दिल्ली के सुल्तान ने आखिर क्यों 14वीं शताब्दी में बदल दी थी मुद्रा, क्या रहा इसका असर

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14वीं सदी में दिल्ली के तख्त पर विराजमान रहे सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक को मध्ययुगीन भारत के सबसे असाधारण सुल्तानों में से एक माना जाता है। 26 सालों तक शासन करने वाले इस असाधारण राजा का नाम ना सिर्फ उसकी बादशाहत और लंबे- चौड़े साम्राज्य के लिए लिया जाता है, बल्कि मुहम्मद बिन तुगलक को रातोंरात लिए जाने वाले उनके बेहद असहज और सख्ती वाले फैसलों के लिए याद किया जाता है।

कौन था मोहम्मद बिन तुगलक

1320 ई. से लेकर 1413 तक दिल्ली की सल्तनत पर तुगलक वंश का राज रहा। मोहम्मद बिन तुगलक, तुगलक वंश के दूसरे शासक के रूप में 1325 ईस्वी से लेकर 1351 तक तख्त पर बैठा। अपने पिता गयासुद्दीन तुगलक की  मृत्यु के बाद मोहम्मद बिन तुगलक को गद्दी हासिल हुई। इतिहास के अनुसार, उसके शासनकाल में सल्तनत-ए-दिल्ली का भौगोलिक क्षेत्रफल सबसे अधिक रहा। मुहम्मद बिन तुग़लक़ दिल्ली के सभी सुल्तानों में सर्वाधिक कुशाग्र, बुद्धि सम्पन्न, धर्म-निरेपक्ष, कला-प्रेमी एवं अनुभवी सेनापति था। वह अरबी भाषा एवं फ़ारसी भाषा का विद्धान तथा खगोलशास्त्र, दर्शन, गणित, चिकित्सा, विज्ञान, तर्कशास्त्र आदि में पारंगत था। लेकिन अपनी सनक भरी योजनाओं, क्रूर-कृत्यों और दूसरे के सुख-दुख के प्रति उपेक्षा का भाव रखने के कारण इसे ‘स्वप्नशील’ और ‘पागल’ की संज्ञा दी गई थी। आज तक मोहम्मद बिन तुगलक के फरमानों को ‘तुगलकी फरमान’ कहकर उसकी आलोचना का जाती है। विद्वान और जानकार होने के बावजूद तुगलक की ज्यादातर नीतियां असफल रहीं। वैसे तो मोहम्मद बिन तुगलक की असफल योजनाएं बहुत सी हैं, लेकिन जानते हैं मोहम्मद बिन तुगलक के असफल नीतियों में से ही एक सांकेतिक मुद्रा के प्रचलन के बारे में।

आखिर क्या थी मोहम्मद बिन तुगलक की सांकेतिक मुद्रा नीति

राजधानी स्थानांतरित करने के बाद मोहम्मद बिन तुगलक की जिन तुगलकी फरमानों की सबसे ज्यादा चर्चा होती है, वो है सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन। ये तुगलक का बेहद ही चौंकाने वाला और चर्चित फैसला था। जिसमें तुगलक ने रातोंरात चांदी के सिक्के की जगह तांबे के सिक्के चलवाने का फैसला लिया। उस वक्त सोने और चांदी के सिक्कों का चलन था। तुगलक ने चांदी के जो सिक्के ढलवाए, उनकी क्वालिटी अच्छी नहीं थी। इन सांकेतिक मुद्रा का नाम दोकानी रखा गया। इतिहासकारों की मानें तो सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक ने राजकोष की रिक्तता के कारण और अपनी साम्राज्य विस्तार की नीति को सफल बनाने के लिए सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन करवाया।

कैसा रहा इसका असर

सिक्का ढालने पर राज्य का नियंत्रण ना होने की वजह से अनेक जाली टकसाल बन गए। सिक्के अच्छे स्तर के नहीं थे, इस वजह से उसका नकल करना आसान हो गया और लोगों ने अपने घर पर ही टकसाल खोल दिए। इसके बाद लगान यानी कि टैक्स उन्हीं जाली सिक्कों से दिया जाने लगा। जिससे मोहम्मद बिन तुगलक की अर्थव्यवस्था बिल्कुल ठप हो गई। सुल्तान को अपनी इस योजना की असफलता पर भयानक आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ा। फिर उस क्षति को पूरा करने के लिए उसने करों में भारी वृद्धि भी की गई। उधर परदेसी व्यापारियों ने भी तांबे के सिक्के लेने से इंकार कर दिया। इन्हीं वजहों से सुल्तान को अपना फैसला वापस लेना ही पड़ा।

सिक्के संबंधी विविध प्रयोगों के कारण ही एडवर्ड टामस ने उसे ‘धनवानों का राजकुमार’ कहा है। इसके अलावे ब्राउन ने मोहम्मद बिन तुगलक को इतिहास का सबसे चालाक राजा कहा है।

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