Jammu Kashmir Floods, जानें क्या हुआ था उस दिन?

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Jammu Kashmir Floods

आज Jammu Kashmir Floods 2010 को 10 साल हो गए हैं। वर्ष 2010 में 6 अगस्त की शाम जम्मू-कश्मीर के लद्दाख के लिए तबाही लेकर आई। शाम ढली नहीं कि हर ओर पानी ही पानी फैल गया। लेह-लद्दाख क्षेत्र जिसे कि देश की छत कहा जाता है, वहां ऐसी बाढ़ आई कि सब कुछ बहता नजर आया।

इस लेख में आप जानेंगे:-

  • 71 शहर और गांव हुए थे कुप्रभावित
  • क्या हुआ था उस दिन?
  • लेह क्षेत्र में फटते बादलों को यूं समझें
  • Jammu Kashmir Floods 2010 के दौरान उपजीं परिस्थितियां
  • पलक झपकते बर्बाद हुआ चमन

71 शहर और गांव हुए थे कुप्रभावित

2010 के floods में Jammu Kashmir के 71 शहर और गांव भारी तबाही की चपेट में आ गए थे। इस बाढ़ में लगभग 255 लोगों की जान चली गई थी। इसमें 6 विदेशी पर्यटक भी शामिल थे। इसकी वजह से 200 लोग कथित तौर पर लापता भी हो गए थे। यही नहीं, हजारों लोग इस बारिश की वजह से बेघर हो गए थे। कुल मिलाकर लगभग 9000 लोग इसकी वजह से किसी-न-किसी रूप में प्रभावित हुए थे।

क्या हुआ था उस दिन?

  • रात का पहला पहर अभी विदाई ही हुआ था कि अचानक से एक इलाके में बहुत सारा पानी बरस गया। दरअसल बादल फट गया था। दो जगहों पर बादल एक के बाद एक फटे थे। ऐसे में पूरा इलाका जलमग्न हो गया था।
  • एक बादल जहां लेह में फटा था, वहीं दूसरा नीमू में फटा था। लेह इलाके में रहने वाले बहुत से लोग ऐसे थे जिनकी तो आंखें भी नहीं खुली थीं। वे सोए-सोए ही हमेशा के लिए गहरी नींद में चले गए।
  • मिट्टी के घर और कच्चे घर तो कहां बह गए पता ही नहीं चला। इसमें रहने वाले लोग भी बहते चले गए। पांग गांव से रोतोंग हाईवे एवं नीमू तक लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर का इलाका बादल फटने की वजह से बाढ़ और इसके बाद भूस्खलन का शिकार हो गया था।
  • Jammu Kashmir Floods 2010 से जानमाल का सर्वाधिक बड़े पैमाने पर नुकसान फ्यांग, कोग्लूसार और शॉप्पू जैसे गांव में हुआ था। यहां तक कि आकाशवाणी केंद्र, दूरदर्शन केंद्र और कई सरकारी कार्यालय भी इसकी चपेट में आकर क्षतिग्रस्त हो गए थे। आईटीबीपी और सीआरपीएफ के शिविर तक इसमें बह गए थे।

लेह क्षेत्र में फटते बादलों को यूं समझें

  • लेह दरअसल एक ऐसा इलाका है जो कि चारों ओर से बड़े-बड़े पहाड़ों से घिरा हुआ है। जब मानसूनी बादल दक्षिण से उत्तर की तरफ बढ़ते हैं तो इनका फैलाव तीन ओर से घिरी घाटी में हो जाता है। ये फिर मुहानों से टकराना शुरू कर देते हैं।
  • जिस तरीके से किसी पिंजरे में बंद कोई जीव बाहर नहीं आ पाता, उसी तरीके से ये बादल भी यहां कैद होकर रह जाते हैं और बाहर नहीं निकल पाते। इस स्थिति में उन्हें हवा से भी मदद नहीं मिल पाती है कि वे ऊपर की तरफ उठ पाएं।
  • आगे तो ये बादल बढ़ नहीं पाते हैं। ऐसे में इनका ठहराव वहीं हो जाता है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि ये बादल यहां अकेले नहीं होते। ये दरअसल कई अन्य बादलों का एक जमघट होते हैं।
  • इसका मतलब यह हुआ कि एक बादल जब ठहरता है तो ऐसे में दूसरा बादल भी उसी में अटक जाता है। इससे उसकी गति खत्म हो जाती है। ऐसे में एक के ऊपर एक बादलों का जमाव होने लगता है।
  • अब आप इसे मानवीय स्वरूप से देखिए। ये बादल पिंजरे में फंसे-फंसे एक तरह से आत्महत्या करने की सूरत में पहुंच जाते हैं।
  • वैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो यह एक ऐसी दशा होती है जब इन बादलों में मौजूद आर्द्रता का भार बढ़ता चला जाता है। ये जो बादल जमा हैं, इनके लिए इस भार को सह पाना मुश्किल हो जाता है।
  • नतीजा यह होता है कि ये फट जाते हैं। बादल फटते नहीं कि इनमें से बहुत ही तेज गति से भारी मात्रा में जल गिरना शुरू हो जाता है। ऐसे में इंसान तो दूर की बात हैं, पहाड़ तक का इन्हें झेलना असंभव हो जाता है। पहाड़ में इसकी वजह से दरारें पड़ जाती हैं।
  • Jammu Kashmir Floods 2010 के दौरान बिल्कुल ऐसा ही लेह और नीमू इलाके में हुआ था। बादल यहां कड़कड़ा कर फटा और तीव्र गति से पानी ने धरती पर बड़ा चोट किया। देखते-ही-देखते हजारों की तादाद में मकान मलबे में तब्दील होते चले गए।

Jammu Kashmir Floods 2010 के दौरान उपजीं परिस्थितियां

  • विज्ञान की पत्रिका विज्ञान प्रगति के मुताबिक जम्मू कश्मीर के लेह इलाके में रात के वक्त बादल फटने की घटनाएं ज्यादा होती हैं। संकरी घाटियों में आर्द्रता से भरे हुए बादल जमे रहते हैं।
  • रात के दौरान पर्वतीय संचरण की वजह से ये बादल नीचे की ओर आकर स्थानीय और चक्रवती हवाएं पैदा कर देते हैं। इसी वजह से बादल फटने की घटनाएं होती हैं। बादल फटना हमेशा बहुत ही विकराल और लगातार मूसलाधार बारिश के रूप में सामने आता है।
  • पानी ऐसे गिरता है जैसे पानी से भरा हुआ कोई विशाल गुब्बारा फट गया हो। कुछ घंटों में ही भारी बारिश हो जाती है। 6 अगस्त, 2010 को जम्मू कश्मीर के लेह क्षेत्र में बिल्कुल ऐसी ही स्थिति बन गई थी।
  • यहां केवल एक मिनट में 48.26 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई थी। हिमाचल प्रदेश के बरोत इलाके में जब 26 नवंबर, 1970 को बादल फटा था तो उस दौरान एक मिनट में 38.10 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी।

पलक झपकते बर्बाद हुआ चमन

अपनी सुंदरता के लिए जम्मू कश्मीर का लेह-लद्दाख क्षेत्र विख्यात रहा है। सालों भर यहां पर्यटक पहुंचते रहते हैं। वर्ष 2010 में आई बाढ़ की वजह से यहां सब कुछ तबाह हो गया था। वन संपदा और जैव विविधता को भी बड़ा नुकसान पहुंचा था।

चलते-चलते

कहते हैं कि इंसान वही है जो तूफानों से टक्कर ले। Jammu Kashmir Floods 2010 के बाद एक बार फिर से यहां जिंदगी को पटरी पर लाने की कोशिशें युद्धस्तर पर हुईं। जम्मू कश्मीर एवं लेह लद्दाख क्षेत्र के अलग-अलग केंद्रशासित प्रदेश अब बन जाने के बाद यहां प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के इंतजाम किए जा रहे हैं। साथ ही राहत कार्यो की विस्तार से समीक्षा करके पर्यावरण संतुलन को दोबारा स्थापित करने के प्रयास भी जारी हैं।

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