मकर संक्रांति- धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व, पौराणिक कथा

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makar sankranti

हिंदुओं का प्रमुख त्योहार मकर संक्रांति पूरे भारत में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। पौष मास के इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं। यूं तो हर साल ये त्योहार  १४ जनवरी को मनाया जाता है, लेकिन इस बार साल २०१९ में मकर संक्रांति का पर्व १५ जनवरी को मनाया जा रहा है। कुंभ के पहले स्नान की शुरुआत भी मकर संक्रांति के दिन से ही शुरू होती है। इस दिन से ही प्रयागराज में शुरू होने वाले कुंभ महोत्सव का पहला शाही स्नान शुरू होगा।  

मकर संक्रांति का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व

  • धार्मिक महत्व

स्नान, दान जैसे धार्मिक क्रियाकलापों वाले इस पर्व का अपना अलग ही धार्मिक महत्व है। यह एक ऐसा त्योहार है जो देश के हर राज्यों में वहां की परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड में मकर संक्रांति के पर्व को खिचड़ी भी कहा जाता है। गुजरात, राजस्थान में पतंग उत्सव का आयोजन कर इसे उत्तरायण पर्व के रुप में मनाते हैं। तमिलनाडु में किसानों का ये प्रमुख पर्व पोंगल के नाम से मनाया जाता है, तो वहीं असम में भोगली बिहू के नाम से इस पर्व को मनाया जाता है।

शास्त्रों में बताया गया है कि सूर्य जब दक्षिणायन में रहते है तो उस अवधि को देवताओं की रात्रि और उतरायण के छह महिने को दिन कहा जाता है। ऐसे में मकर संक्राति को सूर्य के उत्तरायण होने से गरम मौसम की शुरुआत हो जाती है। इस दिन दान करने का भी अपना अलग महत्व है। कहते हैं कि इस दिन दिया गया दान कई गुना बढ़कर फल देता है। इस दिन स्नान कर के दान देने से मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। मकर संक्रान्ति के शुभ समय पर हरिद्वार, काशी आदि तीर्थों पर स्नानादि का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन सूर्य देव की पूजा-उपासना भी की जाती है। आज के दिन खिचड़ी और तिल, गुड़ का सेवन भी किया जाता है।

  • वैज्ञानिक महत्व
  • मकर संक्रांति के समय उत्तर भारत में ठंड का मौसम रहता है। ऐसे में तिल-गुड़ के सेवन से शरीर को ऊर्जा मिलती है और सर्दी से सेहत की रक्षा होती है।  
  • इस दिन खिचड़ी का सेवन करने का भी वैज्ञानिक कारण है। खिचड़ी पाचन को दुरुस्त रखती है। इससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है।
  • पुराण और विज्ञान दोनों में सूर्य की उत्तरायन स्थिति का अधिक महत्व है। सूर्य के उत्तरायन होने पर दिन बड़ा हो जाता है। ऐसे में मनुष्य की कार्य क्षमता भी बढ़ जाती है।

मकर संक्रांति से जुड़ी पौराणिक कथाएं

मकर संक्रांति का त्योहार मनाए जाने के साथ कई पौराणिक कथाएं प्रचलित है। देवताओं के दिनों की गणना भी इस दिन से ही शुरू होती है। सूर्य जब दक्षिणायन में रहते है तो उस अवधि को देवताओं की रात्री और उतरायण के छह माह को दिन कहा जाता है। इसी दिन भगवान आशुतोष ने इस दिन भगवान विष्णु जी को आत्मज्ञान का दान दिया था। वहीं महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रांति का ही दिन चुना था।

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनिदेव के पास जाते हैं। उस दिन शनिदेव मकर राशि का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं। ऐसे में पिता- पुत्र के संबंध को सही करने के लिए मकर संक्रांति को महत्व दिया जाता है। कहा जाता है कि आज ही के दिन गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी। इसीलिए आज के दिन गंगा स्नान और तीर्थ स्थलों पर स्नान दान का विशेष महत्व माना गया है।

निष्कर्ष

मकर संक्रांति के साथ ही पंचक, खरमास और अशुभ समय समाप्त हो जाएगा और विवाह, ग्रह प्रवेश आदि के शुभ कार्य शुरू हो जाएंगे। मकर संक्रांति से जुड़ा हमारा ये लेख आपको कैसा लगा नीचे कमेंट बॉक्स में कमेंट कर के जरूर बताएं।

हमारी तरफ से आप सभी को मकर संक्रांति की ढेर सारी शुभकामनाएं ।

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