‘इरफ़ान खान’ जिसकी गाली पर भी ताली पड़ती थी !

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Irrfan Khan Biography

शायर कैफ़ी आजमी का एक शेर है- “रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई। तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई। इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी। यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई।” ये पंक्तियां यहां एक ‘मदारी’ के लिए उपयोग की गई हैं, जिसने अपना खेल दिखाकर इस दुनिया को अलविदा कह दिया है। तारीख थी 29 अप्रैल 2020, जगह थी कोकिलाबेन अस्पताल मुंबई, जिस दिन मायानगरी के साथ पूरा देश या तो यूं कहें कि विश्व सिनेमा इस बात की साक्षी बन रही थी कि एक अभिनेता जिसने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से लेकर हॉलीवुड तक अपनी धाक जमाई, उसने ‘मदारी’ की तरह एक खेल दिखाया और अब इतनी जल्दी हम सबको छोड़कर इरफ़ान ‘मकबूल’ हो गए और पीछे छोड़ गए अपना एक ‘कारवां’। जो उन्होंने काफी कम समय में ही ‘हासिल’ किया था। 

‘हमारी तो गाली पर भी ताली पड़ती है’ इस डायलॉग में जैसा कांफिडेंस है वैसा कांफिडेंस हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के एक अभिनेता में कूट-कूट कर भरा हुआ था। जो जब पर्दे पर गाली भी देता था तो वाकई ताली पड़ती थी, बस इतनी सी ही भूमिका से आप समझ गए होंगे कि हम आज आपसे इरफान खान की बात करने वाले हैं, जी हां, आज हम आपसे सिर्फ इरफान की ही बात करेंगे। जिसने कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी को भी नाको चने चबवा दिए थे और काम के प्रति समर्पण ऐसा कि शरीर पूरी तरह से स्वस्थ ना होने के बावजूद फिल्म ‘अंग्रेजी मीडियम’ की शूटिंग की और वो भी ऐसी की फिल्म नें जब बड़े पर्दे पर दस्तक दिया तो दर्शकों के दिलों-दिमाग में बस एक ही नाम चल रहा था वाह ‘इरफान’ वाह।।

आज इस मंच पर इरफान खान की जीवनी पर ही बात होगी, आज आप इस मंच पर इस सदाबहार अभिनेता के जीवन की कुछ रोचक बातें जानने वाले हैं।

इरफान खान जो कि अपने आपको सिर्फ इरफान कहलवाना पसंद करते थे उनका जन्म गुलाबी नगरी ‘जयपुर’ में हुआ था। तारीख थी 7 जनवरी साल 1967, साहबजाद यासीन अली खान और सय्यइदा बेगम के घर एक लड़के का जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने इरफान अली खान रखा था, जिसे दुनिया नें अंतराष्ट्रीय स्तर के अभिनेता के तौर पर जाना और इरफान के तौर पर भरपूर प्यार से नवाजा भी है।

बहुत कम लोगों को ही इस बात की जानकारी है कि इरफान का जन्म जमीनदारों के शाही परिवार में हुआ था और उनके पिता की चाहत थी कि इरफान अपने फैमिली बिजनेस को आगे लेकर जाएं। यहां तक कि एक्टिंग का फितूर सर पर चढ़ने से पहले इरफान खान नें काफी समय तक अपने फैमिली बिजनेस को संभाला भी था।

इरफान के परिवार की बात करें तो उनके दो भाई भी हैं जिनका नाम सलमान खान और इमरान खान है। इरफान अपने एन।एस।डी के दिनों की साथी और बैचमेट सुतापा सिकदर के साथ 23 फरवरी 1995 को शादी के बंधन में बंध गए थे। उनके अब दो लड़के भी हैं जिनका नाम अयान और बाबिल है। इनकी पत्नी सुतापा भी फिल्मी कारोबार से ही जुड़ी हुई हैं, पेशे से वो स्क्रीन राइटर, डायलॉग राइटर और फिल्म प्रोड्यूसर हैं।

 पूरा लेखा जोखा और करियर-

ये देश साल 1984 के सिख दंगों को कैसे भूल सकता है, जिस नरसंहार को सियासत के काले दिन के तौर पर याद किया जाता है, ठीक उसी साल इरफान खान एम।ए की पढ़ाई भी कर रहे थे, इसी साल उन्हें नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से पढ़ाई करने के लिए स्कालरशिप भी मिली थी। जिसके बाद उन्होंने दिल्ली का रुख करते हुए नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से एक्टिंग की बारीकियों को ग्रहण किया था। लेकिन संघर्ष के दिनों की शुरुआत होना अभी बाकी थी, मुंबई आना अभी बाकी था, इरफान नें ही एक डायलॉग में कहा है कि ‘ये शहर आपको जितना देता है ना उससे ज्यादा आपसे ले लेता है ।।’

इसके बाद फिल्मों में काम की तलाश में इरफान नें मायानगरी मुंबई का रुख किया, लेकिन शुरूआती सालों में उन्हें फिल्मों में तो काम नहीं मिला लेकिन छोटे पर्दे नें उनका स्वागत जरूर किया। टेलीविजन धारावाहिक से इरफान नें अपने अभिनय के सफर की शुरुआत की, शुरूआती साल में वो चाणक्‍य, भारत एक खोज, चंद्रकांता जैसे धारावाहिकों में दिखाई दिए थे।

साल 1984 में एक्टिंग की पढ़ाई की शुरुआत करने वाले इरफान को ठीक 4 साल बाद साल 1988 में उनकी पहली फिल्म मिली, जिसका नाम था ‘सलाम बॉम्बे’। इस फिल्म में उनका किरदार भले ही काफी छोटा था लेकिन बड़ी चीजों की शुरुआत हमेशा छोटे स्तर से ही होती हैं। इस फिल्म के बाद भी कई फ़िल्में आयीं जिसमे इरफान नें छोटे-छोटे किरदार निभाए, लेकिन उन्हें असली पहचान फिल्म ‘मकबूल’ से मिली।

इसके बाद साल 2001 में आई हिस्टोरिकल ब्रिटिश फिल्म ‘द वारियर’ में इरफान खान मुख्य भूमिका में नजर आए, इस फिल्म में निभाए गए किरदार की तारीफ सभी नें की, फिल्म क्रिटिक्स नें तो इस फिल्म में निभाए गए इरफान के किरदार को उनका तब तक का सबसे बेहतर काम बता दिया था। दर्शकों के साथ-साथ हिंदी सिनेमा के निर्देशकों की नजर भी तब तक इस कल के सितारे पर पड़ चुकी थी। सबको अंदाजा लग चुका था कि मेन लीग से हटकर असल एक्टिंग से भरे हुए सितारे नें फिल्म इंडस्ट्री में कदम रख दिया है।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में 1988 से अभिनय का सफर शुरू करने के बावजूद और क्रिटिक्स के द्वारा कई बार तारीफ की झड़ी लगने के बाद भी, साल 2004 तक बॉलीवुड की किसी भी फिल्म में इरफान लीड रोल में नजर नहीं आए थे, इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस इंडस्ट्री में काबिलियत से ज्यादा ‘भाई’ का ब्रेसलेट चलता है, मतलब साफ है कि यहां चेहरों पर बोली लगती है। लेकिन कोयले की खदानों से ही हीरे निकला करते हैं, लेकिन साल 2005 में फिल्म ‘रोग’ में मुख्य भूमिका निभाते हुए इरफान नें दर्शकों के बीच में दस्तक दे ही दी।

नेशनल अवॉर्ड- फिल्म थी ‘पान सिंह तोमर’, चम्बल के बीहड़ की इस फिल्म के लिए इरफ़ान खान को साल 2012 में नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था।

एक्टिंग में आने को लेकर उन्होंने ये कहा था-

 अभिनय की दुनिया में आने को लेकर उन्होंने इंडिया टुडे से बात करते हुए कहा था कि मैंने जो प्रोफेशन चुना है वो मेरे मकसद के करीब जाने का एक जरिया है। उसमें मदद मिले तो ठीक बाकी शोहरत, नाम, पैसा ये सब तो बाय प्रोडक्ट हैं, इन्हें तो मिलना ही था।

गंभीर बीमारी से दो-दो हाथ किए थे इरफ़ान ने

साल 2018 में इरफ़ान को पता चला था कि उन्हें न्यूइंडोक्राइन ट्यूमर है, जिसका ईलाज कराने के बाद वो कोलोन इन्फेक्शन से जूझ रहे थे, जिसकी वजह से 29 अप्रैल 2020 को उनका निधन हुआ है ।

कैसे याद करें मकबूल हो चुके इरफ़ान को-

‘चंद्रकांता’ से जिससे इस देश की रविवार की सुबह हुआ करती थी, इसमें इरफ़ान डबल रोल में नजर आया करते थे, बद्रीनाथ और सोमनाथ दो भाइयों के, या फिर याद करें ‘चाणक्य’ से जिसमें वो सेनापति भद्रशील के किरदार में दिखे थे। श्याम बेनेगल के ‘भारत एक खोज’ से जिसमे अलबरूनी थे या फिर स्टार प्लस के ‘बेस्ट सेलर’ से, या फिर हॉरर शो ‘मानो या ना मानो’ जिसे उन्होंने होस्ट किया था।

या फिर आप इरफ़ान को खोजते हुए उनके फिल्मों के नॉस्टेल्जिया में उतरेंगे और याद करेंगे मीरा नायर की फिल्म ‘सलाम बॉम्बे’ में निभाया गया उनका छोटा सा किरदार, जो पर्दे पर खत लिखते हुए आया तो थोड़ी समय के लिए ही था लेकिन उसके खत की छाप फिर कभी गई नहीं, बीते दौर की एक पीढ़ी या फिर जो अब जवान हो रहे हैं जब वो इरफान की इलाहाबादी अंदाज की स्टूडेंट पॉलिटिक्स पर फिल्म ‘हासिल’ देखेंगे तो उन्हें किस कदर याद करेंगे। ये फिल्म उत्तर भारत की छात्र राजनीति की अपने वक्त की सबसे ताकतवर फिल्मों में से एक थी। वो सीन तो अजर-अमर है जिसमें उनके द्वारा निभाया किरदार रणविजय सिंह बोलता है कि ‘एक बात सुन लो पंडित तुमसे गोली-वोली ना चलने वाली’ और ‘जान से मार देना बेटा हम रह गए ना तो मारने में देर ना लगाएंगे।।’ लेकिन आज के दौर की ये नस्ल जब इनको याद करेगी तो

उसको ये भी याद आएगा कि ‘हासिल’ के रणविजय नें जीवन के रण से बहुत जल्दी विदा ले ली थी और छोड़ गए थे अपने पीछे ‘पान सिंह तोमर’ का बीहड़ एक ऐसा सुनसान ‘कारवां’ जिसपर चलने वाला फ़िलहाल कोई नजर नहीं आ रहा है। लेकिन उस बीहड़ का एक डायलॉग सबको याद है कि ‘बीहड़ में बागी होते हैं,डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में’ या फिर उन्हें इसलिए याद करेंगे कि ‘जब देश के लिए दौड़े तो किसी नें नहीं पूछा और जब बागी बन गए तो सब नाम जप रहे हैं।।’ बहुत सी वजह हैं उनको याद करने की लेकिन एक मुख्य वजह है उनकी विद्रोह और टीस से भरी अदाकारी, जिसको देखकर आप कहेंगे इरफ़ान के अलावा और कोई नहीं हो सकता है पान सिंह, और कैसे याद करें उन्हें?  ‘जज़्बा’ जैसी कमर्शियल फिल्म से, जिसमे वो बोलते हैं ‘मैं कहां रहता हूं यहां, यहां तो इंतजार रहता है।।’ तो लगता है जैसे सिनेमा के पर्दे पर जादू हो रहा है और यकीन मानिए उनकी याद में यकीनन ‘हैदर’ का जिक्र होगा जिसमें वो कहते हैं ‘मैं हूं, मैं था और मैं ही रहूंगा।।’ रिश्तें किसी गारंटी कार्ड के साथ नहीं आते, ये हमारी यादें हैं और इरफ़ान हमारी यादों में रहेंगे।। अलविदा इरफ़ान, अलविदा मदारी ।।।।

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