China-Russia Planetary Pact एक नजर में

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china-russia Pact

विकास की दौड़ में दुनिया का कोई भी देश एक-दूसरे से पीछे नहीं रहना चाहता। खासकर बात जब दुनिया की बड़ी महाशक्तियों की हो, तो उनके बीच तो एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ हमेशा ही लगी रहती है। हाल ही में हुआ China-Russia Planetary Pact भी इसी का नतीजा है। जी हां दोस्तों, अमेरिका काफी लंबे समय से अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को गति देने में पूरे जोर-शोर से जुटा हुआ है। उसका लक्ष्य सोवियत यूनियन को कड़ी टक्कर देना है। ऐसे में भला रूस कैसे पीछे रह सकता था। इसलिए इस बार रूस ने अमेरिका को टक्कर देने के लिए चीन का हाथ थाम लिया है।

रूस और चीन, इन दोनों देशों ने मिलकर Lunar Space Station यानी कि चंद्रमा पर साइंटिफिक रिसर्च स्टेशन बनाने की घोषणा कर दी है। एक ओर जहां वर्ष 2024 में अमेरिका की तैयारी एक बार फिर से चांद पर इंसान को भेजने की है और वह Artemis मिशन को इस वक्त अंजाम देने में भी जुटा हुआ है, तो दूसरी ओर रूस, जिसने कि लंबे अरसे तक अमेरिका के साथ अंतरिक्ष में उसके सहयोगी की भूमिका निभाई है, अब चीन के साथ मिलकर उसने भी अंतरिक्ष को एक युद्धभूमि में बदल देने का इशारा कर दिया है।

इस लेख में आप पढ़ेंगे:

  • बाकी देश भी कर सकेंगे इस्तेमाल
  • महत्वपूर्ण है समझौते का वक्त
  • डिजाइन करने का उद्देश्य
  • अलग रास्ते पर चल रहा रूस
  • अमेरिका और चीन का मिशन

बाकी देश भी कर सकेंगे इस्तेमाल

चीन और रूस के बीच जो यह समझौता हुआ है, इसके बारे में चीन के राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन की वेबसाइट पर भी घोषणा कर दी गई है। इसमें यह बताया गया है कि जिस Lunar Space Station का निर्माण दोनों देश मिलकर करने जा रहे हैं, उसका इस्तेमाल केवल ये दोनों ही नहीं, बल्कि बाकी देश भी कर पाएंगे। वैसे यह कब तक बनकर तैयार होगा, इसके बारे में फिलहाल कोई निर्णय नहीं लिया गया है।

माना जा रहा है कि China-Russia Planetary Pact के हो जाने से अंतरिक्ष सहयोग के क्षेत्र में दुनिया में एक नए युग की शुरुआत होने जा रही है। हाल ही में रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉस कॉसमॉस और चीन के राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन ने मिलकर एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसका लक्ष्य अंतर्राष्ट्रीय लूनर रिसर्च स्पेस स्टेशन का संयुक्त रूप से निर्माण करना है।

महत्वपूर्ण है समझौते का वक्त

यह वक्त जब दोनों देशों के बीच यह समझौता हुआ है, बहुत मायने रखता है। वह इसलिए कि प्रौद्योगिकी चोरी पर अमेरिकी कांग्रेस ने चिंता जताई है। इसी को देखते हुए नासा और चीन के बीच लगभग जितने भी तरह के संपर्क मौजूद हैं, इन सभी को फिलहाल प्रतिबंधित कर दिया गया है। रूस की तरफ से इसके बारे में बताया गया है कि एक एक्सपेरिमेंटल रिसर्च फैसेलिटीज के कांपलेक्स के रूप में यह स्टेशन काम करने वाला है। चांद की सतह पर या फिर उसकी कक्षा में इसे स्थापित किया जाएगा।

डिजाइन करने का उद्देश्य

इसे डिजाइन ही इसी उद्देश्य से किया गया है कि अलग-अलग तरह के रिसर्च को इसके जरिए आसानी से अंजाम दिया जा सके। इसके लिए इन दोनों ही देशों ने आपस में जिम्मेवारियां भी तय की हैं कि दोनों क्या-क्या काम करेंगे। हालांकि, ये जिम्मेवारियां कौन-कौन सी हैं, इसके बारे में अब तक इन दोनों ने कोई भी जानकारी नहीं दी है। जो Lunar Space Station बनाया जा रहा है, इसकी खासियत यह होगी कि यहां पर इंसानों के लायक हर तरह की सुविधाएं उपलब्ध होंगी। यहां तक कि मानवरहित यान भी यहां पहुंचेंगे तो उनके लिए भी यहां पर काम करना आसान होगा।

चांद के बारे में जितनी ज्यादा हो सके जानकारी इकट्ठा करना इसका उद्देश्य है। इस जानकारी का इस्तेमाल अलग-अलग तरीके से किया जाएगा। मुख्य रूप से शोध गतिविधियों को इसके जरिए अंजाम दिया जाना है। साथ ही तकनीक का विकास भी इसके उद्देश्यों में छिपा हुआ है। अमेरिका की स्पेस एजेंसी इससे पहले रूस पर निर्भर हुआ करती थी। रूसी सोयूज स्पेसक्राफ्ट की सहायता से अंतरिक्ष में इसका जाना होता था। हालांकि, SpaceX के Crew Dragon स्पेसक्राफ्ट से अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ने पिछले साल पहली बार 2011 के बाद अपने अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजा था।

अलग रास्ते पर चल रहा रूस

China-Russia Planetary Pact के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या रूस ने अमेरिका से इतर कोई और रास्ता चुन लिया है। इसका विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन कार्यक्रम इस दशक के अंत तक समाप्त होने जा रहा है। ऐसे में रूस ने जो चीन के साथ जाने की नीति अपनाई है, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि न केवल अमेरिका, बल्कि दूसरे देशों से भी रूस की खुद को पृथक करने की कोशिश चल रही है। उसने अमेरिका के Artemis Accords को भी मानने से इनकार कर दिया है। चांद पर इंटरनेशनल एक्सप्लोरेशन के लिए यह बनाया गया था। उसका कहना है कि यह पूरी तरीके से अमेरिका पर ही केंद्रित है। इसलिए वह इसे मानने से इनकार करता है।

अमेरिका और चीन का मिशन

अंतरिक्ष में एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए इस वक्त दुनिया के कई देशों के बीच बड़ी टक्कर हो रही है। इसी तरह की एक टक्कर चीन और अमेरिका के बीच भी देखने के लिए मिल रही है। लाल ग्रह मंगल पर ये दोनों ही देश जीवन को तलाशने में जुटे हुए हैं। दोनों ही देशों ने मंगल मिशन चला रखा है। मंगल के Jezero Crater पर लैंड करने में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA के Perseverance रोवर को सफलता भी मिल गई है। मंगल की चट्टानों में जो प्राचीन माइक्रोबियल लाइफ के निशान छिपे हुए हैं, इन्हें खोजने के लिए अब यह तैयार भी हो रहा है।

वहीं दूसरी ओर मंगल की कक्षा में चीन द्वारा भेजा गया तियानवेन-1 भी चक्कर काट रहा है। कई हाई डेफिनेशन तस्वीरें भी इसके द्वारा कुछ दिनों पहले भेजी गई हैं। इस बात की पूरी संभावना है कि मई या जून में तियानवेन-1 इसकी सतह पर भी पहुंच जाएगा। सतह पर पहुंच जाने के बाद 90 दिनों तक यह काम करता रहेगा।

और अंत में

China-Russia Planetary Pact के बाद अब इसके पूरे आसार बन रहे हैं कि अंतरिक्ष कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की दिशा में भारत सहित दुनिया के बाकी देश भी अपनी दिलचस्पी और बढ़ाएंगे। दुनिया भर में अंतरिक्ष को लेकर हर तरह के प्रयोग और अभ्यास चल रहे हैं, जिनके अब और रफ्तार पकड़ने की उम्मीद है।

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