वह गुलाम जो दिल्ली के सुल्तान के बाद खुद सुल्तान बन गया

1223
The rule of Iltutmish and Balban

विश्व में केवल दिल्ली का इतिहास ऐसा है जो 737 ईस्वी से लेकर आज की आधुनिक दिल्ली के रूप में विद्यमान है। अनंगपाल तोमर के द्वारा बसाई गई दिल्ली, ब्रिटिश शासन तक सात बार उजड़ कर बसाई गई है। इसी उथलपुथल में अनेक राजा, शहंशाह और सुल्तान आए जिन्होनें अपने-अपने तरीके से इतिहास बनाया भी और बिगाड़ा भी। इसी क्रम में दो सुल्तान वो भी थे जिनमें एक सुल्तान था तो दूसरा उसका गुलाम था जो अपने सुल्तान की मृत्यु के बाद खुद भी सुल्तान बन गया। ये दोनों सुल्तान थे इल्तुत्मिश और बलबन जिन्होनें दिल्ली पर राज किया था। आइये जानते हैं इन अनोखे सुल्तानों की कुछ अनोखी बातें:

दिल्ली में पहला गुलाम जो सुल्तान बना :

मध्यकालीन भारत के इतिहास में एक वक्त वह भी था जब कुछ गुलामों ने सुल्तान के रूप में शासन किया था। इन शासकों को गुलाम वंश का प्रतिनिधि कहा जाता है और गुलाम वंश को शुरू करने वाला कुतुबउद्दिन ऐबक स्वयं मोहम्मद गोरी का गुलाम था जो उसकी मृत्यु के बाद भारत पर शासन करने के लिए आया था। कुटुबुद्दीन ऐबक ने तुर्क से एक बुद्धिमान और वीर गुलाम खरीदा था जिसका नाम इल्तुत्मिश था। इल्तुत्मिश अपने नाम जिसका अर्थ साम्राज्य का रक्षक होता है, कुत्बुद्दीन के बाद एक अच्छे और सुदृढ़ शासन का पर्याय बन गया था।

गुलाम से दामाद और शासक की पदवी:

इल्तुत्मिश अपनी बुद्धिमत्ता और वीरता से कुदुबुद्दीन के दिल में जगह बनाता गया और सबसे पहले तो अपनी सेवाओं के बदले पुरस्कार प्राप्त करता गया। सबसे पहले तो कुटुबुद्दीन ने उसे एक युद्ध में वीरता दिखाने के इनाम के रूप में उसे दासत्व से आज़ाद करके अमीरूत-उमरा का खिताब दिया। इसके बाद अपनी एक बेटी का विवाह करके उसे अपना दामाद बना लिया। 1210 में कुटुबुद्दीन की मृत्यु के बाद दिल्ली की गद्दी पर आरामशाह को सुल्तान बनाया गया। लेकिन एक वर्ष के भीतर ही बदायूं के सूबेदार के रूप में नियुक्त इल्तुत्मिश ने उसे हटाकर स्वयं को दिल्ली का शासक घोषित कर दिया। इस प्रकार एक और गुलाम सुल्तान की गद्दी पर बैठ गया।

वीरता और बुद्धिमत्ता का पर्याय:

इल्तुत्मिश ने कुतुबुड्डीन की बसाई दिल्ली को पूर्ण रूप से स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इसके अलावा उसने अपने 26 वर्ष (1210- 1236 ई.) तक के शासनकाल में विभिन्न युद्धों के माध्यम से पूरे भारत को अपने शासन के अधीन रखा।

बुद्धिशाली शासक :

इल्तुत्मिश ने सुल्तान बनते ही सबसे पहले अपने चारों ओर फैले विरोधियों को खत्म करने का काम किया। इसके अंतर्गत उसने उन सभी सामंतों को हटा दिया जो उसका विद्रोह कर रहे थे। इसके लिए उसने अपने विश्वासपात्र चालीस सामंतों का एक दल ‘तिर्कान-ए-चहलगानी’ का नाम दिया गया। यह भारत का पहला शासक माना जाता है जिसने दिल्ली में टकसाल स्थापित करके सिक्कों का प्रचलन किया था। तुर्क शासकों की सूची में इसे पहला शासक माना जाता है जिसने भारत में अरबी सिक्के चलाये थे। यह सिक्के चाँदी और तांबे के थे जिन्हें क्रमशः ‘टका’ और ‘जीतल’ का नाम दिया गया था।

कूटनीतिक सरदार :

इलतुतमीश के शासन काल में ही मंगोल अपने विजय रथ पर सवार थे और इलतुतमीश ने मंगोलों के विरोधियों का साथ न देकर एक चतुर कूटनीति से उन्हें अपना दोस्त बना लिया। इसके बाद मंगोल आक्रमणकारियों के भारत से लौट जाने पर उनका खतरा हमेशा के लिए टल गया।

विजय अभियान:

1225 में इलतुतमीश ने दिल्ली से आगे अपना विजय रथ बढ़ाया और बंगाल, रणथंभौर और मंडूर पर आक्रमण करके इन्हें अपने अधीन कर लिया। इसके बाद 1231 में ग्वालियर के किले पर भी विजय पताका फहराने में यह योद्धा विजयी रहा।

कला प्रेमी शासक:

इल्तुत्मिश को स्थापत्य कला प्रेमी भी माना जाता है। सुल्तान बनते ही सबसे पहले इसने कुटुबुद्दीन एबक द्वारा शुरू कारवाई गई कुतबमिनार को पूरा करके भारत को एक अनमोल धरोहर सौंप दी। इसके अलावा इलतुतमीश वह पहला शासक है जिसने जीते जी भारत में अपना मकबरा बनवाया था। इसलिए इसे भारत का पहला मकबरा माना जाता है। इस मकबरे की खास बात यह है कि इसमें हिन्दू संस्कृति के कुछ प्रतीक जैसे लड़ियाँ, चक्र, घंटी और चेन, हीरे और कमल आदि का प्रयोग किया गया था। अजमेर की मस्जिद और बदायूं का हौज-ए-खास भी इल्तुत्मिश की ही देन मानी जाती हैं।

मृत्यु:

इल्तुत्मिश अपने बेटों की नालायकी और अयोग्यता से दुखी रहता था। इसलिए अपने सलाहकारों की बात मानते हुए उसने अपनी बेटी रज़िया को अपने बाद सुल्तान बनाने की घोषणा कर दी। इसके बाद 1236 में एक लंबी बीमारी के बाद इल्तुत्मिश की मृत्यु हो गई थी।

वह सुल्तान जो मुस्कुराने पर दंड देता था :

इतिहास में विभिन्न प्रकार के व्यक्तित्व वाले राजा और सुल्तान हुए हैं। इन्हें में से एक था बलबन जिसके दरबार में कोई भी मुस्कुरा नहीं सकता था। इसके अलावा भी बलबन मिली जुली शख्सियत का मालिक था जिसके कारण वह इतिहास के पृष्ठों पर आज भी विशेष स्थान रखता है।

एक कैदी जो गुलाम से सुल्तान बना :

गयासुद्दीन बलबन तुर्क में इलाबर कबीले से एक सम्पन्न परिवार का सदस्य था लेकिन मंगोलों के आक्रमण में उसे अन्य व्यक्तियों के साथ बंदी बना लिया गया। अन्य कैदियों के साथ बलबन का भी गुलाम के रूप में बगदाद के ख्वाजा जमाल उद्द दीन के साथ सौदा कर दिया था। ख्वाजा ने बाद में बलबन को उस समय के दिल्ली के शासक इल्तुत्मिश के हाथों बेच दिया।

गुलाम से सुल्तान बनने का सफर :

शारीरिक रंग-रूप में सामान्य होने के बावजूद बलबन एक चतुर और वाकप्रिय व्यक्ति था। इसके अतिरिक्त उसकी तेज़ बुद्धि और कूटनीतिक्ता और साहस ने उसे जल्द ही इल्तुत्मिश का प्रिय बना दिया। यही नहीं उसने बलबन को अपने चालीसा दल,’चेहलगन दल’ का महत्वपूर्ण सदस्य भी बना दिया। उसकी पदवी इल्तुत्मिश की मृत्यु के बाद भी यथावत रही बल्कि अगली सुल्तान रज़िया ने बलबन को अमीर-ए-शिकार के पद से भी सम्मानित किया था। रज़िया के बाद आने वाले सुल्तानों, सुलतान मुईनोद्दीन के समय में अमीर-ए-आखुर और अलाउद्दीन मसूद के द्वारा अमीर-ए-हाजिब की पदवी से सुशोभित होता रहा। इस प्रकार सुल्तान कोई भी रहा हो, गायसुद्दीन बलबन के राजनैतिक पद में निरंतर वृद्धि होती रही थी।

सुल्तान का मुकुट :

इल्तुत्मिश के आखिरी वंशज नासीरुद्दीन महमूद के समय में बलबन उसके प्रतिनिधि (नायबे मामलिकत) की पदवी तक पहुँच गया था। इसलिए 1265 में नसीरुद्दीन महमूद की मृत्यु के बाद गयासुद्दीन बिना किसी परेशानी के गुलाम वंश के 9 वें सुल्तान के रूप में दिल्ली के तख्त पर बैठ गया।

कुशल शासक:

इल्तुत्मिश स्वयं एक कुशल शासक था लेकिन उसके उत्तराधिकारी उसके सुदृढ़ शासन को सम्हाल नहीं पाये और तीस वर्ष के अंदर दिल्ली में अराजकता का राज हो गया। बलबन ने सुल्तान बनते ही कठोरता से कुछ नियमों का पालन करवाया और बिखरी हुई सल्तनत को सम्हालने का काम किया। इसके लिए बलबन ने जो प्रयास किए वो इस प्रकार थे:

1. सुदृढ़ शासन के लिए सेना के महत्व को देखते हुए बिखरी हुई सेना का पुनर्गठन किया। सेना में किसी भी अधिकारी का हस्तक्षेप नहीं था और वह स्वयं उस सेना का अध्यक्ष भी था ;

2. दिल्ली के आस पास के इलाकों जैसे दोआब और पाशर्ववर्ती क्षेत्र को मेवातियों (अलवर के निकट का क्षेत्र) के चंगुल से मुक्त करवाकर पुनः व्यवस्थित करने का काम किया;

3. दिल्ली को चारों ओर से सुरक्शित करने के लिए अफगान अधिकारियों की नियुक्ति करके सुरक्षा चौकियों को स्थापित किया;

4. सुल्तान बनने के दो वर्ष बाद, 1267 में कंपिल, पटियाली और भोजपुर के इलाकों को जीतकर वहाँ मजबूत किलों का निर्माण किया;

5. मजबूत शासन व्यवस्था के कारण मार्गों से चोर और डाकुओं का आतंक खत्म हो गया;

6. रूहेलखण्ड और आसपास के इलाकों में सिर उठा रहे विद्रोहियों को झुका कर इन इलाकों में भी अपने शासन की सीमा स्थापित कर दी;

7. शासन को सुरदृढ़ और सुचारु रूप से चलाने के लिए दक्ष व कुशल गुप्तचर नियुक्त किए जो उसे हर समय घटने वाले हर घटना से अवगत रखते थे।

8. भारत की उत्तर पश्चमी सीमा को मंगोलों के आक्रमण से मुक्त करने के लिए बलबन ने हर संभव प्रयास किए। इसी प्रयासों के चलते एक युद्ध में बलबन के सबसे बड़े बेटे मुहम्मद की मृत्यु भी हो गई जो बलबन का उत्तराधिकारी भी था। हालांकि बलबन को इससे मानसिक चोट लगी लेकिन उसने अपने दूसरे बेटे बोगरा खान को इस मुहिम पर भेज कर इस काम को रुकने नहीं दिया।

अजीबोगरीब परम्पराएँ:

बलबन का मानना था कि सुल्तान धरती पर ईश्वर का प्रतनिधि है इसलिए उसके सामने सजदा करना गुनाह नहीं है। इस प्रकार बलबन ने शासक के सामने कमर मोड़कर सजदा करने और ज़मीन पर लम्बवत लेटकर अंगूठा चूमने की अजीब परंपरा (पाइबोस )का आरंभ किया।

दरबार में ईरानी त्योहार नवरोज को धूम-धाम से मनाने की इजाजत देकर उसने अपने मानवीय पक्ष को भी ज़िंदा रखा था।

जनता के मन में सुल्तान का भय स्थापित करने के लिए बलबन ने अपनी पोशाक का सहारा लिया। उसने ऐसी पोशाक बनवायी जो लंबी और खूब चमकीले कपड़े से बनी थी। इसके साथ ही वह ऊंची और लंबी टोपी, हाथ में कोहनी तक दस्ताने और पैर में घुटनों तक लंबे जूते पहनता था।

कठोर और क्रूर सुल्तान :

बलबन को एक क्रूर सुल्तान के रूप में जाना जाता है जिसके शब्दकोश में ‘माफी’ शब्द नहीं था। उसका मानना था कि माफी देने का अर्थ किसी व्यक्ति को दूसरी गलती करने का मौका देना होता है। इसीलिए उसकी सजा में सिर कलम करके किले के दरवाजे पर लटकाना और खाल में भूसा भरवा देना भी शामिल था।

सुल्तान के सिंहासन पर बैठते ही बलबन ने उसी दल के अमीरों को मरवा दिया जिसका वह खुद एक सदस्य था। उसका मानना था कि चहगन दल के सदस्य सुल्तान को हटा या बना सकते हैं इसलिए उसपर आगे कोई संकट न आए , इसलिए उसने यह दल भंग कर दिया।

इसके साथ ही उसने अपने पहले सुल्तान के किसी भी संबंधी को ज़िंदा नहीं रहने दिया जिससे भविष्य में भी विरोध का स्वर कहीं से उठ सके।

दरबार में से नायाब और वज़ीर के पदों को समाप्त करके बलबन ने किसी भी व्यक्ति को महत्वपूर्ण पद देने की परंपरा को भी समाप्त कर दिया।

दरबार के अनुशासन में किसी को भी हंसने, मुस्कुराने या रोने संबंधी किसी भी भावना को प्रकट करने की इजाजत नहीं थी।

बलबन स्वयं एक निम्न जाती से संबन्धित था, लेकिन वह सुल्तान बनने के बाद किसी भी निम्न जाती के व्यक्ति को पसंद नहीं करता था।

बलबन ने न्याय करने में कभी पक्षपात नहीं किया और जरूरत पड़ने पर कठोर से कठोर दंड देने में पीछे नहीं हटा। इसीलिए उसके शासन काल को ‘लोह रक्त’ का शासन कहा जाता है।

 इस प्रकार बलबन ने 1266 -1287 ईस्वी तक शासन किया और अनेक परंपरों को जन्म और मृत्यु दी। एक कुशल और साहसी शासक होने के बावजूद बलबन के क्रूरतम कार्यों को कठोर सोच के कारण उसे एक अच्छा शासक नहीं माना जाता है।

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