भारत के विभाजन की कहानी

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तीन सौ साल शासन करने के बाद जब अंग्रेजों ने अगस्त, 1947 में भारत छोड़ स्वदेश वापस जाने का फैसला लिया, तब भारत मुल्क को दो स्वतंत्र राष्ट्र राज्यों में विभाजित कर दिया गया: हिंदू बहुमत – भारत राज्य और मुस्लिम बहुमत – पाकिस्तान। इसके तत्काल बाद, वहाँ मानव इतिहास में सबसे बड़े प्रवास में से एक का प्रारंभ हुआ जिसके अंतर्गत लाखों मुसलमानों को पश्चिम और पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश बाद के रूप में जाना जाता है) जाना था, जबकि लाखों हिंदुओं और सिखों को विपरीत दिशा में आगे बढ़ना था। सैकड़ों लोग ऐसे भी थे जो अपनी मंजिल तक कभी पहुंच ही नही पाऐ।

इस प्रवास के दौरान हुए भयानक खूनी दंगों को याद कर आज भी लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं और अपनों को खो देने के दर्द को सोच कर आखों से पानी बह पड़ता है। इस नरसंगहार ने लगभग 200,000 से 2,000,000 लोगों की जान ले ली और लाखों लोगों को बेघर कर दिया और पता नहीं कितनों के परिवार बिछड़ गए।

भारत में अंग्रेजों के शासन की कहानी सन् 1609 से शुरू होती है जब जहाँगीर ने अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने की इजाज़त दी थी। जैसे-जैसे समय बीतता गया अंग्रेजों ने भारतीय शासकों के नीजी राजनितिक मामलों में दखल देना शुरू कर दिया जैसे कि अगला राजा किसको बनना चाहिए, किस ओहदे पर किसको नियुक्त करना चाहिए, इत्यादि। धीरे-धीरे अंग्रेजों ने भारत की सत्ता अपने हाथ में ले ली और भारतीय लोगों पर अनेकों ज़ुल्म करे। जब जुल्मो की हद पार हो गई तब भारतीय नौजवानों ने गाँधी तथा नेहरू जैसे नेताओं की छत्र-छाया में इन अत्याचारों के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाना शुरू कर दी। यह बगावत चल ही रही थी कि 1939 में दूसरे विश्व-युद्ध का ऐलान कर दिया गया जिसने आग में घी का काम किया। गांधी जी ने 1942 में अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की। भारतीयों की तरफ से इतना विरोध देखने के बाद अंग्रेजों को यह अभास हो गया कि भारत में अब उनके दिन शेष ही बचे हैं और उन्होंने वतन वापस जाने का फैसला कर लिया।

अंग्रेजों ने भारतीयों के साथ सत्ता हस्तांतरण के विषय के ऊपर चर्चा करने के लिए 1946 में कैबिनट मिशन को भारत भेजा परंतु चर्चा के अंत में यह स्पष्ट हो गया कि भारत के विभाजन के सिवा अब और कोई मार्ग नहीं बचा है।अंततः 15 अगस्त,1947 को भारत का विभाजन कर दो राज्यों का गठन कर दिया गया।

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