जब भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के लिए मजबूर हुआ भारत

1991
history of South India

भारत को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति तो मिल गई, लेकिन जिस तरह से भारत का विभाजन अंग्रेज मजहबी आधार पर कर गये थे, उसकी वजह से मेरी भाषा, मेरी संस्कृति, मेरा क्षेत्र और मेरी पहचान जैसी भावनाएं धीरे-धीरे पनपती हुईं मुखर होनी शुरू हो गईं। आजादी के बाद करीब 400 रियासतों का भारत और पाकिस्तान में विलय हुआ था। सरदार वल्लभभाई पटेल की कुशल रणनीति और सैन्य कार्यवाही की वजह से हैदराबाद तक को भारत में मिला लिया गया था। आजादी के बाद India में regorganisation of states की प्रक्रिया शुरू हुई। एक वक्त ऐसा भी आया, जब भारत linguistic reorganisation of states के लिए मजबूर हो गया। UPSC के लिए History पढ़ते वक्त आपको इस विषय को भी गंभीरता से पढ़ने की जरूरत है, क्योंकि UPSC Exam के लिए यह बेहद Important है। यहां हम आपको The linguistic reorganisation of States के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।

राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना

भारत जब आजाद नहीं हुआ था तो उस वक्त यह 21 प्रशासनिक इकाइयों यानी कि सूबों में विभक्त था। सांस्कृतिक रूप से कुछ सूबे एकदम अलग थे, तो कुछ में सांस्कृतिक मिश्रण पाया जाता था। अंग्रेजों के लिए तो भारत एक उपनिवेश था। उन्हें यहां अपनी सुविधानुसार शासन करना था। इसलिए उन्होंने अपनी प्रशासनिक सुविधा के हिसाब से इसे मनमाने तरीके से बड़े-बड़े प्रांतों में बांट रखा था। ये प्रदेश इकाईयां लोकतांत्रिक, जातीय एवं भाषाई अस्मिता के प्रति खासी संवेदनशील थीं। भारत को आजादी मिलने के उपरांत 1956 में भारत सरकार द्वारा राज्य पुनर्गठन आयोग स्थापित किया गया।

भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन

भारत में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग तो 20वीं सदी की शुरुआत से ही जोड़ पकड़ने लगी थी। वर्ष 1935 में भारत सरकार अधिनियम के आने के बाद 1936 में उड़ीसा और सिंध नामक दो राज्यों का गठन कर दिया गया था। भाषाई आधार पर पहला राज्य इस तरह से उड़ीसा ही बना था। दरअसल, वर्ष 1895 में संबलपुर विद्रोह के दौरान ही उड़िया भाषी राज्य उड़ीसा की मांग जोर पकड़ने लगी थी। उड़ीसा और सिंध के अस्तित्व में आने के बाद ही आंध्र, कन्नड़ और मलयाली प्रदेश के गठन की भी मांग और तेज हो गई थी, मगर सरकार ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का प्रस्ताव उस वक्त ठंडे बस्ते में डाल दिया।

पक्ष में थी कांग्रेस

कांग्रेस दरअसल भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के पक्ष में थी, तभी तो 1937 के कलकत्ता अधिवेशन एवं 1938 के वर्धा अधिवेशन में कांग्रेस ने इसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई। कांग्रेस इसके बाद अपने हर अधिवेशन और 1945-46 के चुनावी घोषणा पत्र में भी भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का वादा दोहराती रही। हालांकि, 1945 में सुरक्षा, स्थिरता और अखंडता का हवाला देते हुए पार्टी के स्टैंड में थोड़ा बदलाव नजर आया था। वर्ष 1946 में संविधान सभा के गठन के बाद भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग ने फिर से जोड़ पकड़ा। बढ़ते दबाव के मद्देनजर जवाहर लाल नेहरू 27 मई, 1948 को भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के लिए राजी हो गये थे और संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू की ही सिफारिश पर 17 जून, 1948 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसके डार की अध्यक्षता में भाषाई प्रांत आयोग की स्थापना कर दी थी, जिसने 10 दिसंबर, 1948 को अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रीय एकता को बरकरार रखने का हवाला देते हुए भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के प्रस्ताव को पूरी तरह से खारिज कर दिया था।

क्या हुआ आजादी के बाद?

आजादी के बाद India में regorganisation of states के दौरान भाषाई आधार पर राज्यों के बंटवारे के पीछे तर्क यह दिया गया कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान आमजनों की भाषा को जनतंत्र के प्रशासन में इस्तेमाल में लाने की वकालत की गई थी, जिससे कि आमजनों से प्रशासन की नजदीकी बढ़ सके। वर्ष 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग ने माना भी था कि linguistic reorganisation of states से लोगों को एकजुट रख पाना आसान हो जायेगा। आंध्र प्रदेश में अलग तेलुगू राज्य को लेकर तेलुगू भाषी क्षेत्रों का आंदोलन चल रहा था और 58 दिनों के अनशन के बाद पोट्टी श्रीरामालू की मौत हो गई थी, जिसके बाद आंदोलनकारियों को अनियंत्रित होते देख तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस मांग को स्वीकार कर लिया था। इसके बाद तत्कालीन बंबई राज्य का मुद्दा भी विवादास्पद बना हुआ था। इस मामले को लेकर मराठी और गुजराती कांग्रेस सांसदों में ही आपस में विभाजन हो गया था। हिंसा की वजह से जान-माल का भारी नुकसान हुआ था। भाषा के आधार पर जो विभाजन हुआ उसकी वजह से मद्रास के तमिल भाषी 16 क्षेत्रों को आंध्र प्रदेश में शामिल कर लिया गया था। वर्ष 1953 से 1960 के दौरान जो अलगअलग राज्यों की सीमाएं बदलीं, उनका आधार भाषा को ही बनाया गया था।

राज्यों का जन्म

वर्ष 1956 में एक नवंबर को बने आंध्र प्रदेश में तेलंगाना क्षेत्र और हैदराबाद राज्य मिले थे। असम और बिहार भी अस्तित्व भी आये। सौराष्ट्र व कच्छ, मध्य प्रदेश के हिस्सा रहे मराठी भाषी जिला नागपुर और हैदराबाद का हिस्सा रहे मराठवाड़ा को मिलाकर बंबई बन गया। बंबई के अधिकांश दक्षिणी हिस्से को मैसूर राज्य में सम्मिलित कर दिया गया। इसके बाद वर्ष 1960 में बंबई से महाराष्ट्र और गुजरात के रूप में दो नये राज्यों का जन्म हुआ। मध्य प्रदेश का निर्माण मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल को मिलाकर किया गया। इसके बाद वर्ष 1969 में मालाबार को मद्रास राज्य से अलग कर दिया गया और केरल राज्य का निर्माण कर दिया गया। इसके बाद कन्याकुमारी जिले को जोड़कर मद्रास का नाम तमिलनाडु कर दिया गया। जोड़-तोड़ का यह सिलसिला जारी रहा। सर्वप्रथम 14 राज्य ही बनाये गये थे। बाद में राज्यों की संख्या बढ़ती चली गई। हालांकि बाद में राज्यों के पुनर्गठन में भाषाओं की भूमिका गौण होती चली गई।

निष्कर्ष

UPSC के लिए History की तैयारी में उपरोक्त जानकारी आपके बहुत काम आने वाली है। साथ ही UPSC Exam के लिए भी यह बहुत important है, इसलिए इसे ध्यान से पढ़ लें, ताकि linguistic reorganisation of states से संबंधित सवालों के जवाब आप आसानी से दे सकें।

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