मुगलों ने नौकरशाहों को दिये दो नाम और दो पहचान

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भारत में शासन करने वाले मुगल शासकों में अकबर का नाम विभिन्न प्रकार के नए काम और नए तरीके से शासन करने के लिए याद किया जाता है। मूल शिक्षा से अनभिज्ञ होने पर भी अकबर ने अनेक ऐसे निर्णय लिए जिनसे उसके एक कुशल शासक और एक अच्छे राजनीतिज्ञ होने का पता चलता है। अकबर ने अपने साम्राज्य और प्रशासन को मजबूत आधार देने के लिए अनेक ऐसे निर्णय लिए जिनसे उसकी दूरंदेशी का पता लगता है। ऐसा ही एक निर्णय था अपने शासन में मनसबधारी और जागीरधारी प्रथा का शुभारंभ करना।

मनसबधारी और जागीरदार कौन थे :

इतिहासकारों का मानना है कि मनसबधारी (mansabdhari) प्रथा की सबसे पहले शुरुआत मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर ने की थी। लेकिन बाबर के प्रपौत्र अकबर ने इस प्रथा का प्रयोग मुगल प्रशासन और सैन्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए किया था।

मनसबदार कौन था :                    

अकबर ने 1575 ई में जागिरदारी प्रथा का नुकसान देखते हुए मनसबदारी प्रथा की शुरुआत की थी। मनसबधारी वास्तव में फारसी शब्द है जिसका अर्थ है पद या श्रेणी रखने वाला। बादशाह द्वारा दिये जाने वाले मनसब दो प्रकार,  जात और सवार के रूप में होते थे। यहाँ ‘जात’ का अर्थ उसके पद और ‘सवार’ का अर्थ उसके अधिकार में आने वाले सैनिकों की संख्या से लिया जाता था। अकबर ने इस ‘जात’ या सवार के आधार पर ही मनसब को दो भागों में बाँट दिया था। इस प्रकार मनसबधारी की पहचान उन घुढ़सवारों की संख्या से होती थी, जो उस व्यक्ति को अपने अधिकार में रखने की आज्ञा मिलती थी। इसी जात के आधार पर मानसबधारी के पद, स्थान और वेतन का निर्धारन होता था।

अकबर के राज्य दरबार में जिन लोगों के पास कोई विशेष ओहदा या सरकारी पद होता था, वे मनसबधारी कहलाते थे। यहाँ मनसब का अर्थ ‘ओहदा’ से लिया जाता है। मनसबधारियों को विभिन्न श्रेणियों में उनके पद, वेतन, सैन्य उत्तरदायित्व आदि के आधार पर विभाजित किया जाता था। मनसबधारी को वेतन के अतिरिक्त एक भू-क्षेत्र से कर वसूलने का भी अधिकार प्राप्त था। लेकिन यह अधिकार उन्हें तभी प्राप्त होता था जब उन्हें कोई भू-क्षेत्र जागीर के रूप में सौंप दिया जाता था। तब उस जागीर से कर वसूलने का अधिकार उस मनसबधारी को हो जाता था। लेकिन कर वसूलने का अधिकार मिलने के साथ ही उसपर अंकुश रखने के लिए उसपर सम्राट का प्रत्यक्ष नियंत्रण होता था। इस प्रकार मनसबधारी प्रथा के अंतर्गत एक अमीर को एक विशिष्ट भू-क्षेत्र इनाम में दी जाती थी और उस जागीर का कर उनका वेतन माना जाता था।

मनसबधारियों का वर्गीकरण :

अकबर ने जात और सवार मनसबधारियों को जिन तीन श्रेणियों में बांटा था वो हैं:

1. अमीर ए उम्दा :

ये पहली और सबसे ऊंची श्रेणी का मनसबधारी होते थे। इन्हें अमीर ए उम्दा का खिताब हासिल होता था। शुरू-शुरू में अकबर ने इस श्रेणी में दस हज़ार घुड़सवारों को रखने के अधिकारी इस श्रेणी में रखे थे। लेकिन बाद में उसने पहली श्रेणी के मनसबधारियों को 12 हज़ार घुढ़सवार रखने की आज्ञा भी दे दी थी।

2. अमीर:

इस श्रेणी के मनसबधारी अपने व्यक्तिगत से आधे से अधिक घुढ़सवार रख सकते थे। इन्हें दूसरी श्रेणी का मनसबधारी माना जाता था और इन्हें 500 से अधिक लेकिन 2500 से कम घुढ़सवार रखने का आदेश था।

3. मनसबधारी:

तीसरी श्रेणी का मनसबधारी इस श्रेणी के मनसबधारी को अपने व्यक्तिगत से आधे से कम या सरल शब्दों में 500 से कम  घुढ़सवार रखने की आज्ञा थी। इन्हें केवल मनसबधारी कहा जाता था।

ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर अकबर के दरबार में अधिकांश मनसबधारी पद मध्य एशिया, तुर्क, फारस और अफगान मूल के नागरिकों को मिले हुए थे। भारतीय मूल को यह पद बहुत कम संख्या में मिले थे।

मनसबधारी की आय कितनी थी :

अकबर के शासन काल और उसके बाद भी दरबार के मनसबधारियों को वेतन से कभी कोई शिकायत नहीं थी क्योंकि वह उनकी उम्मीद से हमेशा अधिक और नकद रूप में होता था। कभी-कभी उनको वेतन के रूप में जागीर से वसूला गया कर भी दे दिया जाता था। मनसबधारी अपने वेतन से ही अपने अधीन रखे घोड़ों और सवारों का खर्च निकालते थे। उन्हें आयकर देने से भी छूट थी। अमीर ए उम्दा जो प्रथम श्रेणी के मनसबदार होते थे उन्हें 30,000 रुपए, अमीर जो द्वितीय श्रेणी के थे उन्हें 29,000 रुपए और मनसबधारी जो तीसरे वर्ग में आते थे उन्हें 28,000 रुपए के साथ प्रत्येक सवार के लिए 2 रुपए प्रति माह के हिसाब से वेतन मिलता था। मनसबधारी अपना वेतन लेने स्वयं सम्राट के दरबार में जाते थे। उनकी मृत्यु के बाद उनके द्वारा संचित संपत्ति को राजकोष में जमा कर दिया जाता था।

मनसबधारी करते क्या थे:

मुगल सम्राट अपने मनसबधारियों को कभी-कभी सैनिक अभियान में भेजने के अलावा उनका प्रयोग आंतरिक विद्रोह को रोकने और नए प्रदेशों को जीतने के लिए भी करते थे। इसके अलावा कभी-कभी गैर प्रशासनिक कार्य भी दिये जाते थे।

मनसबधारी का नियंत्रण :

अकबर ने मनसबदारों को घोड़ों के आधार पर ही वर्गीकृत किया था। इसलिए वह विशेष रूप से घोड़ों की देखभाल को सुनिश्चित करने के लिए स्वयं उनका निरीक्षण करता था या किसी समिति को भी इस काम के लिए नियुक्त कर देता था।

इसके साथ ही घोड़ो और सवारों की पहचान को सुनिश्चित करने के लिए घोड़ों को दागने की प्रथा को शुरू किया गया। इसके साथ ही उसके सवार का हुलिया जिसे खाता रखना कहा जाता था भी काम किया जाता था।

हर मनसबदार को अपने  घुड़सवार की संख्या के आधार पर एक घुड़सवार को दो अरबी या इराक़ी घोड़े रखने का भी आदेश था।

मानसबदारों के दोष:

मनसबदार क्योंकि वेतन बहुत अधिक पाते थे और उनकी मृत्यु के बाद संपत्ति राजकोष में जमा करनी होती थी, इसलिए वे अपने जीवनकाल में विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। इसके अतिरिक्त सैन्य शक्ति में भी वे कभी-कभी राजसी नियंत्रण को धोखा देने में सफल हो जाते थे।

मनसबधारी प्रथा (mansabdari pratha) में बदलाव:

अकबर ने अपने मानसबदारों पर पूरा नियंत्रण रखा था। बाद के बादशाहों ने यह नियंत्रण बढ़ा दिया जिसके फलस्वरूप उनकी सैन्य शक्ति का निरीक्षण करने के साथ ही उनकी सेना का 1/3  उआ ¼ भाग बादशाह के सम्मुख मंगवाया जाता था। इसमें जो मनसबदार जीतने अच्छे सैनिक दिखा सकता था उसके अनुसार उसे प्रत्येक सैनिक दो रुपए का इनाम भी दिया जाता था।

मबसबदारी प्रथा की यह विशेषता थी की न तो यह आनुवांशिक थी और न ही इसे हस्तांतरित किया जा सकता था। यदि पिता की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मनसबदार नियुक्त होता था तब से नया मनसबदार ही माना जाता था। इससे न तो कोई मनसबदार शोषण कर सकता था और न ही वह अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर सकता था। इतना होने पर भी सबसे ऊंची श्रेणी के मनसब पद शाही खानदान के लिए ही अलिखित नियम के अंतर्गत सुरक्शित होते थे।

जागीरदारी प्रथा क्या थी:

मुगल काल के शासकों द्वारा शुरू की गई मानसबदारी प्रथा के साथ ही जागीरदारी प्रथा भी शुरू हो गई थी। दरअसल जब मनसबदार को वेतन में ज़मीन का टुकड़ा और उस टुकड़े पर कर वसूलने का अधिकार मिलने से इस प्रथा का (कु)आरंभ माना जाता है। इस प्रकार सम्राट से मिला वेतन के रूप में ज़मीन का टुकड़ा ‘जागीर’ कहलाता था और वह मनसबदार ‘जागीरदार’ कहलाता था। यह एक प्रकार से सामंतशाही प्रथा का ही रूप था।

कैसे शुरू हुई जागीरदारी:

जागीर शब्द मूल रूप से फारसी भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ होता है भूमि और दार का अर्थ है अधिकारी। इस प्रकार वह व्यक्ति जो एक भूमि का स्वामी है वह जागीरदार कहलाता है। यह प्रथा मुगल शासकों द्वारा अपने अधिकारियों को भूमि पुरस्कार के रूप में सौंपने से शुरू हुई मानी जाती है। इसके साथ ही उस ज़मीन से कर वसूलने का हक भी उन्हें मिल जाता था। दिल्ली के आरंभिक शासकों द्वारा इस प्रथा को शुरू किया था लेकिन बाद में इस सामंतवादी प्रथा के कारण केन्द्रीय सरकार कमजोर होती देख सुल्तान बलवन और  लेकिन अलाउद्दीन खिलजी ने इसपर रोक लगा दी थी। लेकिन तुगलक वंश के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने इसे पुनः शुरू कर दिया। हालांकि शेरशाह सूरी और अकबर इस प्रथा के विरोधी थे और उन्होनें इस पर रोक भी लगा दी जिसे बाद के मुगल शासकों ने फिर से हटा कर यह सामंतवादी प्रथा फिर से शुरू कर दी थी।

जागीरदारों के काम और अधिकार:

जागीरदारों को अपने अधीन भूमि का कर वसूलने का अधिकार प्राप्त था। शासन के फायदे के लिए इस कर राशि का एक बड़ा हिस्सा सैन्य शक्ति को मजबूत करने में लगाना भी उनके काम में शामिल था। मनसबदारी प्रथा की भांति जागीरदारी भी केवल व्यक्ति के जीवन के लिए ही होती थी। आनुवांशिक न होने के कारण जागीरदार की मृत्यु होने के बाद यह पद और संपत्ति शासन के अधिकार में वापस चली जाती थी। लेकिन यहाँ अंतर यह था की यदि जागीरदार का पुत्र चाहे तो एक निश्चित रकम का भुगतान करके उस जागीर का नवीनीकरण करवा सकता था।

जागीरदारी का अंत कैसे हुआ:

जागीरदारी का अंत ब्रिटिश शासन के अंत के साथ ही हो गया था। कुछ जागीरें ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दी गईं थीं। इसमें तमिलनाडु के तत्कालीन नवाब मोहम्मद अली ने बंगाल की खाड़ी के किनारे की ज़मीन कंपनी को दे दी थी। इसके अलावा आज़ादी के बाद इस प्रथा को कानून बना कर समाप्त कर दिया गया।

क्या मनसबदारी और जागीरदारी में कोई संबंध था:

वास्तव में इन दोनों प्रथाओं में परस्पर कोई संबंध नहीं दिखाई देता है, लेकिन मूल रूप से दोनों ही एकदूसरे से संबन्धित होते थे। मनसबदार राज दरबार के उच्चाधिकारी होते थे जिनके पास राजनैतिक और प्रशासनिक अधिकार और कार्य होते थे। जागीरदार जबकि राज्य की ओर से कर वसूलने और उसका हिसाब किताब रखने का कार्य करते थे। इसके साथ ही जागीरदार एकत्रित कर को मनसबदार को सौंप देते थे। मनसबदार इस कर से अपने अधीन तैनात सैनिकों को वेतन देते थे। इसके बाद मनसबदार सभी जागीरदारों से एकत्रित कर का ब्यौरा राजकोष में जमा कर देता था।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि मनसबदार कर वसूलने की दृष्टि से राजकोष और जागीरदार के मध्य एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करते थे।

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