आखिर कब और क्यों शिक्षा को अधिकार बना दिया गया

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व्यक्ति के जीवन में शिक्षा का बहुत बड़ा महत्व होता है। शिक्षा को जीवन का आधार माना गया है। शायद यही वजह है कि मनुष्य को सभी प्राणियों में श्रेष्ठ माना जाता है। वहीं अगर देश के परिपेक्ष्य में बात की जाए तो किसी भी देश का विकसित और आधुनिक होना, उस देश के नागरिकों के शिक्षा स्तर पर ही निर्भर करता है। आजादी के वक्त जहां भारत की साक्षरता दर जहां 12 फीसदी थी, वहीं अब लगभग 83 फीसदी हो गई है, लेकिन अब भी ये दुनियाभर के सामान्य दर से पीछे है।

शिक्षा – एक अधिकार

आजादी के बाद शिक्षा के महत्व को देखते हुए इस पर काम करना शुरू किया गया और 1 अप्रैल साल 2010 को देशभर में शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित हो गया। ऐसा करने से भारत उन 135 देशों की लिस्ट में शामिल हो गया, जो अपने नागरिकों के लिए शिक्षा को एक मौलिक अधिकार की मान्यता दे चुके थे। इस कानून को पारित हुए आज भले ही 8 साल हो गए, लेकिन भारत में मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून बनाने में हमें पूरे सौ साल लगे। जी हां, साल 1910 में गोपाल कृष्ण गोखले ने सभी बच्चों के लिए बुनियादी शिक्षा के अधिकार की मांग की थी। इसके बाद 1932 वर्धा में हुए सम्मेलन में महात्मा गांधी ने इस मांग को दोहराया था। आजादी के बाद शिक्षा को संविधान के नीति निदेशक तत्त्वों में ही स्थान मिल सका, जो कि अनिवार्य नहीं था। साल 2002 में भारत की संसद में 86वें संविधान संशोधन द्वारा इसे मूल अधिकार के रूप में शामिल कर लिया गया। इस तरह से शिक्षा को मूल अधिकार का दर्जा मिल सका। 1 अप्रैल 2010 को शिक्षा का अधिकार कानून 2009 पूरे देश में लागू हुआ। अब यह एक अधिकार है जिसे हम शिक्षा का अधिकार कहते हैं।

शिक्षा- एक मौलिक अधिकार

शिक्षा का अधिकार 6 से 14 साल तक के सभी बच्चों के लिए एक मौलिक अधिकार है। सरल शब्दों में इसका मतलब ये है कि हर एक बच्चे की आठवीं कक्षा तक की नि:शुल्क पढ़ाई के लिए सरकार उत्तरदायी होगी, चाहे वो लड़का हो या लड़की। ये अधिकार हर वर्ग के बच्चों के लिए है। इसके तहत राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना है कि उनके राज्य में 6 से 14 साल के सभी बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ-साथ अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों और इसके लिए उनसे किसी भी तरह का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शुल्क नहीं लिया जा सकेगा।

इस कानून के जरिए देश के बच्चों को साक्षर और अधिकार संपन्न बनाने का मार्ग तैयार कर दिया गया है। राइट टू एजुकेशन एक्ट का सबसे ज्यादा लाभ कम आय वाले परिवार के बच्चों, गरीबी रेखा से नीचे आने वाले परिवार के बच्चों या भारतीय किसान के बच्चों को मिला है। भारत के गांवों और शहरों में जो सरकारी स्कूल हैं वह शायद राइट टू एजुकेशन एक्ट की ही देन हैं। हालांकि अभी भी इस अधिनियम में बहुत सारी खामियां हैं, जिनका प्राइवेट सेक्टर के स्कूल भरपूर फ़ायदा उठाते आये हैं और आज भी उठा रहे हैं।

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