अकबर की राजपूति नीति को ऐसे समझिए

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Mughal India

राजपूतों का भारतीय समाज और इतिहास के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वीरता व स्वाभिमान की बात हो या फिर स्वतंत्रता की, राजपूत हमेशा इनमें आगे रहे। यही वजह रही कि राजपूतों के साथ अकबर ने प्रेमपूर्ण एवं मैत्रीपूर्ण संबंध बनाये थे। अकबर ने ऐसा इसलिए किया था, ताकि जरूरत पड़ने पर वे अकबर के लिए स्वयं का बलिदान करने से भी न हिचकें। राजपूतों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए जो अकबर ने नीति अपनाई, उसे ही हम अकबर की राजपूत नीति के नाम से जानते हैं। UPSC में भी अकबर की नीति से जुड़े सवाल अक्सर पूछे जाते हैं। UPSC Exam के लिए यह Important है, इसलिए यहां हम आपको अकबर की राजपूत नीति के बारे में सभी महत्वपूर्ण जानकारी मुहैया करा रहे हैं।

अकबर की राजपूत नीति की विशेषताएं

  • राजपूत राज्यों को रखा स्वाधीन- अकबर को राजपूतों की ताकत मालूम थी। यही वजह रही कि दुश्मन के बदले उन्हें अपना दोस्त बनाकर रखने के लिए अकबर ने जहां एक ओर राजपूतों के स्वाभिमान की रक्षा के लिए राजपूत राज्यों को स्वाधीन रखा, वहीं उन्हें मुगल साम्राज्य की संप्रभुता स्वीकार करवा कर अपना मददगार भी उन्हें बना लिया। मुगल सेना के साथ प्रशासन में भी राजपूतों को ऊंचे पदों पर नियुक्त करके मुगलों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर काम करने की भावना अकबर ने राजपूतों के मन में पैदा कर दी, जिसका फायदा अकबर को मुगल साम्राज्य का विस्तार करने में मिला।
  • ढाल के रूप में राजपूतों का इस्तेमाल- अकबर बड़ा दूरदर्शी था और कुशल कूटनीतिज्ञ भी। तुर्क अमीरों के व्यवहार से भली-भांति वह अपने शासन के शुरुआती दिनों में ही अवगत हो चुका था। ऐसे में केवल तुर्कों की मदद के बल पर हिंदी भाषी क्षेत्रों में मुगल साम्राज्य की नींव को मजबूत बनाना उसके बस की बात नहीं थी। इसलिए उसने राजपूत सरदारों की सेवा का इस्तेमाल तुर्कों की धोखाधड़ी से बचने के लिए ढाल के तौर पर किया।
  • आमेर के साथ बढ़ाई दोस्ती- बिहारीमल या भारमल अकबर के वक्त कछवाहा राजपूतों के राज्य आमेर का शासक था और उस दौरान यहां गृहयुद्ध चरम पर था। मेवाड़ के सूबेदार मुहम्मद शर्फुद्दीन की मदद से भारमल का भतीजा सूजा यहां का राजा बनने की कोशिश में था। पड़ोसी मारवाड़ से संबंध अच्छे नहीं होने की स्थिति में मुगलों से भारमल ने सैन्य सहायता प्राप्त कर अपने राज्य को बचाने की कोशिश की। इसी क्रम में 1562 में अकबर के अजमेर की यात्रा के दौरान उससे मुलाकात करके मुगलों की संप्रभुता को स्वीकार करते हुए भारमल ने अपनी बड़ी बेटी जोधा का अकबर के साथ ब्याह का प्रस्ताव रखा और ब्याह के बाद भारमल को पांच हजार मनसब के साथ बेटे भगवान् दास एवं पोते मानसिंह को मुगल सेना में ऊंचे पद मिल गये।
  • मेड़ता पर पाई विजय- दूसरी ओर अकबर ने मेड़ता के सेनापति जयमल के नियंत्रण में मेड़ता के किले पर विजय हासिल करने के लिए शर्फुद्दीन को अपने साथ मिलाकर उसे युद्ध में भेज दिया। आखिरकार जयमल को भागना पड़ा और मेड़ता के किले पर 1562 में मुगलों का अधिकार हो गया।
  • गोंडवाना को भी जीत लिया- रानी दुर्गावती के अदम्य शौर्य और अपार धन की क्षति के बावजूद गोंडवाना को जीतने में अकबर सफल रहा। हालांकि, यहां से मुगलों को आभूषण, बहुमूल्य मोतियां, सोने की मूर्तियां आदि हासिल हुए थे। साथ ही एक सौ सोने के सिक्के का घड़ा भी मिला था।

अकबर की राजपूत नीति की समीक्षा

अकबर साम्राज्यवादी था, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती, क्योंकि भारत के अधिकतर छोटे-बड़े राज्यों पर वह अधिकार करके मुगल साम्राज्य का अधिक-से-अधिक विस्तार करना चाहता था। उस वक्त भारत में हिंदुओं की तादाद अधिक थी और हिंदुओं में राजपूत अपनी वीरता और साहस के लिए जाने जाते थे। ऐसे में राजपूतों को नाखुश करके चलना अकबर के लिए महंगा साबित हो सकता था। इस तरह से अफगानी ताकत को खत्म करके लड़ाकू राजपूतों के साथ अकबर ने जिस तरह से उदारता और सहिष्णुता की नीति अपनाई, वह उसकी साम्राज्यवादी सोच का ही नतीजा था। अकबर की भी चाहत हर राज्य को मुगलों की दासता स्वीकार करने के लिए मजबूर कर देने की थी, लेकिन अपने पूर्वजों की तरह अकबर धर्मान्ध नहीं था। यह वजह रही कि राजपूतों के साथ वैवाहिक संबंध बनाकर उसने मुगल साम्राज्य के स्तंभ के तौर पर राजपूतों को अपने साथ खड़ा कर लिया। राजपूतों के वचन के पक्के होने और उनके स्वामीभक्त होने का अकबर को पूरा फायदा मिला, क्योंकि इससे एक तो अन्य राजाओं पर जीत हासिल करने में उसे कामयाबी मिली और तुर्क सेना के साथ सरदारों का एकाधिपत्य भी इससे खत्म हो गया।

अकबर की राजपूत नीति के प्रभाव

अकबर की राजपूत नीति का सबसे प्रभाव यह रहा कि राजपूतों की मदद से अकबर को अपना साम्राज्य फैलाने में बहुत मदद मिली, क्योंकि राजपूतों को अकबर पर पूरा भरोसा हो गया था और उसके लिए युद्ध में मर-मिटने तक को तैयार रहते थे। अपनी राजपूत नीति की ही वजह से अकबर ने तुर्कों को इस तरह से पटका कि वे उसके खिलाफ षड्यंत्र रचने के काबिल ही नहीं रह गये। शासन में महत्वपूर्ण पदों पर राजपूतों को नियुक्त करके अकबर ने अपने शासन की सुरक्षा भी सुनिश्चित कर ली थी।

निष्कर्ष

UPSC Exam के लिए Important topics में से एक अकबर की राजपूत नीति भी है। यहां UPSC के लिए अकबर की नीतियों में से एक राजपूत नीति के बारे में जो आपने पढ़ा है, Exam में यह आपके बहुत काम आने वाली है।

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