एक-दूसरे को सुहाते हुए भी आपस में यूं भिड़ गए रूस और यूक्रेन

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Ukraine Russia war

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आसमान से बरसते बारूद के गोले। सड़कों पर दौड़ते टैंक। इमारतों को ध्वस्त करतीं मिसाइलें। खंडहर में तब्दील होते चमचमाते शहर। चीख-पुकार में तब्दील होतीं मुस्कान। यही है फिलहाल यूक्रेन की दास्तां। रूस मानने को तैयार नहीं। यूक्रेन भी झुकने को तैयार नहीं। दो खेमों में बंट रही दुनिया। शांति पर भारी पढ़ रहा युद्ध। तेज होती तीसरे विश्वयुद्ध की सुगबुगाहट, आखिर क्या होगा रूस यूक्रेन युद्ध का अंजाम? फिलहाल हर कोई है इससे अनजान। तो चलिए हम करते हैं एक यात्रा की शुरुआत। यात्रा यूक्रेन और रूस के इतिहास की। यात्रा दोनों देशों के बीच संघर्ष की वजहों की। यात्रा उस अतीत की, जिसमें बोए गए थे यूक्रेन रूस युद्ध के बीज।

इससे पहले कि हम रूस और यूक्रेन के इतिहास के बारे में जानें, उससे पहले दोनों देशों के बीच चल रहे युद्ध के दौरान नजर आ रही विभीषिका को देखते हुए हम रामधारी सिंह दिनकर की उन पंक्तियों को जरा याद कर लें, जो उन्होंने आधुनिक विज्ञान से प्रस्फुटित प्रगति के बारे में बड़ी ही दूरदर्शिता के साथ लिखी थी:-

सावधान, मनुष्य! यदि विज्ञान है तलवार,
तो उसे दे फेंक, तज कर मोह, स्मृति के पार।
हो चुका है सिद्ध है तू शिशु अभी नादान,
फल कांटों की तुझे कुछ भी नहीं पहचान।
खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार,
काट लेगा अंग, तीखी है बड़ी यह धार।

एक-दूसरे से कुछ ऐसे जुड़े हैं रूस और यूक्रेन

यह बात सही है कि वर्तमान में रूस और यूक्रेन एक-दूसरे के खून के प्यासे बने हुए हैं। विशेषकर रूस बेहद आक्रामक है और यूक्रेन को पूरी तरीके अपने कब्जे में लेने के लिए उसकी ओर से लगातार हमले किए जा रहे हैं, मगर इतिहास पर हम नजर डालें तो हम यह पाते हैं कि इन दोनों देशों के बीच का संबंध सदियों पुराना है। दोनों ही देशों ने एक समान विरासत को साझा किया है। सबसे पहले हम बात करते हैं कीव की, जो कि वर्तमान में यूक्रेन की राजधानी है। कीव ही वह जगह है, जहां पर एक वक्त पहला स्लेविक राज्य कीवन रस का अस्तित्व हुआ करता था। आज जो हम यूक्रेन और रूस को देख रहे हैं, दरअसल इन दोनों ही देशों की जन्मस्थली प्रथम स्लेविक राज्य कीवन रस ही था।

दो महत्वपूर्ण घटनाक्रमों की भूमिका

अब हम यह जानते हैं कि दोनों देशों के बीच संबंध को जोड़ने में इतिहास में किन दो महत्वपूर्ण घटनाक्रमों ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, तो सबसे पहले 988 ईस्वी में हम चलते हैं, जब कीव के प्रिंस व्लादिमीर प्रथम द्वारा ऑर्थोडॉक्स क्रिस्चियन धर्म को अपना लिया गया था। इस घटना को 10 शताब्दियां बीत चुकी हैं। अलजजीरा की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021 में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूस और यूक्रेन के बीच ऐतिहासिक एकता को लेकर एक निबंध में लिखा था कि यूक्रेन और रूस के नागरिक अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही हैं। यूक्रेन को रूस से अलग करके नहीं रखा जा सकता है। इस तरह से इन दोनों ही देशों के इतिहास में ये दोनों घटनाएं बहुत मायने रखती हैं, क्योंकि इन्हीं दोनों घटनाओं के बीच इतिहास में दोनों देश आपस में बंटते और जुड़ते रहे हैं।

साझा विरासत की वजह से नजदीकियां

यह रूस और यूक्रेन के बीच साझा की जाने वाली विरासत ही है, जिसकी वजह से इन दोनों देशों के बीच नजदीकियां रही हैं। हालांकि, इतिहास इस बात का गवाह है कि यूक्रेन पर अपना कब्जा जमाने के लिए बीती 10 शताब्दियों में हमेशा ही संघर्ष चलता रहा है। सबसे पहले तो जब कीवन रस राज्य हुआ करता था, तब इसके पूर्वी हिस्से पर मंगोलों ने 13वीं शताब्दी मैं अपना अधिकार जमा लिया था। उसी तरह से जब 16वीं शताब्दी शुरू हुई तो इस दौरान भी पोलिश और लिथुआनिया की सेनाओं द्वारा पश्चिम दिशा से यहां घुसपैठ की गई थी। संघर्ष यहीं नहीं रुका। 17वीं शताब्दी में भी पोलिश-लिथुआनियन कॉमनवेल्थ युद्ध हुआ। इसके अलावा सॉर्डम ऑफ रशिया ने भी बड़ा युद्ध हुआ था। इस युद्ध का नतीजा यह हुआ कि डेनिपर नदी के पूर्वी हिस्से पर रूसी साम्राज्य का शासन शुरू हो गया और यह लेफ्ट बैंक यूक्रेन के नाम से जाना जाने लगा। वहीं, डेनिपर नदी के पश्चिम का जो इलाका था, वह राइट बैंक के नाम से जाना जा रहा था और यहां पोलैंड का शासन चल रहा था।

लगभग एक शताब्दी बीत गई तो रूसी साम्राज्य द्वारा 1793 ईस्वी में राइट बैंक यूक्रेन पर अपना कब्जा जमा लिया गया। यहां रूसिफिकेशन की नीति लागू कर दी गई और कई वर्षों तक यह जारी रही थी। इस दौरान एक बड़ा बदलाव यह किया गया कि यूक्रेन की भाषा में यहां पढ़ाई पर रोक लगा दी गई। यहां के नागरिकों पर इस बात के लिए दबाव बनाया गया कि वे रूसी ऑर्थोडॉक्स धर्म को अपना लें। यूक्रेन और रूस के बीच मतभेदों की एक बहुत बड़ी वजह इसे भी माना जाता है।

वर्तमान हालात के लिए क्या सोवियत संघ है जिम्मेवार?

यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध शुरू हो गया है, लेकिन आपको यह मालूम होना चाहिए कि यूक्रेन की अंदरूनी परिस्थितियां भी काफी हद तक युद्ध के लिए जिम्मेवार हैं। वह इसलिए कि यूक्रेन खुद अपने नागरिकों के बीच मान्यताओं को लेकर दो अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ है। यूक्रेन के लोगों के बीच भावनात्मक तौर पर विभिन्नता है, जिसे कि विभाजन के रूप में भी देखा जा सकता है और इस विभाजन के लिए सोवियत संघ को जिम्मेदार ठहराया जाना गलत नहीं होगा।

जब 1917 में कम्युनिस्ट क्रांति हुई तो इसके बाद गृहयुद्ध का सामना कर रहे देशों में यूक्रेन भी शामिल था। यूक्रेन वर्ष 1922 में सोवियत संघ का हिस्सा बन गया, जिसके बाद इस देश में सामाजिक स्तर पर काफी परिवर्तन देखने के लिए मिले। जोसेफ स्टालिन सोवियत के एक प्रख्यात नेता रहे हैं और 1930 के दशक के दौरान सामूहिक खेती के लिए उन्होंने यूक्रेन के कृषकों को मजबूर कर दिया था। जब उनके द्वारा इसका विरोध किया गया, तो इसकी वजह से यूक्रेन के लाखों नागरिक भुखमरी का शिकार हो गए थे। जो रूसी और सोवियत संघ के विभिन्न इलाकों में रहने वाले लोग यूक्रेन की भाषा बोल रहे थे, उन्हें स्टालिन ने यूक्रेन रहने के लिए भेज दिया, जिसकी वजह से यूक्रेन में आबादी के अनुपात में ही बदलाव आने लगा।

पूर्वी और पश्चिमी यूक्रेन के नागरिकों का झुकाव

जैसा कि हम जानते हैं कि पश्चिमी इलाके से पहले ही पूर्वी यूक्रेन रूसी साम्राज्य के नियंत्रण में आ गया था। यही वजह थी कि पूर्वी यूक्रेन में जो लोग रह रहे हैं, हमेशा से रूस से उनके संबंध काफी बेहतर रहे हैं। वैसे नेता, जिन्होंने रूस की तरफ अपना झुकाव रखा है, इन्हीं इलाकों में वे पनपे हैं। वहीं, पश्चिमी यूक्रेन पर नजर डालें, तो ज्यादातर यह यूरोपीय शक्तियों के अधीन यह रहा है। पोलैंड और ऑस्ट्रो-हंगरी साम्राज्य का यहां शासन रहा है। इस वजह से पश्चिमी देशों से पश्चिमी यूक्रेन के लोगों के अच्छे रिश्ते हैं और उनके साथ उन्हें अपनापन भी महसूस होता है। पश्चिमी हिस्से में रहने वाले ज्यादातर लोग यूक्रेन की भाषा बोलते हैं। वे कैथोलिक हैं। वहीं, पूर्वी यूरोप में रहने वाली आबादी का बड़ा हिस्सा रूसी भाषा बोलता है और वे ऑर्थोडॉक्स हैं।

यूक्रेन की आजादी का इतिहास

जब दोनों विश्वयुद्ध नहीं हुए थे, तो उससे पहले पश्चिमी यूक्रेन के कुछ इलाकों पर रोमानिया, पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया ने अपना कब्जा जमाया हुआ था। हालांकि वर्ष 1918 से 1920 तक यूक्रेन स्वतंत्र रहा था। इसके बाद यूक्रेनियन सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक का यूक्रेन हिस्सा बन गया था और 1990 तक वह इसमें शामिल रहा। जब 1990-91 के दौरान सोवियत संघ का विघटन हुआ, तो इस दौरान 16 जुलाई, 1990 को यूक्रेनियन एसएसआर द्वारा संप्रभुता की घोषणा कर दी गई। फिर 24 अगस्त, 1991 को यह देश स्वतंत्र घोषित हो गया। साथ ही 1 दिसंबर, 1991 को इसे मान्यता भी हासिल हो गई।

जब दिसंबर, 1991 में यूएसएसआर पूरी तरीके से टूट गया, तो इसके बाद यह देश पूरी तरीके से आजाद हो गया और यह यूक्रेन के नाम से जाना जाने लगा। सोवियत संघ से जिन देशों को आजादी मिली थी, उनके कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिपेंडेंट स्टेट्स का गठन करने में भी यूक्रेन की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

स्वतंत्र यूक्रेन की एकता को इनसे मिलीं चुनौतियां

यह बात जरूर है कि सोवियत संघ के टूट जाने के बाद जो यूक्रेन एक स्वतंत्र देश बना, उसके लिए अपनी एकता को कायम रखना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। आजाद हो जाने के बाद भी उसका प्रभाव बहुत हद तक यूक्रेन में हमेशा दिखता रहा। ज्यादातर मौकों पर रूस के निर्देश पर ही यूक्रेन की सरकारें भी काम करती रहीं। पश्चिम में यूक्रेन की सीमा जहां यूरोप से लगती है, वहीं पूर्व में इसकी सीमा रूस से लगी हुई है। यूक्रेन के एक अलग देश बन जाने के बाद भी जिस तरह की राष्ट्रीय भावना पश्चिमी हिस्से के नागरिकों में बनी, वैसी पूर्वी हिस्से में नहीं बन सकी, क्योंकि पूर्वी हिस्से में रहने वाले अधिकतर लोगों का जुड़ाव अब भी रूस से ही है।

वर्ष 1991 में यूक्रेन के आजाद होने के बाद लियोनिद क्रावचुक रेफरेंडम से यहां के राष्ट्रपति बने और वर्ष 1994 में हुए चुनाव में लियोनिद क्रावचुक को लियोनिद कुचमा के हाथों हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 1999 में जब चुनाव हुए तो एक बार फिर से कुचमा को जीत मिली और वे राष्ट्रपति चुन लिए गए।

ऑरेंज रिवॉल्यूशन

इसके बाद जब 2004 में चुनाव हुए तो इस बार रूस के प्रति झुकाव रखने वाले विक्टर यानुकोविच राष्ट्रपति चुने गए, लेकिन इस चुनाव में धांधली के बड़े पैमाने पर आरोप लगे और इस दौरान देश में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन होने लगे। यह ऑरेंज रिवॉल्यूशन के नाम से जाना गया। उस दौरान यूरोप से जुड़ने के लिए यूक्रेन में हजारों लोगों द्वारा मार्च निकाला गया था। इसके बाद पश्चिम का समर्थन करने वाले विक्टर यूसचेनको यूक्रेन के राष्ट्रपति चुने गए थे। हालांकि, यदि आप यूक्रेन की भौगोलिक परिस्थितियों को देखें तो आप यह पाएंगे कि पश्चिमी और उत्तरी इलाकों की तुलना में दक्षिणी एवं पूर्वी यूक्रेन की भूमि अधिक उपजाऊ है। वर्ष 2004 और 2010 के राष्ट्रपति चुनावों के दौरान यूक्रेन के लोगों के विचारों में मौजूद भिन्नताएं आसानी से देखने के लिए मिल गई थीं।

2014 का हिंसक प्रदर्शन

विक्टर यूसचेनको ने यह संकल्प लिया था कि वे रूस के दबदबे को कम कर देंगे। साथ ही NATO और यूरोपियन यूनियन में यूसचेनको ने  यूक्रेन को सम्मिलित किए जाने की भी बात कही थी। नाटो ने यूक्रेन को अपने गठबंधन में 2008 में शामिल करने का वादा किया था। वर्ष 2010 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में यानुकोविच ने यूलिया तिमोशेंको को मात दी थी। वर्ष 2014 में विरोध-प्रदर्शन इतना भयानक हुआ कि 14000 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इस दौरान यानुकोविच को हटाने के लिए संसद में वोट डाले गए थे और यानुकोविच यूक्रेन छोड़कर रूस भाग निकले थे। इसके बाद यूक्रेन के क्रीमिया में लड़ाकों ने रूसी झंडा फहरा दिया था और रूस ने 16 मार्च, 2014 को इसे रेफरेंडम से रूस का हिस्सा बना लिया था।

यूक्रेन का अमेरिका से अनुरोध

वर्ष 2017 में यूक्रेन और यूरोपियन यूनियन के बीच फ्री मार्केट ट्रेड का समझौता हुआ था। फिर वर्ष 2019 में यूक्रेन के ऑर्थोडॉक्स चर्च को आधिकारिक तौर पर मान्यता मिल गई थी, जिसकी वजह से रूस बहुत ही नाराज हो गया था। इसके बाद जनवरी, 2020 में अमेरिका से यूक्रेन ने उसे NATO में शामिल होने देने का आग्रह किया था।

यूक्रेन-रूस युद्ध का आगाज

यूक्रेन द्वारा अक्टूबर, 2021 में बेरेक्टर टीबी-2 ड्रोन का उपयोग किया गया था, जिससे कि रूस नाराज हो गया था और नवंबर, 2021 में यूक्रेन की सीमा पर रूस ने सेना की तैनाती बढ़ा दी थी। बीते 10 जनवरी को यूक्रेन और रूस के बीच जारी तनाव के दौरान यूएस और रूस के राजनयिकों की वार्ता विफल हो गई थी। बीते 21 फरवरी को रूस ने यूक्रेन के लोहांस्क और दोनेत्स्क को मान्यता दे दी और 24 फरवरी को यूक्रेन के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन की घोषणा भी कर दी, जिसके बाद युद्ध की शुरुआत हो गई।

और अंत में

इतिहास गवाह है कि युद्ध केवल विनाश ही लेकर आया है। ऐसे में जितनी जल्दी रूस और यूक्रेन के बीच के युद्ध का पटाक्षेप हो, मानवता की भलाई इसी में है।

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