भारत की 5 मुख्य महिला स्वतंत्रता सेनानी

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भारत के स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों से आज़ादी के लिए घोर संघर्ष किया। ऐसे में कई महिला स्वतंत्रता सेनानियों ने भी इस संघर्ष के प्रति अपार योगदान दिया। आज़ादी की लड़ाई में महिलाओं का अविश्वसनीय योगदान सत्र 1817 से आरम्भ हुआ जब भीमाबाई होल्कर ने ब्रिटिश कर्नल मलकम के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई कर उन्हें हराया। इसके बाद और भी कई बहादुर महिलाओं ने अंग्रेजों पर विजय प्राप्त कर अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ अदा की। आइये इनमें से कुछ महिला स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में जानते है।

रानी लक्ष्मी बाई

जिन्हें एक औरत द्वारा प्रदर्शित ताकत और साहस का प्रतीक माना जाता है। 1857 में झांसी की इस रानी ने वक़्त आने पर अपने पुत्र सहित मैदान में उतर कर दुश्मनों का बहादुरी से सामना किया एवं मराठा राज्य सहित देश को भी सम्मान दिलाया ।

  • वाराणसी में 19 नवंबर, 1928 को जन्मीं रानी लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम मणिकर्णिका था और प्यार से उन्हें मनु कहकर लोग पुकारते थे। अपने चंचल स्वभाव और सुंदरता की वजह से रानी लक्ष्मीबाई को पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में लोग छबीली कहकर भी पुकारने लगे थे।
  • शास्त्रों के साथ शस्त्र की भी शिक्षा प्राप्त करने वालीं रानी लक्ष्मीबाई का विवाह झांसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर से 1842 में हुआ था, जिसके बाद वे झांसी की रानी बन गई थी। वर्ष 1851 में अपने बेटे की चार माह में ही मौत हो जाने के बाद 1853 में पति की तबीयत अधिक खराब होने के बाद एक पुत्र को गोद रानी लक्ष्मीबाई ने लिया था, जिसका नाम उन्होंने दामोदर राव रखा था।
  • रानी लक्ष्मीबाई ने हर हाल में अंग्रेजों से झांसी की रक्षा करने की ठानी थी। अंतिम सांस तक उन्होंने अंग्रेजों से लोहा लिया था। तात्या टोपे और बाजीराव प्रथम के वंशज अली बहादुर द्वितीय की भी मदद उन्हें मिली थी।
  • महज 29 साल की उम्र में रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से युद्ध लड़ते हुए 18 जून, 1858 को ग्वालियर के समीप कोटा की सराय में अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।

सरोजिनी नायडू

‘भारत कोकिला’ के नाम से प्रख्यात श्रीमती नायडू ने एक उत्साही स्वतंत्रता कार्यकर्ता और एक कवि के रूप में सन 1930-34 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया था। श्रीमती नायडू 1905 में स्वतंत्र भारत की पहली महिला गवर्नर बनी। इनकी कविताओं के संग्रह आज भी अंग्रेजी में महत्वपूर्ण भारतीय लेखन में मिलते है।

  • हैदराबाद में 13 फरवरी, 1879 को जन्म लेने वाली सरोजिनी नायडू ने सिर्फ 13 साल की उम्र में ही लेडी ऑफ दी लेक शीर्षक से एक कविता लिखी थी। लंदन के किंग्स कॉलेज और फिर कैम्ब्रिज के गिरटन कॉलेज में पढ़ाई करने का उन्हें अवसर भी प्राप्त हुआ था।
  • सरोजिनी नायडू के पहले कविता संग्रह का नाम गोल्डन थ्रैशोल्ड था। बर्ड ऑफ टाइम नाम से उनका दूसरा और ब्रोकन विंग के नाम से तीसरा काव्य संग्रह आया, जिसके बाद से तो कवयित्री के तौर पर वे पूरी तरह से मशहूर हो गईं।
  • सरोजिनी नायडू का विवाह डॉ गोविंदराजुलू नायडू से 1898 में हुआ था। इससे चार वर्ष पूर्व गांधी जी से अपनी पहली मुलाकात के बाद ही सरोजिनी नायडू ने अपनी जिंदगी को देश को समर्पित करने की ठान ली थी।
  • सरोजिनी नायडू ने 1925 में कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की अध्यक्षता भी की थी और भारत की प्रतिनिधि के तौर पर 1932 में वे दक्षिण अफ्रीका भी गई थीं।
  • बंग्ला, अंग्रेजी, हिंदी और गुजराती जैसी अनेक भाषाओं का ज्ञान सरोजिनी नायडू रखती थीं। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गांव-गांव घूमकर देशप्रेम का अलख जगाने वालीं सरोजिनी नायडू ने 2 मार्च, 1949 को इस संसार को अलविदा कह दिया।
  • भारत सरकार ने 13 फरवरी, 1964 को सरोजिनी नायडू के सम्मान में 15 नये पैसे का डाक टिकट भी जारी किया था।

सुचेता कृपलानी

सुचेता कृपलानी भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी और उत्तर प्रदेश राज्य में 1963-67 की अवधि में कार्य किया। इन्होंने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता संग्राम में तथा 1946-47 में विभाजन के दंगों के दौरान सांप्रदायिक तनाव शमन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्रीमती कृपलानी भारतीय संविधान की उप समिति का एक हिस्सा भी थी।

  • पंजाब के अंबाला में एक समृद्ध बंगाली ब्रह्मण परिवार में 15 जून, 1908 को जन्म लेने वालीं सुचेता कृपलानी की चाहत तो 21 साल की उम्र में ही स्वाधीनता संग्राम में कूद जाने की थी, लेकिन 1929 में अपने पिता और बहन की मृत्यु के कारण परिवार की जिम्मेवारी उनके कंधों पर आ पड़ी थी।
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में से एक जेबी कृपलानी से 1936 में 28 वर्ष की उम्र में सुचेता कृपलानी ने विवाह कर लिया था, जिसका विरोध उनके परिवार के साथ महात्मा गांधी ने भी किया था। परिवार के विरोध की वजह जहां जेबी कृपलानी का सिंधी और सुचेता कृपलानी से उम्र में 20 साल बड़े होना था, वहीं महात्मा गांधी का विरोध का कारण यह भय था कि सुचेता से विवाह करने पश्चात् कहीं उनके दाहिने हाथ जेबी कृपलानी स्वतंत्रता संग्राम से अपने पांव पीछे न खींच लें।
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की महिला शाखा, जिसे कि अखिल भारतीय महिला कांग्रेस के नाम से जानते हैं, इसकी स्थापना सुचेता कृपलानी ने ही वर्ष 1940 में की थी।
  • राजनीतिक मतभेदों के कारण जब उनके पति जेबी कृपलानी ने पंडित नेहरू से अलग होकर अपनी खुद की किसान मजदूर प्रजा पार्टी बनाई थी, तो सुचेता कृपलानी भी उनके इस कदम में उनके साथ थीं। हालांकि बहुत जल्द कांग्रेस में उनकी वापसी हो गई थी।
  • सुचेता कृपलानी का निधन 1 दिसंबर, 1974 को हुआ था। उनकी आत्मकथा का तीन भागों में प्रकाशन ‘एन अनफिनिश्ड ऑटोबायोग्राफी’ के रूप में हुआ था।

सावित्री बाई फुले

सावित्री बाई को ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में महिलाओं की शिक्षा के अग्रदूतों में से एक माना जाता है। 19 वीं सदी में घोर अपमान के बाद भी इन्होंने लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा के प्रति अपने प्रयास जारी रखे। सावित्रीबाई ने अपने पति के साथ भारत का पहला महिला स्कूल भिड़े वाडा सन 1848 में पुणे में स्थापित किया। वे अंत तक महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ी।

  • खन्दोजी नेवसे और लक्ष्मी के यहां सावित्री बाई फुले ने 3 जनवरी, 1831 को जन्म लिया था और 1840 में उनका विवाह ज्योतिबा फुले से हुआ था।
  • बाद में ज्योतिबा के नाम से लोकप्रिय हुए ज्योति राव सावित्री बाई फुले के गुरु, संरक्षक और समर्थक थे। मराठी की आदि कवयित्री के रूप में भी सावित्री बाई फुले की पहचान है।
  • उस जमाने में स्कूल खोलने को पाप माने जाने की वजह से लोग उन पर कीचड़, गंदगी और गोबर आदि फेंक देते थे, मगर इन सबकी परवाह न करते हुए सावित्री बाई फुले ने हर धर्म, हर जाति के लोगों के कल्याण के लिए और विधवा विवाह व छूआछूत जैसी कुप्रथाओं के उन्मूलन के लिए अपने प्रयास जारी रखे।
  • प्लेग महामारी के फैलने के दौरान मरीजों की सेवा करने के दौरान प्लेग के शिकार एक बच्चे की सेवा करते वक्त खुद भी प्लेग की चपेट में आने की वजह से 10 मार्च, 1897 को सावित्री बाई फुले का निधन हो गया।

भीकाजी कामा

भीकाजी भारतीय होम रूल सोसायटी की स्थापना में सबसे सक्रिय थी । इन्हें इनके प्रेरक और क्रांतिकारी भाषणों के लिए तथा भारत और विदेश दोनों में लैंगिक समानता की वकालत करने के लिए जाना जाता है। एक वरिष्ठ नेता की तरह इन्होंने कुछ महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर दुनिया का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की। 22 अगस्त 1907, स्टटगार्ट, जर्मनी में अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट सम्मेलन में, कामा ने ध्वज फहराया जिसे उन्होंने “आजादी का प्रथम ध्वज” कहा।

  • जर्मनी, लंदन और अमेरिका जैसे देशों का भ्रमण करते हुए भारत की आजादी के पक्ष में माहौल तैयार करने वाली भारतीय मूल की पारसी नागरिक भीकाजी कामा, जो कि श्रीमती भीखाजी जी रूस्तम कामा (मैडम कामा) के तौर पर भी जानी गईं, उनका जन्म 24 सितंबर, 1861 को बंबई (मुंबई) में हुआ था।
  • पेरिस से उन्होंने वंदे मातरम् शीर्षक से एक पत्र का प्रकाशन किया था, जो कि प्रवासी भारतीयों के बीच बहुत पसंद किया गया था। भारत की आजादी के लिए भीकाजी कामा ने आह्वान करते हुए कहा था कि आगे बढ़ो, हम हिन्दुस्तानी हैं और हिन्दुस्तान हिन्दुस्तानियों का है।
  • लंदन में भीकाजी कामा दादा भाई नौरोजी की निजी सचिव भी रही थीं।
  • भीकाजी कामा को जहां भारतीय क्रांति की माता के तौर पर उनके सहयोगी मानते थे, वहीं अंग्रेजों की नजर में वे एक कुख्यात महिला, अराजकतावादी क्रांतिकारी, खतरनाक क्रांतिकारी और ब्रिटिश विरोधी थीं।
  • यूरोप के भी राष्ट्रीय और लोकतांत्रिक समाज में विशिष्ट स्थान रखने वालीं भीकाजी कामा 13 अगस्त, 1936 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

चलते-चलते

भारत की इन पांचों महिला स्वतंत्रता सेनानियों का देश की आजादी में योगदान ऐसा रहा है, जिसे यह देश कभी नहीं भुला पायेगा। इन्होंने जिस तरह से अथाह परेशानियों से लड़ते हुए और हर चुनौती पर विजय पाते हुए देश और इस समाज के लिए लड़ाई लड़ी, वह अविस्मरणीय है। यह प्रेरणा देने वाली है। इसके लिए यह देश हमेशा इनका ऋणी रहेगा।

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