भारत और दुनिया के अन्य देशों में औद्योगिकीकरण एवं वैश्वीकरण का इतिहास

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औद्योगिकीकरण और वैश्वीकरण की वजह से आज दुनिया की सूरत बदल गई है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा है। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और उन्नीसवीं सदी के पूर्वाद्ध में पश्चिमी देशों के तकनीकी और सामाजिक के साथ आर्थिक व सांस्कृतिक हालात में भी जो बदलाव आये, उन्हें औद्योगिक क्रांति के नाम से जाना गया और औद्योगिकीकरण की नींव भी इसी की वजह से पड़ी, जिसके फलस्वरूप वैश्वीकरण का भी मार्ग प्रशस्त हुआ। यहां हम आपको औद्योगिकीकरण के इतिहास के साथ वैश्वीकरण के इतिहास के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं, जिससे आपको इन्हें समझने में मदद मिलेगी।

औद्योगिकीकरण का इतिहास

औद्योगिकीकरण के इतिहास पर नजर डालें तो 16वीं और 17वीं शताब्दी के दौरान जैसे-जैसे यूरोप के कुछ देशों में सामंती व्यवस्था के अधीन रहने की चाहत लोगों के बीच से कम होती गई, वैसे-वैसे समानता और स्वतंत्रता के विचारों को बल मिलने लगा। इससे जो क्रांति का उद्भव हुआ, उससे कृषि के साथ अब उद्योगों से भी जुड़ने की भावना लोगों में विकसित होने लगी और इसकी शुरुआत सबसे पहले वस्त्रों के उत्पादन से हुई। इंग्लैंड में कई यांत्रिक आविष्कार भी हुए। उदाहरण के लिए जेम्स वाट के भाप के इंजन का इस्तेमाल 1789 में गहरी खानों से पानी निकालने के लिए किया गया। कच्चे माल की आवश्यकता महसूस हुई तो अमेरिका और एशिया के देशों से इसे प्राप्त करने के लिए यहां अपने उपनिवेश बनाये जाने शुरू कर दिये गये। फिर शुरू हुई औद्योगिक क्रांति जो फ्रांस से शुरू होने के बाद जर्मनी, इटली और हॉलैंड जैसे देशों में भी पहुंच गई।

वैश्वीकरण का इतिहास

अर्थशास्त्रियों ने वैश्वीकरण शब्द का प्रयोग दरअसल 1980 से करना शुरू किया था। वैश्वीकरण का प्रथम युग 19वीं सदी को ही माना जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद व्यापारिक हितों के साथ अर्थशास्त्रियों एवं राजनीतिज्ञों के नियोजन के परिणामस्वरूप वैश्वीकरण में तेजी आई, क्योंकि इन्होंने संरक्षणवाद एवं अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक एकीकरण में गिरावट के मूल्य की पहचान की थी। वैश्वीकरण का प्रभाव दुनिया के बड़े से लेकर छोटे देशों पर भी पड़ा है। इसके परिणाम अधिकतर देश आज एक-दूसरे पर कई चीजों को लेकर निर्भर हैं।

भारत में औद्योगिकीकरण

भारत प्राचीन समय से बहुत ही समृद्ध रहा है। मिस्र, फ्रांस, अरब, रोम और इंग्लैंड के बाजारों में यहां से जा रहे माल बिक रहे थे। ईस्ट इंडिया कंपनी इसलिए तो 1600 ईस्वी में भारत आई थी। वर्ष 1850 में भारत में विशेष तौर पर औद्योगिकीकरण की शुरुआत हो गई थी। सूती मिलें और खादानें शुरुआत में यहां आरंभ हुईं। धीरे-धीरे उन्नत होते-होते यहां कागज तैयार करने और चमड़े के कारखानें तक अस्तित्व में आ गये। लोहे और इस्पात के कारखाने भी यहां वर्ष 1908 में शुरू हुए थे। उसी तरह से 1932 तक शक्कर के कारखाने तक स्थापित हो गये, जिनसे वर्ष 1936 तक 95 फीसदी आवश्यकताओं की पूर्ति देश में होने लगी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी भारत में उद्योग तेजी से फले-फूले। डीजल इंजन के साथ कास्टिक सोडा, क्लोरिन, सोड ऐश, साइकिलें, वायुयानों और मोटरकारों आदि बनाने के भी कारखाने स्थापित हो गये। देश में हर क्षेत्र में विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएं तक बना दी गईं।

भारत में वैश्वीकरण

भारत के परिप्रेक्ष्य में तो वैश्वीकरण का विशेष महत्व रहा है, क्योंकि इसकी परिपाटी में वसुधैव कुटुंबकम की भावना बसी है। इसका अर्थ होता है इस धरती पर जितने भी लोग हैं, सभी अपने ही परिवार का हिस्सा हैं। भारत में दुनिया की लगभग 17 फीसदी आबादी निवास करती है। उद्योग-धंधों से लेकर संचार तकनीकों तक में प्रगति के परिणामस्वरूप भारत के लिए भी पूरी दुनिया एक ग्लोबल विलेज के रूप में तब्दील हो गई है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत भी वैश्वीकरण से अछूता नहीं रह गया है।

दुनिया के अन्य देशों में औद्योगिकीकरण वैश्वीकरण

जिस तरह से 18वीं शताब्दी में अंतिम 20 वर्षों के दौरान फ्रांस में क्रांति हुई, उसका अनुसरण करते हुए इंग्लैंड ने अपने यहां औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देने का सर्वप्रथम प्रयास किया और उपनिवेश बनाने कच्चे माल की कमी को पूरा करने के लिए शुरू किये। इंग्लैंड में हुई क्रांति का अनुसरण बाकी देश भी धीरे-धीरे करने लगे। इंग्लैंड में 19वीं शताब्दी में विकसित हुई मशीनें अधिकाधिक उपयोग में आने लगीं। नये तरीके विकसित हुए। विश्वव्यापी बाजार के इसके फलस्वरूप जन्म हुआ। बढ़ते औद्योगिकीकरण की वजह से औपनिवेशिक साम्राज्यवाद का भी विस्तार होता चला गया। श्रमिक आंदोलन तक इसके फलस्वरूप अस्तित्व में आये। औद्योगिकीकरण हुआ तो इससे दुनिया के देश एक-दूसरे के निकट भी अपने राजनीतिक और आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आने लगे। इससे वैश्वीकरण को बढ़ावा मिलने लगा।

निष्कर्ष

औद्योगिकीकरण और वैश्वीकरण ने आज न केवल भारत, बल्कि दुनिया का नक्शा बदलकर रख दिया है। हालांकि, इनकी वजह से कई चुनौतियां भी पैदा हुई हैं, जिनका सामना करने के लिए औद्योगिकीकरण और वैश्वीकरण अधिक सुनियोजित तरीके से प्रोत्साहित किये जाने की आवश्यकता है।

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