Trilateral Agreement: इतिहास के पन्नों में दर्ज है ‘दिल्ली समझौता’

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Delhi agreement

विश्व इतिहास में भारत विभाजन को याद किया जाता है, 1947 में किया गया ये विभाजन ऐसा विभाजन था,जिसे धर्म के आधार पर किया गया था। इस विभाजन के फलस्वरुप एक मुस्लिम बाहुल्य देश का जन्म भी विश्व के नक़्शे पर हुआ था, जिसे पाकिस्तान के नाम से जानते हैं। इस विभाजन को लेकर आज भी एक सवाल बार-बार उठता ही रहता है कि क्या उद्देश्य था विभाजन का, और जो उद्देश्य था क्या वो पूरा हो गया? इसी सवाल के जवाब की तलाश में साल 1971 में फिर से एक देश का निर्माण होता है, लेकिन इस बार चोट लगी थी पाकिस्तान को और निर्माण हुआ था बांग्लादेश का, लेकिन इस निर्माण और चोट में भारत की भूमिका काफी अहम थी।

साल 1971 में भारत-पाकिस्तान का युद्ध हुआ, जिस युद्ध में पाकिस्तान की हार हुई और पूर्वी पाकिस्तान कटकर नया देश बांग्लादेश बना, इसके बाद समझौतों के दौर की शुरुआत होती है, पहला समझौता विवादों को खत्म करने के लिए 2 जुलाई 1973 को किया जाता है जिसे शिमला समझौता के रूप में याद किया जाता है।

इस लेख की प्रमुख बातें-

  • क्या है दिल्ली समझौता (1973) Trilateral Agreement?
  • भारत-पाकिस्तान युद्ध (1971) के मुख्य बिंदु
  • शेख मुजीबुर रहमान का संघर्ष
  • पाकिस्तान ने की थी युद्ध की शुरुआत
  • Trilateral Agreement के फैक्ट्स
  • एक नजर में भारत-पाकिस्तान के कुछ प्रमुख समझौते
  • 1971 के युद्ध के बाद भारत सरकार ने उठाया था ये कदम
  • सारांश

इसके बाद साल 1973 आता है, इसी साल भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच एक Trilateral Agreement साइन होता है, आज हम इस लेख में इसी एग्रीमेंट के ऊपर बात करेंगे जिसे दिल्ली समझौता भी कहा जाता है।

क्या है दिल्ली समझौता (1973) Trilateral Agreement?

दिल्ली समझौता एक ऐसा एग्रीमेंट है जो तीन देशों के बीच साइन हुआ था, इसलिए इस एग्रीमेंट को Trilateral Agreement भी कहा जाता है, दिल्ली समझौता 28 अगस्त 1973 में भारत, पकिस्तान और बांग्लादेश के बीच साइन हुआ था। जिसकी पुष्टि भारत और पाकिस्तान की सरकार ने की थी।

इस समझौते के तहत प्रिजनर ऑफ़ वॉर (pow) जो तीनों देशों में थे, यानी 1971 के युद्ध में जो लोग बंदी बना लिए गये थे, उन्हें आज़ाद करना था। इस समझौते की खास बात ये थी कि तीनों देश ने जितने भी लोगों को बंदी बनाया हुआ था, साल 1971 के युद्ध से, उन्हें तत्काल प्रभाव से दूसरे देश को लौटाना था।

  • इस ट्रीटी को 28 अगस्त 1973 में तीनो देश के उस दौर के विदेश मंत्री ने दिल्ली में साइन किया था, इसलिए इसे दिल्ली समझौता भी कहा जाता है।
  • ‘द डेली स्टार’ के मंथली फोरम के अनुसार इस समझौते की आलोचना भी हुई थी, क्योंकि पाकिस्तान ने बांग्लादेश में मौजूद उर्दू बोलने वाले और 195 सीनियर मिलिट्री ऑफिसर्स को लेने से मना कर दिया था।

भारत-पाकिस्तान युद्ध (1971) के मुख्य बिंदु –

दिल्ली समझौते को हमने ऊपर समझा लेकिन इस किस्से की जड़ तक जाने के लिए हमें थोड़ा सा पीछे भी जाना होगा, ज्यादा पीछे नहीं बस दो साल, साल 1971 में जब भारत-पाकिस्तान (India pakistan 1971)का युद्ध हुआ था।

बात कुछ ऐसी थी कि 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ था, और एक नया मुस्लिम बाहुल्य देश बना था, जिसका नाम पकिस्तान है, उस समय सिरिल रैडक्लिफ ने पाकिस्तान को दो हिस्सों में बाटा था, एक था पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा और एक था पश्चिमी पकिस्तान का हिस्सा, पश्चिमी पकिस्तान में उर्दू बोली जाती थी और पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली, इसके कारण पूरी सियासत भी पश्चिमी पाकिस्तान के पास ही थी।

शेख मुजीबुर रहमान का संघर्ष-

अब यहां पर शेख मुजीबुर रहमान का संघर्ष भी याद करना चाहिए, जो उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान में शुरू किया था। इसके लिए पाकिस्तानी हुकूमत ने उनके खिलाफ देश द्रोह का केस भी चलाया था। लेकिन पाकिस्तानी सरकार की ये चाल उल्टी पड़ गई थी, और शेख पूर्वी पकिस्तान के हीरो बनकर उभरे थे।

  • पाकिस्तान में 1970 के चुनाव हुए, चुनाव के नतीजे में पूर्वी पाकिस्तान में शेख मुजीबुर रहमान की पार्टी पूर्वी पाकिस्तानी अवामी लीग को बहुमत मिला, पूर्वी पाकिस्तान की सिर्फ 2 सीटों को छोड़कर सभी सीटें उनकी पार्टी ने जीत ली, इसके बाद ऐसा लगा कि शेख मुजीबुर रहमान के हाथों में सत्ता आएगी, लेकिन पश्चिमी पकिस्तान को ये बर्दाश्त नहीं हुआ, और उन्होंने पूर्वी हिस्से में सेना का बल भेज दिया।
  • पूर्वी पाकिस्तान में आन्दोलन शुरू हो चुके थे, इस आन्दोलन को दबाने के लिए सेना ने अत्याचार का सहारा लिया और पूर्वी पाकिस्तान में आजादी के नारे भी लगने लगे थे।
  • 1 साल में करीब करोड़ों लोग भारत में आने लगे थे, इससे भारत के ऊपर पाकिस्तान पर कार्यवाई करने का दबाव भी बढ़ रहा था।
  • टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मार्च 1971 के अंत में भारतीय सरकार ने मुक्ति वाहिनी की मदद करने का फैसला किया था। मुक्ति वाहिनी पूर्वी पाकिस्तान की सेना थी, जो नए देश की मांग कर रही थी।
  • 31 मार्च, 1971 को तब की भारतीय प्रधनामंत्री इंदिरा गांधी ने संसंद में भाषण देते हुए पूर्वी बंगाल के लोगों के मदद की बात को हवा दी थी।
  • द हिन्दू की रिपोर्ट के अनुसार 29 जुलाई, 1971 भारतीय संसद में मदद की घोषणा हुई थी।

पाकिस्तान ने की थी युद्ध की शुरुआत-

जब भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पर नजर रखने लगी तो फिर पश्चिमी पकिस्तान में ये आवाज उठने लगी कि भारत के साथ युद्ध की शुरुआत की जानी चाहिए, उस दौर में पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान हुआ करता था, 23 नवंबर, 1971 को पाकिस्तान सेना को युद्ध की तैयारी करने के आदेश भी दिए थे।

  • 3 दिसंबर, 1971 ही वो तारीख थी जब पाकिस्तानी वायु सेना भारत पर हमला करने की हिमाकत की थी, इसी दिन युद्ध की शुरुआत भी हुई थी।
  • 16 दिसंबर, 1971 के दिन पाकिस्तानी सेना ने घुटने टेक दिए और आत्म समर्पण भी किया था, इसी के साथ दुनिया के नक़्शे में बांग्लादेश नामक देश का जन्म भी हुआ था।

Trilateral Agreement के फैक्ट्स-

  • साल 1971 ही वो साल था जब भारत ने पाकिस्तान को ना मिटने वाला जख्म दिया था, और इसी साल दुनिया के नक़्शे में बांग्लादेश एक इंडिपेंडेंट कंट्री के तौर पर नजर आया था।
  • साल 1971 के बांग्लादेश युद्ध के बाद हज़ारों की संख्या में मिलिट्री ऑफिसियल और बंगाली लोगों को पश्चिमी पाकिस्तान में पाकिस्तान की हुकुमत ने बंदी बना लिया था, बांग्लादेश में भी कई उर्दू बोलने वाले लोग अपनी स्वेक्षा से वेस्ट पाकिस्तान जाना चाहते थे।
  • 16 दिसम्बर 1971 को जब पूर्वी पाकिस्तान ने भारतीय सेना के सामने सरेंडर कर दिया था, तब भारत के पास भी पाकिस्तानी बंदी (prisoners of war) मौजूद थे।
  • यू।एन के अनुसार, इस ट्रीटी के अंतर्गत 121,658 बंगाली लोग पाकिस्तान से बांग्लादेश की तरफ गए थे। इनमे कई बड़े ऑफिसर्स और मिलिट्री के लोग भी शामिल थे।
  • यू।एन की ही रिपोर्ट के अनुसार 10,8744 लोग इस समझौते के तहत बांग्लादेश से पाकिस्तान की तरफ रवाना हुए थे।
  • भारत ने भी इस समझौते के तहत 6500 पाकिस्तानी बंदी (prisoners of war) को पाकिस्तान को सौंपा था, इन सभी लोगों को ट्रेन से पाकिस्तान भेजा गया था।
  • साल 1974 में अमीर अब्दुल्लाह खान नियाजी आखिरी पाकिस्तानी ऑफिसर थे जिन्हें इस समझौते के तहत पाकिस्तान भेजा गया था।

एक नजर में भारत-पाकिस्तान के कुछ प्रमुख समझौते-

  • साल 1947 में जिन्ना- माउंटबेटन वार्ता
  • साल 1949 में कराची समझौता
  • साल 1950 में लियाकत-नेहरू समझौता
  • साल 1960 में सिंधु जल-संधि
  • साल 1966 में ताशकंद समझौता
  • साल 1972 में शिमला समझौता
  • साल 1973 में दिल्ली समझौता
  • साल 1988 में इसलामाबाद समझौता

1971 के युद्ध के बाद भारत सरकार ने उठाया था ये कदम-

इस पूरे लेख में आपने 1971 के युद्ध से 1973 के दिल्ली समझौते तक के फैक्ट्स को पढ़ा है, इसी लिस्ट में हम एक भूल को भूल रहे थे, अब उस भूल को भी याद कर लेते हैं। साल 1971 में जब युद्ध हुआ था तो भारतीय सेना लाहौर तक पहुंच गई थी, उस समय भी हम चाहते तो 1947 और 1965 की राजनीतिक भूल को सुधार सकते थे, लेकिन भारतीय सरकार ने उदार दिल दिखाते हुए बिना अपना कश्मीर लिए 90,000 पाकिस्तानी बंदी सैनिको को छोड़ दिया था।

सारांश

भारत विभाजन को आज 7 दशक से भी ज्यादा का वक्त हो चुका है, पाकिस्तान एक नेचुरल देश नहीं है, ये बनाया गया मुल्क है, इसलिए आज ये पूरे विश्व के लिए आतंकवाद का गढ़ बन चुका है, इसके आतंकवाद से हर बार दो-दो हाँथ भारत को ही करना पड़ता, इन 7 दशकों में पता नहीं कितनी बार भारतीय सरकार ने कूटनीति रणनीति के तहत संबंध सुधारने की कोशिश की है, लेकिन नतीजा क्या हुआ है? आज भी कश्मीर मुद्दा वहीं खड़ा है, जहां 75 साल पहले था।

Trilateral Agreement कहें या दिल्ली समझौता ये ट्रीटी भी भारतीय इतिहास में दर्ज हो चुकी है, इस ट्रीटी में तीन देश शामिल हुए थे, इन तीनों देश में से जिसने ट्रीटी का उलंघन किया था वो देश भी पाकिस्तान ही था, इसके पीछे का कारण ये है, कि सियासत तो बस नाम की है पाकिस्तान में, उस देश को वहां का प्रधानमंत्री नहीं बल्कि वहां की आर्मी कंट्रोल करती है, और वहां की आर्मी में आतंकवाद का कितना प्रभाव है, ये बात तो दुनिया जानती है।

आज के दौर और सियासत को देखते हुए भारत के लिए एक प्रमुख बात है जिस पर ध्यान देना चाहिए, वो ये है कि हमें अपनी सुरक्षा के प्रति कत्तई कोताही नहीं बरतनी चाहिए।