मुगल भारत में कुछ ऐसे हुआ भारतीय व्यापारिक वर्गों का उदय

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Mughal India

मुगल शासनकाल में स्थानीय स्तर पर छोटे व्यापारियों से लेकर बड़े व्यापारी भी उद्योग व वाणिज्य का हिस्सा थे। व्यापारी, दलाल और सर्राफ अलग-अलग स्तर पर भूमिकाएं निभा रहे थे। बड़े पैमाने पर व्यापार होने से कुछ नये तौर तरीके तो उभर कर आये ही, साथ में नये संस्थानों का भी उदय हुआ। बैंकिंग और क्रेडिट सिस्टम भी अस्तित्व में आये। व्यापार में पार्टनरशिप हुई और बीमा उद्योग भी शुरू हुए।

बैंकिंग

  • सर्राफों ने पैसों का लेन-देन तो किया ही, साथ में सुरक्षित तरीके से जमा करने के लिए पैसे भी प्राप्त करने लगे। जमाकर्ता की मांग होने पर इस धन को लौटा दिया जाता था।
  • जमाकर्ता को उसकी जमा राशि पर कुछ ब्याज भी मिल जाता था।
  • जमाकर्ताओं को दी जाने वाली ब्याज की दरें बदलती रहीं।
  • आगरा में वर्ष 1645 और सूरत में वर्ष 1630 में ब्याज की दरें लगभग 9.5 प्रतिशत सालाना थी।
  • इसके बदले में बैंकर जरूरतमंदों को ऊंचे ब्याज दर पर ऋण दे देते थे।
  • इतिहास में कई संदर्भ मिलते हैं, जिनमें राज्य के अधिकारियों के इन बैंकरों को राजकोष में पैसे जमा करने और ब्याज लेने का जिक्र है।
  • बंगाल के जगत सेठ के बारे में तपन रॉय चैधरी ने लिखा है कि बंगाल में उनके वित्तीय उत्थान का करण आंशिक रूप से बंगाल के खजाने तक उनकी पहुंच थी।
  • सुजान राय (1694) का कहना है कि जिन सर्राफों ने लोगों से पैसे लेकर उन्हें अपने पास जमा किये थे, सौदेबाजी में वे बेहद ईमानदार थे। कोई भी अजनबी सुरक्षित रखने के लिए हजारों रुपये जमा कर देता था और किसी भी वक्त इसे वापस लेने की उसे छूट थी।
  • व्यक्तिगत जरूरतों और व्यावसायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही ऋण लिये जाते थे। ब्याज पर जो राशि ली जाती थी, उसके जरिये व्यापारिक गतिविधियों का संचालन होता था। आमतौर पर सर्राफ और व्यापारी दोनों ही साहूकार होते थे। साहूकारों को कभी-कभी शाह भी कहा जाता था।
  • किसान राजस्व का भुगतान करने और फसलों के लिए ऋण लेते थे। जमींदार अपने दिनभर का खर्चा निकालने के लिए ऋण लेते थे और राजस्व संग्रह के समय इसे चुका देते थे।
  • छोटे ऋणों के लिए ब्याज की दर के बारे में वैसे तो बहुत जनकारी उपलब्ध नहीं है, मगर यह मुख्य रूप से व्यक्ति की आवश्यकता, बाजार में उसकी साख और उसकी सौदेबाजी की क्षमता पर निर्भर करता था।
  • तपन रॉय चैधरी ने लिखा है कि किसानों ने अठारहवीं शताब्दी में बंगाल में सालाना 150 प्रतिशत की ऊंची दरों पर भी ऋण लिया था।
  • वाणिज्यिक ऋणों के लिए, ब्याज की दर एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में अलग हो जाती थी।
  • वैसे, इरफान हबीब ने लिखा है कि महीने के हिसाब से जो ब्याज दर निर्धारित होती थी, वह ऋण आम तौर पर छोटी अवधि के लिए हुआ करता था।
  • पटना में वर्ष 1620-21 के दौरान ब्याज दर सालाना 9 प्रतिशत की थी, जबकि वर्ष 1680 के आसपास यह 15 प्रतिशत से भी अधिक थी।
  • बंगाल के कासिमबाजार  में वर्ष 1679 में ब्याज दर 15 प्रतिशत सालाना थी, जबकि मद्रास में यह उसी दौरान सालाना 8 प्रतिशत और सूरत में 9 प्रतिशत ही थी।
  • वहीं, 17 वीं शताब्दी के दौरान आगरा और सूरत में दरें सालाना 6 से 12 प्रतिशत के बीच थीं।
  • कोरोमंडल तट के समीप के इलाकों में यह बहुत अधिक यानी कि सालाना 18 से 36 प्रतिशत तक थी।
  • अंग्रेजी कारखानों ने ब्याज की दरों पर पूरी सतर्कता के साथ नजर बनाये रखा। उन्होंने उन्हीं जगहों पर अपने कारखाने अधिक स्थापित किये, जहां ऋण लेने पर ब्याज दर सबसे कम लगता था।
  • विभिन्न क्षेत्रों में ब्याज दरों में जो अंतर देखने को मिलता है, उससे साबित होता है कि उस वक्त वित्तीय बाजार का एकीकरण नहीं हुआ था।

बीमा

  • सीमित पैमाने पर ही सही मगर मुगल भारत में एक और व्यावसायिक प्रक्रिया प्रचलित थी, जो थी बीमा।
  • कई मामलों में सर्राफ सामानों की सुरक्षित डिलीवरी की जिम्मेदारी उठाते थे।
  • अंग्रेजी कारखाने के रिकॉर्ड में अंतर्देशीय और विदेशों में सामनों के बीमा का उल्लेख मिलता है।
  • समुद्र में, जहाज और इस पर लोड किये हुए माल दोनों का बीमा किया गया था।
  • कारखानों के रिकॉर्ड में बीमा की दरों का भी उल्लेख मिलता है।
  • 18वीं शताब्दी तक इस व्यवसाय ने अच्छी तरह से पांव पसार लिया था और व्यापक तौर पर यह प्रचलित भी हो गया था।
  • अलग-अलग गंतव्यों के लिए और अलग-अलग सामानों के लिए भी दरें भी निर्धारित कर दी गई थीं। समुद्री यात्राओं की दरें जमीन से पहुंचाये जाने वाले सामानों के मुकाबले अधिक थीं।

ऋण व्यवस्था

  • उत्तरी भारत के बड़े हिस्से में पारंपरिक व्यापारियों ने साहूकारों की भी भूमिका निभाई।
  • गांवों में बनिया किसानों को भूमि के राजस्व का भुगतान करने के लिए ऋण दे दिया करते थे।
  • उसी तरह से कस्बों और शहरों में व्यापारी साहूकार बनकर कर्ज देने लगे थे।
  • व्यापार करने वालों के बीच सर्राफ की भी भूमिका देखने को मिली। सर्राफ का वर्णन मुद्रा परिवर्तक, बैंकरों के रूप में और सोने, चांदी व गहनों के व्यापारियों के रूप में भी मिलता है।
  • मुद्रा-परिवर्तक के रूप में सर्राफों को धातु वाले सिक्कों की शुद्धता के साथ-साथ उनके वजन को पहचानने वाला विशेषज्ञ भी माना जाता था।
  • सर्राफ भी मुगल टकसाल का एक हिस्सा रहे थे। हर टकसाल में एक सर्राफ होता था, जो धातु की शुद्धता का निर्धारण करता था। खनन के बाद वे सिक्कों की शुद्धता का सत्यापन भी करते थे।
  • बैंकरों के रूप में सर्राफ पैसे जमा करते थे और ब्याज पर ऋण देते थे।

चलते-चलते

व्यापार और वाणिज्य के उद्देश्य से व्यापारियों, सर्राफों, साहूकारों और दलालों ने मुगल भारत में व्यापार में अपने पैर जमा लिये थे। जैसे-जैसे व्यावसायिक गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई, इनकी ओर आकर्षित होने वाले लोगों की संख्या बढ़ती चली गई। इस तरह से जो व्यापार, बैंकिंग, बीमा और ऋण व्यवस्था का स्वरुप हम आज देख रहे हैं, उसकी झलक बहुत पहले ही दिख गई थी।

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