भारत के किसानों की आवाज़ – चौधरी चरण सिंह

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Chaudhary Charan Singh

विश्व के मानचित्र पर भारत एक कृषि प्रधान देश माना जाता है। लेकिन इसके बावजूद भारत में किसानों की आवाज़ भारतीय संसद में क्यों मौन है? आज़ादी के बाद समाज के हर वर्ग को आगे बढ़ाने के बारे में नेताओं का ध्यान गया, भारतीय विकास के लिए आधारभूत ढांचे को मजबूत करने के लिए औध्योगिक विकास को आधार बनाया गया। लेकिन कृषि की ओर उतना ध्यान नहीं गया, जिसकी जरुरत थी। इस वक्त एक राजनैतिक शख्सियत ने आगे बढ़कर किसानों की आवाज़ बनने का फैसला किया और उसमें वो सफल भी हुए। आइये जानते हैं उन महान नेता के रूप में:

किसान के घर भावी नेता का जन्म:

भारत के अनेक राज्यों में उत्तर प्रदेश अकेला एक ऐसा राज्य है जो सबसे अधिक राजनैतिक और साहित्यिक हस्तियों का सृजन क्षेत्र रहा है। इस क्षेत्र की विभिन्न हस्तियों में से एक हस्ती जो नाम से ऊपर उठाकर एक विचारधारा के रूप में अधिक जाने जाते हैं, वो हैं चौधरी चरण सिंह।

उत्तर प्रदेश राज्य के हापुड़ जिले में 23 दिसंबर 1902 के दिन चौधरी मीर सिंह के घर एक पुत्र का जन्म हुआ जिसे प्यार से चरण नाम दिया गया। चौधरी मीर सिंह जाट जाती के प्रतिनिधि थे और उनके पूर्वज महराजा नाहरसिंघ वल्लभगढ़ के निवासी थे और 1857 की क्रान्ति में उन्होनें सक्रिय योगदान दिया था। परिणामस्वरूप दिल्ली के चाँदनी चौक में ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया था। इस घटना के बाद नाहर सिंह जी का परिवार आज़ादी की मशाल लेकर मेरठ में आ गया।  यहीं रहते हुए बालक चरण का जन्म हुआ और इनकी शिक्षा-दीक्षा का कार्य सम्पन्न हुआ था।

युवा चरण के पिता चौधरी मीर सिंह की इच्छा थी कि उनका पुत्र उच्च शिक्षा प्राप्त करके देश सेवा में अपना योगदान दे। इसलिए उनकी इच्छा पूर्ति हेतु चरण सिंह ने 1923 में 21 वर्ष की आयु में विज्ञान विषय से स्नातक की उपाधि ग्रहण की। इसके बाद 1925 में कला विषय में स्नातकोत्तर की शिक्षा भी प्राप्त की। इस शिक्षा के बाद चरण सिंह ने कानून एवम विधि की परीक्षा उत्तीर्ण करके अपनी जन्मस्थाली गाजियाबाद में ही वकालत करनी शुरू कर दी।  

किसान से आंदोलनकारी:

वर्ष 1928 में विवाह करने के बाद चौधरी चरण सिंह ने वकालत शुरू कर दी और इसके साथ ही उनके अंदर देश सेवा की चिंगारी भी जलने लगी थी। इस चिंगारी का ही असर था कि वे मुकदमा लड़ते समय मुख्य रूप से किसानों के ही मुकदमे लेते थे और केवल तभी जब उन्हें वादी के वास्तविक पीढ़ित होने का एहसास होता था।

अपने वकालत के पेशे के साथ ही 1930 में युवा चरण सिंह गांधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ गए। नमक कानून को तोड़ने के लिए समुद्र के उपलब्ध न होने पर उन्होनें गाजियाबाद की हिंडन नदी में नमक बनाकर  कानून को तोड़ने कि रस्म निभाई। इनाम में ब्रिटिश सरकार ने चरण सिंह को 6 महीने की सज़ा भी सुना दी। जेल वापसी के बाद चरण सिंह पूरी तरह से स्वतन्त्रता आंदोलन से जुड़ गए और किसानों के नुमाइंदे बनकर आंदोलन में भाग लेने लगे। जब 1937 में आंतरिक रूप से चुनाव हुए तब बागपत से चरण सिंह विधान सभा से चुनकर किसानों का प्रतिनिधित्व करने लगे।

किसानों के मसीहा: आज़ादी से पूर्व

विधायक के रूप में चौधरी चरण सिंह ने हर मौके पर किसानों के हितों की रक्षा की। 1939 के विधानसभा सत्र में एक बार किसानों की फसल से संबन्धित बिल पेश किया गया था। इस बिल में ब्रिटिश सरकार द्वारा किसानों पर अत्याचार बढ़ाने वाले प्रावधान किए गए थे। इस बिल के लागू होने पर किसानों को इस हद तक नुकसान पहुंचाया कि उनकी गरीबी बहुत बढ़ गई थी। लेकिन चौधरी चरण सिंह ने इस बिल का विरोध करते हुए वह बिल पास करवाया जिससे किसानों के खेतों की नीलामी रुक जाती है। इस बिल में चरण सिंह जी किसानों के बढ़े हुए टैक्स को रोकने और ज़मीन से बेदखल होने से रोकने का भी उन्होनें प्रयास किए जिसमें वो सफल भी हुए।

1940 में जब उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग में अचानक दंगे भड़क जाते हैं तब चौधरी चरण सिंह  इन दंगों को रुकवा देते हैं। लेकिन ब्रितानी सरकार ने इन्हें विद्रोही माना और 18 माह के लिए पुनः जेल भेज दिया। लेकिन अंग्रेज़ सरकार क्रांतिकारी चरण के हौंसलों को नहीं रोक सकी।

स्वतंत्र देश के किसान नेता:

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद जब आज़ाद देश का मंत्रिमंडल का गठन हुआ तब चौधरी चरण सिंह उत्तर प्रदेश के कृषि व राजस्व मंत्री बने। अपने मंत्रित्व काल में चरण सिंह ने किसानों के हित में अनेक फैसले लिए जिनमें भूमि सुधार के लिए चकबंदी और जमींदारी को जड़ से उखाड़ने के साहसिक निर्णय शामिल हैं। इसके लिए बड़े पैमाने पर खेतों और जोतों को मापने का काम इनहोनें तीन वर्ष की अल्पावधि में पूरा कर दिया, जो अपने आप में एक दुहसाध्य कार्य था। किसान नेता के रूप में इनहोनें किसानों को छोटे आकार के खेतों की उपयोगिता को सरलता से समझा दिया।

राजनीतिक हल्कों में इस मुद्दे पर नेहरू-चरण सिंह भिड़ंत को आज तक लोग याद करते हैं। नागपूर अधिवेशन में चौधरी चरण सिंह ने नेहरू जी की सरकारी खेती की अवधारणा को अप्रासंगिक बता दिया था। राम मनोहर लोहिया के बाद चौधरी चरण सिंह दूसरे नेता बने जिन्होनें किसानों का पक्ष लेते हुए नेहरू जी से सीधे भिड़ने की हिम्मत दिखाई थी। इसी प्रकार के मुद्दों के चलते चरण सिंह ने कांग्रेस का साथ छोड़कर एक नयी पार्टी भारतीय लोकदल का गठन कर लिया।

संसद से लेकर किसान मंच तक:

चौधरी चरण सिंह जाती से ही नहीं बल्कि मन से भी आजीवन किसान ही रहे। इसी कारण उनके लिए हर फैसले ज़मीन से जुड़े लगते थे। किसानों पर जमींदार के बाद अगर कोई ज़ुल्म ढ़ाता है तो वह है पुलिस विभाग। चौधरी साहब ने अपने मंत्रित्व काल में पुलिस को मानवीय बनाने के लिए पुलिस आयोग का गठन किया जो अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था।

1952 में उत्तर प्रदेश में जमींदारी प्रथा को खत्म करने के लिए एक विधायक पेश किया जिसके परिणामस्वरूप गरीबों को उनका अधिकार मिला।

1954 में उत्तर प्रदेश भूमि संरक्षण कानून पास करवाया जिसके परिणामस्वरूप राज्य के हर छोटे से छोटे किसान को उसकी ज़मीन का वास्तविक हक मिल सका।

जब वे केन्द्रीय वित्त मंत्री के रूप में कार्यरत थे तब उन्होनें छोटे और कुटीर उधयोगों को बढ़ावा देने के लिए बड़े व भारी उधयोगों पर अधिक कर लगाने के प्रावधान किया। इसके अतिरिक्त पूँजीपतियों के प्रभाव को नकारते हुए उन्होनें 120 अनिवार्य वस्तुओं के उत्पादन पर भी पाबंदी लगाई जिससे बड़े घरानों के एकाधिकार को समाप्त किया जा सके।

किसान समुदाय का सबसे बड़ा शत्रु भ्रष्टाचार का उन्मूलन करने के लिए इतने आयोग गठित किए कि लोग उन्हें प्यार से “कमीशन सिंह” कहने लगे। इसके अतिरिक्त उनके पास किए विधेयक का ही परिणाम था कि उत्तर प्रदेश के मंत्रियों को मिलने वाले लाभ एवं भत्तों में कमी आने लगी और बजट का भार कम होने से विकास के लिए अधिक धन उपलब्ध होने लगा।

जब चरण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तब 1960 में उन्होनें खेतों के आकार को छोटा करने का क्रांतिकारी कदम उठाने के दुःसाहस किया। जोत अधिनियम 1960 के अनुसार हर किसान के पास एक निश्चित सीमा तक ही खेत की ज़मीन रखने का अधिकार दिया गया। इस समय चरण सिंह ने एक किसान के रूप में सभी किसानों को खेत का आकार छोटा रखने का लाभ बताया और इस अधिनियम को सफल  बनने में बड़ा कार्य किया।

चरण सिंह के क्रांतिकारी कदम:

कांग्रेस सरकार से अनबन के चलते जब चौधरी चरण ने भारतीय लोकदल के नाम से एक अलग पार्टी बना ली और 1967 में गैर कांग्रेसी के रूप में सरकार बना ली। विभिन्न दलों के साथ सरकार बनाकर भी चरण सिंह ने किसानों के हित को नहीं भूला। इस समय मुख्यमंत्री बनते ही इनहोनें खाद पर से सेल्स टैक्स हटाकर किसानों को एक बड़ी राहत दी।

इसके अतिरिक्त वर्षों से दबे-कुचले अनुसूचित वर्ग को नौकरियों में आरक्षण देने की सुविधा देने के लिए मण्डल आयोग का भी गठन किया। इस आयोग के चलते ही समाज का एक बड़ा पिछड़ा हिस्सा राष्ट्र की मुख्यधारा में मिलने में कामयाब हो सका था।

इसके अतिरिक्त चरण सिंह ने डीजल के मूल्य को भी नियंत्रित करने का साहसी कदम उठाया जिससे किसानों को खेती की लागत में कमी का फायदा मिल सका।  

सादा जीवन उच्च विचार:

चौधरी चरण सिंह उच्च शिक्षा प्राप्त एक कुशल वकील बन सकते थे। लेकिन उन्होनें सादा जीवन अपनाते हुए स्वयं के ज़मीन से जुड़े रहने का परिचाय दिया। उनका मानना था कि किसान नेता अगर किसान न हुआ तो वह किसान के मन से नहीं जुड़ सकता है। इस कारण सादी धोती-कुर्ते के पहनावे में वे प्रधानमंत्री पद पर होते हुए भी साधारण विधायक वाले घर में रहते थे, जिससे कोई भी किसान भाई उनसे मिलने में अजनबीपन न महसूस कर सके।

अस्सी के दशक में राजनीतिक उठापटक से व्यथित होकर चौधरी साहब ने स्वयं ही राजनीति से किनारा करके सादा जीवन व्यतीत करना शुरू कर दिया। अपने अंतिम समय में ग्रामीण परामर्शदाता के रूप में कार्य करते हुए चौधरी चरण सिंह की 1987 में उनकी मृत्यु हो गई।

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