपनाने की जरुरत है।

जीरो टिलेज मशीन क्या है?

जीरो टिलेज मशीन आमतौर पर प्रयोग में आने वाली बीज ड्रिल जैसी ही है, किन्तु इसमें चौड़े फाल (tines) के स्थान पर पतले फाल लगे रहते हैं। ये फाल किसी भी बिना जूते हुए खेत में पतली, गहरी और लम्बी लाइन बनाते हैं जिसमे बीज और खाद या उर्वरक बारी- बारी से गिरते चले जाते हैं।  इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है की इस मशीन द्वारा पहले उर्वरक गिरता है , जोकि बीज से एक इंच नीचे गिरता है उसके ऊपर बीज गिरता है। ऐसा करने से बीज के अंकुरित होने के पश्चात उसकी जड़ों को बेहतर पोषण मिलता है। इसके साथ ही किसी भी 30-40 हॉर्स पावर वाले ट्रैक्टर द्वारा जीरो टिलेज मशीन की मदद से 1 एकड़ वाले खेत की जुताई 1 घंटे में की जा सकती है। जीरो टिलेज मशीन के लिए दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त तथा कम पानी वाली कार्बनिक एवं जीवाश्म रहित मिट्टी कम उपयोगी होती है। 

शून्य जुताई तकनीक के लाभ

जीरो टिलेज तकनीक का इस्तेमाल साल 2000 के बाद से देश के उत्तरी राज्यों में किया जाने लगा है। इसके फायदों और लाभों को देखते हुए , अब धीरे -धीरे इसका इस्तेमाल अन्य राज्यों में भी बढ़ने लगा है। आइये इस तकनीक के फायदों को विस्तार से जानते हैं।

प्रति एकड़ रुपयों की होगी बचत–  जीरो टिलेज तकनीक की मदद से पारम्परिक खेती की तुलना अधिक लाभ कमाया जा सकता है। क्योकि सामान्यतया किसी खेत में बुआई के लिए उसे 5-6 बार जोतना पड़ता है, जिससे धन, समय, मशीनरी आदि की अधिक आवश्यकता होती है। इसी के स्थान पर यदि शून्य जुताई तकनीक अपनायी जाये तो समय, पैसा और प्रति एकड़ अधिक पैदावार प्राप्त की जा सकती है, क्योकि इसमें खेत को केवल एक बार जोतने की आवश्यकता होती है।

उचित दूरी पर बीज होंगे रोपित – जीरो टिलेज तकनीक से एक व्यवस्थित क्रम में बीज और खाद ज़मीन में गिरते हैं , जिससे दो बीजों के मध्य में उचित दूरी और उनका रोपण एक पंक्ति में व्यवस्थित रूप से होता है। जब बीज उग कर बाहर निकल जाते हैं तो उनका क्रम एक पंक्ति में बहुत ही सुन्दर और व्यवस्थित दिखाई पड़ता है।

बीज के साथ खाद भी होगी रोपित- जीरो टिलेज तकनीक की सबसे खास विशेषता उसमे बीज के साथ -साथ खाद का भी वितरण हो जाता है। जिससे बीज की जड़ें निकलते ही उनका पोषण प्रारम्भ हो जाता है। इस तकनीक ने खाद को बीज से 1 इंच नीचे रोपित किया जाता है जिससे की बीज को सही और आवश्यक पोषण उचित समय में प्राप्त हो सके।

कम सिंचाई की होगी जरुरत – चूँकि जीरो टिलेज तकनीक में खेत को पहली फसल के काटने के कुछ समय बाद और बगैर जाते हुए ही इस्तेमाल किया जाता है, इस वजह से भूमि में नमी की पर्याप्त मात्रा रहती है और इस तकनीक से खेती में कम पानी की आवश्यकता रहती है।

रोगरोधी एवं पोषण युक्त होगी फसल – चूँकि जीरो टिलेज तकनीक में बीजों और खाद का रोपण साथ-साथ और उचित दूरी में किया जाता है।  अतः इससे पौधों को उचित पोषण मिलता है जिससे फसल की पैदावार बढ़ जाती है। चूँकि इस तकनीक में पौधे एक-दूसरे से उचित दूरी पर रोपित किये जाते हैं। जिससे उन्हें सूरज का तापमान, नमी, हवा और खाद सही मात्रा में मिल पाती है , जिससे उनमे रोग उत्पन्न होनी की सम्भावना कम हो जाती है।

फसल उत्पादन में वृद्धि – आम तौर पर देखा जाता है, कि पहली फसल की कटाई के बाद अगली फसल की बुआई के लिए खेत को 15-20 दिनों के लिए छोड़ दिया जाता है , जिससे खेत से पहली फसल के अवशेष, जुताई आदि की जा सके। कई बार पहली फसल के देरी से पकने के कारण या देरी से कटाई के कारण,  दूसरी फसल की बुआई प्रभावित होती है जिससे उसकी बुआई का उचित समय निकल जाता है और उसकी पैदावार कम हो जाती है। शून्य जुताई तकनीक से पहली और दूसरी फसल के बीच के समय को व्यवस्थित किया जा सकता है और अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है। इसके अतिरिक्त बीज के उचित पोषण के द्वारा भी इस तकनीक ने अधिक पैदावार प्राप्त की जाती है।

अनुसंधान से यह पाया गया है कि अगर गेहूं की बुआई 25 नवंबर के बाद करते हैं तो प्रतिदिन 25-30 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर उपज में कमी आती है। मशीन द्वारा समय पर बुआई करके पैदावार में होने वाले नुकसान को बचाया जा सकता है।

पर्यावरण प्रदूषण में कमी– खेत की 3-4 जुताई के बदले में जीरो टिलेज तकनीक से एक बार में ही सब काम हो जाता है। जिससे अतिरिक्त मात्रा में डीज़ल या उससे चलने वाले उपकरणों का काम कम हो जाता है, जो प्रदूषण कम करने में मददगार होता है। इसके अलावा पहली फसल के अवशेषों को भी जलाने की आवश्यकता नहीं रहती है, जो इस तकनीक को शून्य प्रदूषण तकनीक बनाती है।

उत्पादन लागत में कमी- चूँकि इस जीरो टिलेज तकनीक में कम श्रम लागत, कम समय, कम पेट्रोल/डीज़ल, प्रति हेक्टेयर कम बीज/खाद, कम सिंचाई,कम जुताई की आवश्यकता रहती है। जिससे परम्परागत खेती की तुलना में ज़ीरो टिलेज तकनीक से खेती इसे कम उत्पादन लागत में अधिक उत्पादन योग्य बनाती है।

जानिए कब करे शून्य जुताई तकनीक के बाद सिंचाई?

जीरो टिलेज में बीजी गई गेहूं की फसल में पहली सिंचाई 15 से 20 दिन बाद करनी चाहिए। खेत में नमी की मात्रा ज्यादा रहने पर पहली सिंचाई सामान्य आवश्यकता के आधार पर ही करें। खेत में जलभराव न होने दें। कई किसान इस तरह की तकनीक अपनाकर काफी लाभ ले रहे हैं, भूमि की उर्वरा शक्ति भी काफी बढ़ रही है।

शून्य जुताई तकनीक प्रोत्साहन हेतु दिया जा रहा है अनुदान

जीरो टिलेज मशीन पर लघु सीमांत किसान और महिला वर्ग एससी/एसी को 50 फीसदी और सामान्य वर्ग के किसानों को 40 फीसदी अनुदान मिलेगा। इसके अलावा राज्य सरकार का 10 हजार रुपए टॉपअप दिया जा रहा है।

भारत में जीरो टिलेज तकनीक

भारत में जीरो टिलेज तकनीक की शुरुआत साल 2000 -2001 में पंजाब और हरियाणा से की गयी थी। इसके अच्छे नतीजे आने पर अब इसका इस्तेमाल बिहार , उत्तर-प्रदेश और उत्तराखण्ड राज्यों में भी किया जाने लगा है। हमे आश्यकता है इस तकनीक को अतिशीघ्र सम्पूर्ण देश में अपनाने की जिससे हम अधिक से अधिक फसल पैदावार करके लाभ कमा सकें।

अंत में

दोस्तों आज जीरो टिलेज तकनीक से भारत सहित विश्व के अन्य देश जैसे ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, साउथ अमेरिकी देश आदि लाभ ले रहे हैं। आज के इस लेख में हमने आपको शून्य टिलेज तकनीक से जुड़े सभी सवालों का उत्तर देने की कोशिश की है। आपको हमारा यह लेख कैसा लगा हमे बताये तथा इस लेख को अपने दोस्तों के साथ अवश्य शेयर करे।

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