मौर्योत्तर काल में कैसे हुआ साहित्य, व्यापार और वाणिज्य का विकास?

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Post-Mauryan Period में Literature, Trade and Commerce से UPSC Exam में History section में सवाल ज्यादातर देखने को मिल जाते हैं। जब आप Post-Mauryan Period की History पर नजर डालते हैं तो यह साफ नजर आता है कि साहित्य से लेकर व्यापार और वाणिज्य तक में इस दौरान खासी प्रगति हुई थी। इस लेख में हम आपको Post-Mauryan Period में Trade and Commerce के साथ Literature के विकास के बारे में भी विस्तार से समझा रहे हैं।

साहित्य का विकास

  • प्राकृत भाषा को पोषण प्रदान करने का काम सातवाहन नरेशों ने किया था। वे कवियों को आश्रय भी प्रदान करते थे। प्राकृत भाषा और साहित्य ने सातवाहन नरेशों के शासन-काल में खूब तरक्की की। सातवाहन शासक हाल ने छद्म के नाम से एक रचना की थी जो कि दरअसल एक गाथा सप्तशती थी। इसे प्राकृत भाषा में लिखा गया था। पतंजलि ने दूसरी ईसा पूर्व में महाभाष्य की रचना की थी। पाणिनी ने अष्टाध्यायी लिखा था। इसी काल में चरक संहिता भी लिखी गई थी। भरत का नाट्यशास्त्र और वात्सायन का कामसूत्र भी इसी दौरान लिखा गया था। अश्वघोष की सबसे महत्वपूर्ण दो कृतियां बुद्धचरित और सौंदरानंद रही हैं। माना जाता है कि सबसे पहला संपूर्ण नाटक भाष्य द्वारा लिखित स्वप्नवासवदत्ता था।
  • इसके बाद प्राकृत भाषा का स्थान धीरे-धीरे संस्कृत ने लेना कर दिया। रुद्रदामन का जूनागढ़ और कुषाणों के सुई बिहार अभिलेख को संस्कृत का पहला अभिलेख माना जाता है। कनिष्क के समकालीन ही पार्श्व वसुमित्र और अश्वघोष हुए थे। उनके दरबार में चरक जैसे चिकित्सक भी मौजूद थे।

व्यापार और वाणिज्य पर एक नजर

Post-Mauryan Period में Trade and Commerce की एक प्रमुख विशेषता यह रही कि इस दौरान न केवल व्यापार में प्रगति हुई, बल्कि मुद्रा प्रणाली में भी उल्लेखनीय विकास देखा गया। स्वर्ण मुद्राओं का प्रचलन तेजी से बढ़ा। रोम से सोने का व्यापारिक लेन-देन बढ़ा। सोने के सिक्के राजाओं द्वारा जारी किये गये। भारतीय माल की मांग इस काल में विदेशी बाजारों में बढ़ने लगी। जैसे कि सुगंधित लकड़ी, गरम मसाले और वस्त्रों की मांग में इजाफा हो रहा था। पश्चिम में रोमन और चीन में उत्तर हान साम्राज्य विकसित हो रहा था। उत्तर हान साम्राज्य क ओर से व्यापारियों प्रोत्साहन दिये जाने से भारत का मध्य एशिया और चीन के साथ संपर्क बढ़ता चला गया।

इस तरह से बढ़ता गया व्यापार

Post-Mauryan Period में तीन वजह से व्यापार और वाणिज्य को खूब प्रोत्साहन मिला। एक तो नगरों एवं ग्रामीण इलाकों में नये वर्ग उभरकर आये। दूसरा कि रोम और चीन के साथ व्यापारिक संबंध प्रगाढ़ होते चले गये और तीसरा कि रोम के साथ व्यापारिक संबंधों की वजह से दक्षिण-पूर्व एशिया के मसालों से जुड़ाव हो गया। Post-Mauryan Period की History में मिलिन्दपञ्ही नामक ग्रंथ का उल्लेख मिलता है, जिसमें 75 प्रकार के व्यवसाय के बारे में बताया गया है। इनमें से 60 व्यावसाय विभिन्न प्रकार के शिल्प से संबंधित थें भारत से सूती कपड़ों का निर्यात हो रहा था। कपड़ा उत्पादन के प्रमुख केंद्र वाराणसी और मथुरा थे। वहीं, उज्जैन में मनके बनाये जाते थे। हाथी दांत से बनी आकृतियां बड़ी संख्या में अफगानिस्तान के प्राचीन कपिसा से प्राप्त हुई हैं। इस काल में वास्तुकला का विशेष तौर पर विकास हुआ।

सभी स्रोतों से होती है पुष्टि

लोहे की बहुत सी सामग्री आंध्र क्षेत्र के करीमनगर और नालगोंडा से मिली है। पतंजलि ने लिखा है कि मथुरा में शाटक नाम के एक विशेष वस्त्र का उत्पादन किया जाता था। हीरे के लिए कश्मीर, विदर्भ, कौशल और कलिंग की ख्याति थी। बंग और पुंड्र गंगई मलमल के लिए जाने जाते थे। पेरीप्लस ने लिखा है कि इस्पात के मामले में भारत दुनिया में अद्वितीय था। भारत के अरियाका (काठियावाड़) से यह इस्ताल पूर्वी अफ्रीका भेजा जाता था। भारत को रत्नों की एकमात्र जननी प्लिनी ने बताया है। मदिरा के उत्पादन के बारे में अर्थशास्त्र में खास तौर पर बताया गया है। कुलु की मूर्तिकला में जो चित्र दिखते हैं, वे इसकी पुष्टि करते हैं। रोम के साथ व्यापारिक संबंधों की वजह से भारत में बड़ी मात्रा में स्वर्ण मुद्राएं आईं।

शहरी केंद्रों का विकास

प्राचीन नगरों के अवशेष पुरातात्विक स्थलों के उत्खनन में मिले हैं। तक्षशिला से बहुत से अवशेष मिले हैं। वहीं, यमुना के किनारे पुराना किला, मथुरा और कौशांबी से भी बहुत से अवशेष बरामद हुए हैं। अहिछत्र, जो कि आज बरेली के नाम से जाना जाता है, यह उत्तरी पांचालों की राजधानी हुआ करती थी। कपड़ा उत्पादन और हाथी दांत का वाराणसी प्रमुख केंद्र हुआ करता था। बड़ी संख्या में मुहरें वैशाली से मिली हैं। बंगाल के प्रमुख व्यापारिक केंद्र तामलुक तथा चन्द्रकेतुगढ़ थे।

प्रमुख व्यापारिक स्थल एवं बंदरगाह

पेरिप्लस ने सिंधु नदी के समीप वारविकम नाम एक प्रमुख व्यापारिक प्रतिष्ठान के बारे में लिखा है। उस काल में भडौंच को सबसे महत्त्वपूर्ण बंदरगाह माना जाता था। साथ ही मालाबार तट पर मुजिरस और तमिल तट पर पुहार या कावेरीपट्टनम बंदरगाह की भी बड़ी महत्ता थी। टॉलेमी ने तमिल तट पर एक और नेगपट्टनम या नेगपत्तनम नामक बंदरगाह के होने की बात लिखी है। केरल तट पर नौरा (कन्नौर या मंगलौर), टिंडीस, समिल्ला (चैल), मुजरिस, कारालुगी आदि बंदरगाह मौजूद थे।

इन वस्तुओं का होता था व्यापार

मुख्य रूप से मसालों का आयात रोम कर रहा था। यवन को कालीमिर्च से बड़ा लगाव था। बर्तन, लोहे की वस्तुएं, मलमल, मोटी किम्तिम पत्थर, पाकशाला और हाथी दांत आदि भी रोम को निर्यात किये जाते थे। चीन से भारत कच्चे रेशम, रेशम के धागे और रेशमी वस्त्र मंगाता था। पेरिप्लस और ऑलमी ने लिखा है कि रोम को भारत तोते, शेर और चीतों का भी निर्यात करता था, जबकि रोम से भारत को इसके बदले शराब और शराब के दो हत्थे कलश और मिट्टी के बर्तन आदि मिलते थे। पेरिप्लस ने लिखा है कि इथियोपिया भारत को हांथी दांत और सोने का निर्यात करता था।

निष्कर्ष

Post-Mauryan Period में Literature, Trade and Commerce UPSC Exam में History का एक महत्वपूर्ण topic है। इसलिए यहां इससे संबंधित सभी महत्वपूर्ण जानकारी हमने आपको उपलब्ध करा दी है। इन्हें अच्छी तरह से पढ़ लें, ताकि इससे संबंधित हर सवाल का जवाब आप दे सकें।

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