विजय दिवस – दास्तां-ए-कारगिल

364
Vijay Diwas

नमस्कार दोस्तों। आज  26 जुलाई है और आज के दिन को भारत विजय दिवस के रूप में मनाता है। इस अवसर पर मैं आपको भारतीय सेना द्वारा लड़े गए एक ऐसे  युद्ध के बारे में बताने जा रहा हूं, जो बेहद कठिन, दुर्गम एवं विषम परिस्तिथियों में दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र (18000 फीट) में लड़ा गया था। सामान्य तौर पर कोई भी युद्ध दो सेनाओं के मध्य केवल परिस्थितियों के सामान्य रहने पर ही लड़ा जाता है, परन्तु इस युद्ध में भारतीय सेना की लड़ाई अपने से अधिक ऊंचाई पर बैठी दुश्मनों की सेना के साथ-साथ माइनस तापमान, कड़कड़ाती ठण्ड और कम ऑक्सीजन से भी थी। जी हां दोस्तों! मैं जिस युद्ध की बात कर रहा हूं, वह था ‘कारगिल का युद्ध’, जो कश्मीर के कारगिल युद्ध क्षेत्र में भारत व पाकिस्तान के बीच मई, 1999 से 14 जुलाई, 1999 के बीच लड़ा गया था।

पृष्ठभूमि

भारत द्वारा परमाणु परीक्षण किये जाने के बाद से अमेरिका सहित कई यूरोपीय देश भारत से नाराज थे, जिसके बाद अमेरिका ने भारत पर कई प्रकार के आर्थिक एवं राजनीतिक प्रतिबंध भी लगा दिये थे। पाकिस्तान इस राजनीतिक घटना का लाभ उठाकर भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की फिराक में था। अमेरिका कभी भी नहीं चाहता था कि उसके अलावा कोई और राष्ट्र परमाणु शक्ति हासिल करे। यह खीज उसने भारत को युद्ध के दौरान जीपीएस सिस्टम की मदद न देकर दिखाई थी। अमेरिका हमेशा से ही भारत-पाक रिश्तो में हस्तक्षेप करके उसका राजनीतिक लाभ उठाना चाहता था, किंतु भारत ने हमेशा उसके आग्रह को ठुकरा दिया था। पाकिस्तान के दिमाग में चल रहा था कि वह लद्दाख में कब्जा करके कश्मीर में राजनीतिक अस्थिरता कायम करने के अपने नाकाब मंसूबे में कामयाब हो जायेगा, परन्तु भारतीय सेना ने उसकी इस नापाक चाल को समय रहते पहचान लिया था।

पाकिस्तान ने फरवरी, 1999 में लाहौर समझौता (कश्मीर समस्या का हल बातचीत से निकालने के लिए) भारत के साथ किया था। पाकिस्तान दुनिया को यह दिखाना चाहता था कि वह अमन पसंद देश है, मगर LOC के पार उसने भारत और दुनिया की नजर से छुपाकर अपने 5000 सशस्त्र सैनिक घुसपैठियों के भेष में भेज दिए थे। उसका मंसूबा नेशनल हाईवे न-1 पर कब्जा करके लद्दाख को शेष भारत से पृथक करने का था। उसकी इस चाल के पीछे 4 लोगों का हाथ था- जनरल परवेज मुशर्रफ, लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद अजीज, लेफ्टिनेंट जनरल महमूद और नॉर्दर्न इन्फेंट्री कमांण्डर ब्रिगेडियर जावेद हुसैन। पाकिस्तान अपने इस अभियान को ‘ऑपरेशन बद्र’ नाम दिया था।

ऑपरेशन विजय

ऑपरेशन विजय कैसे और कब से कब तक चलाया गया, ये सब हम विभिन्न चरणों के माध्यम से जानेंगेः

चरण 1

3 मई को कारगिल क्षेत्र के स्थानीय चरवाहों ने भारतीय सेना को अनजान लोगों के घुसपैठ एवं कब्जा लेने की खबर दी। इसके बाद भारतीय सेना की पेट्रोलिंग टीम ने वहां का दौरा किया। घुसपैठियों ने भारत के 5 सैनिकों को पकड़ कर उनकी हत्या कर दी। इस बात की पुष्टि होने पर कि ये कोई घुसपैठिए नहीं हैं, बल्कि दुश्मन देश की स्पेशल सेना के जवान हैं, उनसे कब्जे वाला क्षेत्र छुड़ाने के लिए भारतीय सेना द्वारा ‘ऑपरेशन विजय’ चलाया गया था। इस दौरान भारत ने अपने 2 लाख सैनिकों की तैनाती बॉर्डर पर कर दी थी।

चरण 2

9 मई, 1999 को पाकिस्तानी घुसपैठियों द्वारा कारगिल में मौजूद भारतीय गोला-बारूद स्टोर को निशाना बनाया गया। 10 मई, 1999 को पाकिस्तानी घुसपैठियों की हरकत द्रास, काकसार और मुश्कोह क्षेत्र में देखी गयी, जिसके खिलाफ कार्रवाई के लिए भारतीय वायु सेना को लगाया गया और मिशन को नाम दिया गया ‘ऑपरेशन सफेद सागर।’ वायु सेना के मिग-27 तथा मिग-29 विमानों ने इस कार्रवाई में हिस्सा लिया था। इनकी कार्रवाई के दौरान फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता दुश्मनों के हाथ लग गए थे। उन्हें युद्ध बंदी बना लिया गया था। भारतीय वायु सेना ने 32 हजार फीट की ऊंचाई से पाकिस्तानी कब्जे वाली कई चैकियों पर R-77 मिसाइलों से हमला किया और वहां पर फिर से भारत का तिरंगा लहराने में मदद की थी। इस युद्ध में पहली बार लेजर गाइडेड बम का इस्तेमाल हुआथा। बोफोर्स तोपों ने भी ऊंचाई वाले स्थानों पर सटीक निशाना लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

चरण 3

1 जून, 1999 को पाकिस्तानियों ने NH-1 पर गोलाबारी कर उसे कब्जे में लेने की नापाक कोशिश की। 5 जून, 1999 को पाकिस्तानी कब्जे वाली चैकियों से मिले दस्तावेजों से इस बात की पुष्टि हुई कि इस जंग में पाकिस्तानी सेना शामिल है। इसके बाद भारतीय सेना ने अपनी जवाबी कार्रवाई और तेज कर दी एवं बटालिक क्षेत्र की 2 अन्य  चैकियों पर पुनः अधिकार प्राप्त कर लिया। 11 जून, 1999 को भारतीय खुफिया एजेंसी के हाथ लगे एक टेप रिकॉर्डिंग को सार्वजनिक कर दिया गया था, जिसमे पाकिस्तानी जनरल परवेज मुशर्रफ और लेफ्टिनेंट जनरल अजीज खान की बातचीत थी। इसके बाद यह साबित हो गया कि घुसपैठियों के रूप में पाकिस्तानी आर्मी ही युद्ध कर रही थी। यहां से पाकिस्तान का दोगला व्यक्तित्व दुनिया के सामने आ गया और अमेरिका ने भी उसे साफ-साफ शब्दों में पाकिस्तानी आर्मी को एलओसी पार से वापस बुलाने की नसीहत दे डाली।

चरण 4

13 जून, 1999 को भारतीय सेना ने द्रास सेक्टर के तोलोलिंग टॉप को फतेह कर लिया। 29 जून, 1999 को टाइगर टॉप के पास 2 अन्य पॉइंट 5060 और 5100 को भी भारतीय सेना ने जीत लिया। इसके बाद 4 जुलाई को भारतीय सेना ने टाइगर हिल पर विजय प्राप्त की। फिर 5 जुलाई को पाकिस्तान ने अपनी सेना वहां से हटाने की बात अमेरिका को बताई। 7 जुलाई को भारतीय सेना ने जुबर हिल को अपने कब्जे में लिया था। उसके बाद पाकिस्तानी आर्मी के हौसले पस्त हो गए और उन्होंने भागना शुरू कर दिया। 14 जुलाई को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऑपरेशन विजय के सफलतापूर्वक पूरा होने की घोषणा की तथा 26 जुलाई को इस दिवस को ‘विजय दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा भी कर दी।

दोस्तों! अपनी जमीन को दोबारा हासिल करके हमने दुनिया को यह संदेश तो दे दिया कि हम आधुनिक भारत की मजबूत ताकत हैं, मगर यह युद्ध अपने पीछे कई यादें और निशान छोड़ गया। कई बार हमें न चाहते हुए भी कड़े फैसले लेने पड़ते हैं। ऐसा ही साहसिक फैसला तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लिया और पूरे देश से उन्हें जनता का पूरा समर्थन मिला। भारत की ओर से इस युद्ध में 527 जवानों को अपनी श्हादत देनी पड़ी थी। युद्ध में 1363 सैनिक घायल हो गये और एक युद्ध बंदी भी हुए थे। पाकिस्तानी सेना के 453 जवान मारे गये थे, जबकि 700 घायल और 8 जवान युद्ध बंदी हुए थे। भारतीय सेना का एक लड़ाकू विमान, एक विमान तथा एक हेलीकाप्टर इस युद्ध की भेंट चढ़ गए थे।

अदम्य पराक्रम

परमवीर चक्र

लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडेय (शहीद- 11जून 1999, बटालिक क्षेत्र)

कैप्टन  विक्रम बत्रा (शहीद- 7 जुलाई 1999, तोलोलिंग टॉप)

राइफलमैन संजय कुमार

सूबेदार मेजर योगेंद्र सिंह यादव

महावीर चक्र

कैप्टन एन केंगुरुस (शहीद- 28 जून 1999, द्रास सेक्टर)

लेफ्टिनेंट कीशिंग क्लिफोर्ड नॉन्गरम (शहीद- 1 जुलाई 1999, तोलोलिंग रेंज )

मेजर पद्मपाणि आचार्य (शहीद- 28 जून 1999, तोलोलिंग रेंज)

मेजर राजेश सिंह अधिकारी (शहीद- 30 मई 1999, तोलोलिंग हिल)

मेजर विवेक गुप्ता (12 जून 1999, द्रास सेक्टर)

कैप्टन अनुज नय्यर (शहीद- 7 जुलाई 1999, पॉइंट 4875 टाइगर हिल)

कर्नल सोनम वांगचुक

नायक दीगेंद्र कुमार

वीर चक्र

मेजर मरियप्पन सरवनन (शहीद- 29 मई 1999, बटालिक सेक्टर)

स्क्वॉड्रन लीडर अजय आहूजा (शहीद- 27 मई 1999, कारगिल)

इस युद्ध में भारतीय थल सेना को 4 परमवीर चक्र, 9 महावीर चक्र तथा 55 वीर चक्र एवं भारतीय वायु सेना को 2 वीर चक्र मिले थे। भारतीय सेना की ओर से कुल 2.5 लाख गोले युद्ध में इस्तेमाल में लाये गये, जो वर्ल्ड वॉर के बाद किसी युद्ध में सबसे ज्यादा मात्रा में प्रयोग हुए हैं।

चलते-चलते

युद्ध की समाप्ति के बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को इस धोखेबाजी के लिए लताड़ लगायी थी। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से नई दिल्ली में इंडिया गेट के पास युद्ध में शहीद हुए जवानों की स्मृति में एक ‘वॉर मेमोरियल’ का निर्माण कराया गया है।

दोस्तों, अंत में मैं बस इतना कहना चाहूंगा, रात को सुकून से सोने से पहले अपने जवानों के लिए दुआ अवश्य कीजिएगा, क्योंकि हमारी सुकून भरी नींद के लिए कोई सीमा पर जाग रहा होता है। जय हिन्द, जय हिन्द की सेना।

1 COMMENT

Leave a Reply !!

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.