Bal Gangadhar Tilak: एक ऐसे नायक, जिनका हमेशा ऋणी रहेगा ये देश

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Bal Gangadhar Tilak

तिलक बहादुरी का। तिलक जोश का। तिलक सच्चाई का। तिलक ईमानदारी का। तिलक देशप्रेम का। लोकमान्य Bal Gangadhar Tilak के माथे पर लगे थे ये तिलक। ये तिलक थे, जिनके जन्म के एक वर्ष के बाद ही 1857 का भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम हुआ था। ये तिलक थे, जिन्होंने अंग्रेजों को उन्हीं की भाषा में करारा जवाब दिया। ये तिलक थे, जो विचारक थे, चिंतक थे, महान लेखक थे, स्वतंत्रता सेनानी थी और समाज सुधारक भी थे।

इस लेख में आप जानेंगे:

  • Bal Gangadhar Tilak का बचपन
  • खेल-खेल में दिया संदेश
  • अन्याय के आगे न झुकने की सीख
  • गणित के जरिये बताया जिंदगी का सार
  • बचपन से ही पढ़ाई में विलक्षण
  • नहीं ली सरकारी नौकरी
  • Bal Gangadhar Tilak का Political करियर

Bal Gangadhar Tilak का बचपन

Bal Gangadhar Tilak ने 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नगिरी जिले में गंगाधर रामचंद्र पंत और पार्वती बाई गंगाधर के यहां जन्म लिया था। बचपन में तिलक केशव के नाम से जाने जाते थे। कहानी सुनने का शौक तो तिलक को इतना था कि तात्या टोपे, महारानी लक्ष्मी बाई, गुरु नानक जैसे देशभक्तों व क्रांतिकारियों की कहानियां वे अपने दादा जी से खूब सुनते थे।

भारत की संस्कृति और सभ्यता की छाप दादा जी कहानियां सुनकर बाल गंगाधर तिलक के दिमाग पर बचपन में ही यूं पड़ी कि स्वभाव उनका क्रांतिकारी हो गया। अंग्रेजी हुकूमत से घृणा इतनी हो गई कि इसे जड़ से उखाड़ फेंकने की उन्होंने ठान ली।

खेल-खेल में दिया संदेश

Bal Gangadhar Tilak की story प्रेरित करती है। बचपन में एक बार चैपड़ खेलने का तिलक का मन हुआ, मगर कोई साथ न होने पर खंभे को ही दूसरा साथी मान खेलना शुरू कर दिया। बाएं हाथ से अपने पासे तो दाएं हाथ से वे खंभे के पासे डाल रहे थे। तिलक को दो बार हारता देख दादी हंसकर बोली कि बेटा गंगाधर! तुम तो खंभे से हार गये।

इस पर तिलक ने विनम्रता से जवाब दिया कि मेरे हारने से भला क्या हो गया? खेलते वक्त दायां हाथ मेरा खंभे की ओर रहा और दाये हाथ से ही खेलने की मुझे आदत है। खंभे को तो ऐसे में जीतना ही था।

अन्याय के आगे न झुकने की सीख

इसी तरह से बाल गंगाधर तिलक को एक बार कक्षा में जब मूंगफली के छिलके बिखरने के आरोप में सामूहिक तौर पर दंडित किया जाने लगा तो शिक्षक के सामने हाथ आगे करने से उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि जब मैंने कक्षा को गंदा किया ही नहीं, तो फिर मैं सजा को स्वीकार क्यों करूं?

पिता को स्कूल द्वारा सूचना दिये जाने पर उन्होंने बेटे तिलक का ही साथ देते हुए कहा कि एक तो बेटे को कुछ खरीदने के पैसे मैं देता नहीं। ऊपर से मेरे बेटे को बाजार से न तो कुछ खाने की आदत है और न ही झूठ बोलने की। इस तरह से उस शिक्षक को एहसास हो गया कि उनसे गलती हो गई है। इस तरह से तिलक ने बचपन में ही अन्याय के खिलाफ न झुकने का संदेश दिया था।

गणित के जरिये बताया जिंदगी का सार

सीखने की ललक तो Bal Gangadhar Tilak में बचपन से ही बहुत थी। गणित में उनकी बड़ी रुचि थी। परीक्षा में हमेशा आसान सवालों को छोड़ कठिन सवाल वे हल करते थे। एक मित्र ने हैरानी जताते हुए जब उनसे इसकी वजह पूछी तो उन्होंने कहा कि आसान सवाल हल करके परीक्षा में अच्छे नंबर तो मैं पा लूंगा, मगर कुछ नया मैं कैसे सीख पाऊंगा?

इस तरह से बचपन में ही तिलक ने जिंदगी का एक बड़ा सार समझा दिया कि जिंदगी में भी आगे बढ़ने के लिए साधारण काम की बजाय कुछ असाधारण करने की कोशिश करनी पड़ेगी।

बचपन से ही पढ़ाई में विलक्षण

Bal Gangadhar Tilak की story पढ़ते वक्त पता चलता है कि पढ़ाई में तो वे बचपन से ही बड़े विलक्षण थे। एक बार जो याद कर लिया, उसे वे भूलते नहीं थे। हाई स्कूल में दाखिला लेने पर उन्होंने पाया कि आधे से अधिक पाठ्यक्रम उन्हें पहले से ही कंठस्थ थे।

कक्षा में जब नैषध काव्य की व्याख्या शिक्षक कर रहे थे और तिलक को उस व्याख्या को उन्होंने नहीं लिखते देखा तो पूछने पर तिलक ने बिना डरे उन्हें उत्तर दिया कि इससे भी अच्छी व्याख्या वे इसकी कर सकते हैं। ऐसे में भला लिखने की क्या जरूरत?

नहीं ली सरकारी नौकरी

सरकारी नौकरी बाल गंगाधर तिलक को 1876 में बीए की डिग्री हासिल करने और 1879 में एलएलबी की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आसानी से मिल सकती थी, मगर देशसेवा का रास्ता चुनते हुए डक्कन एजुकेशन सोसायटी की अपने साथियों संग उन्होंने नींव रख दी। इसके जरिये उन्होंने न केवल युवाओं को उच्चतर शिक्षा से जोड़ा, बल्कि पत्रिकाओं आदि का प्रकाशन करके लोगों में देशभक्ति की भावना का संचार करना भी शुरू कर दिया।

Bal Gangadhar Tilak का Political करियर

ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने का लक्ष्य लिये बाल गंगाधर तिलक 1890 में राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का हिस्सा बन गये और यहीं से Bal Gangadhar Tilak के political जीवन की भी शुरुआत हो गई। अंग्रेजों के खिलाफ तिलक सशस्त्र विद्रोह के पक्षधर थे। यहां तक कि कांग्रेस के बड़े नेता गोपाल कृष्ण गोखले के खिलाफ भी वे खड़े हो गये। बंगाल विभाजन के वक्त स्वदेशी आंदोलन और ब्रिटिश सामानों के बहिष्कार को भी उन्होंने खुले दिल से समर्थन दिया। तिलक की सोच स्पष्ट थी-

“वह खून कहो किस मतलब का जिसमें उबाल का नाम नहीं।
वह खून कहो किस मतलब का आ सके देश के काम नहीं।”

चलते-चलते

अरविंद घोष, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे राष्ट्रवादी नेताओं का तिलक को समर्थन मिला था। लाल, बाल, पाल में ‘बाल’ लोकमान्य Bal Gangadhar Tilak के लिए प्रयुक्त हुआ है। सामाजिक कुरीतियों को भी खत्म करने की दिशा में तिलक की ओर से कई प्रयास किये गये। महाराष्ट्र में भव्य तरीके से गणेश उत्सव का हर साल मनाया जाना बाल गंगाधर तिलक की ही तो देन है। ऐसे सार्वजनिक उत्सवों के माध्यम से उन्होंने लोगों को संगठित होकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया। संदेश तिलक का स्पष्ट था-

“युग के साथ मिलकर सब कदम बढ़ाना सीख लो
एकता के स्वर में गीत गुनगुनाना सीख लो।
फूट का घड़ा भरा है फोड़कर बढ़े चलो
भला हो जिसमें देश का वो काम सब किये चलो।”

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