आइए जानते हैं कि जन-गण-मन क्यों, कब और कैसे बना हमारा राष्ट्रगान

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National Anthem of India

भारत में जन्म लेने वाले हर बच्चे को स्कूल के शुरुआती दिनों से ही जन-गण-मन सिखाया जाता है। उन्हें इस गान के साथ- साथ देश और देशभक्ति से भी रुबरु करवाया जाता है। उन्हें ये बताया जाता है कि जन-गण-मन ही हमारा राष्ट्रगान है। जी हां, राष्ट्रगान यानी हमारे देश की पहचान। राष्ट्रगान हम सभी देशवासियों को एकजुट करता है। ये हमारे देश के इतिहास और परंपरा को दर्शाता है। ये तो भारत में रहने वाले हर भारतवासी को मालूम है कि जन-गण-मन मुख्य रुप से राष्ट्रीय अवसरों पर गाया जाता है, लेकिन क्या आपको मालूम है कि आखिरकार ये कैसे, कब और क्यों हमारे देश का राष्ट्रगान बना। तो चलिए आज हम जन-गण-मन के इतिहास के बारे में जानते हैं।

किसने और कब की राष्ट्रगान की रचना

जन-गण-मन की रचना विश्वविख्यात कवि, साहित्य और दार्शनिक गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने की थी। उन्होंने इसे एक कविता के रुप में साल १९०५ में लिखा था। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जन-गण-मन को बंगाली में लिखा था।

जनगणमनका इतिहास

जन-गण-मन पहली बार २७ दिसंबर १९११ को कलकत्ता (कोलकात्ता) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वार्षिक सम्मेलन के दूसरे दिन गाया गया था। रवीन्द्रनाथ टैगोर की भतीजी  सरला देवी चौधरानी ने कुछ स्कूली छात्रों के साथ इस गीत को अपनी आवाज़ दी थी, और कांग्रेस अध्यक्ष बिशन नारायण दर, भूपेन्द्र नाथ बोस, अम्बिका चरण मजूमदार जैसे अन्य नेताओं के सामने गाया था।

साल १९११ तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करती थी। जिसके बाद दिल्ली को देश की राजधानी घोषित कर दिया गया। साल १९०५ में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में वहां के लोग उठ खड़े हुए, तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए राजधानी कलकत्ता से हटाकर दिल्ली कर दी । पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे, तब अंग्रेजों ने अपने इंग्लैंड के राजा ‘जोर्ज पंचम’ को भारत आमंत्रित किया था, ताकि यहां के लोग शांत हो जाएं। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम १९११ में भारत में आया। रवीन्द्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि उन्हें एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा। उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे। कहा जाता है कि तभी रवीन्द्रनाथ टैगोर ने १९०५ में लिखी अपनी कविता जन-गण-मन को जॉर्ज पंचम के स्वागत के लिए पेश किया था।

जनगणमन को ही क्यों माना गया राष्ट्रगान

२४ जनवरी १९५० को जन-गण-मन के हिन्दी संस्करण को राष्ट्रगान का दर्जा दिया गया। देश आजाद होने के बाद इसी दिन संविधान सभा में इसे राष्ट्रगान के रुप में अपनाया गया। और तभी से हमलोग इसे राष्ट्रगान के रुप में गाते आ रहे हैं।

जन गण मन को इसके मतलब की वजह से राष्ट्रगान बनाया गया। इसके कुछ अंशों का अर्थ होता है कि भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है। हे अधिनायक (सुपरहीरो) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। इसके साथ ही इसमें देश के अलग- अलग राज्यों का जिक्र भी किया गया था और उनकी खूबियों के बारे में बताया गया था। आपको बता दें कि पहले वंदे मातरम् को राष्ट्रगान बनाने की बात तय हुई थी, लेकिन वंदे मातरम् के शुरुआती चार लाइनों को ही देश के लिए समर्पित किया गया है, बाकी की पूरी लाइनें मां दुर्गा की महिमा को दर्शाती हैं। ऐसे में उस वक्त यही सोचा गया कि देवी- देवता की महिमा- मंडन वाले गीत को राष्ट्रगान बनाना सही नहीं होगा। इसलिए जन-गण-मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत बनाने का निर्णय लिया गया।

राष्ट्रगान का अर्थ

राष्ट्रगान

जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता!

पंजाब सिन्धु गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंग

विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छल जलधि तरंग

तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशिष मागे,

गाहे तव जय गाथा।

जन गण मंगलदायक जय हे भारत भाग्य विधाता!

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

मतलब

जन गण के मनों के उस अधिनायक की जय हो, जो भारत के भाग्यविधाता हैं!

उनका नाम सुनते ही पंजाब सिन्ध गुजरात और मराठा, द्राविड़ उत्कल व बंगाल

एवं विन्ध्याचल, हिमाचल व यमुना और गंगा पे बसे लोगों के हृदयों में मनजागृतकारी तरंगें भर उठती हैं।

सब तेरे पवित्र नाम पर जाग उठते हैं, सब तेरे पवित्र आशीर्वाद को पाने की अभिलाशा रखते हैं,

और सब तेरे ही जयगाथाओं का गान करते हैं।

जनगण के मंगल दायक की जय हो, हे भारत के भाग्यविधाता

विजय हो विजय हो विजय हो, तेरी सदा सर्वदा विजय हो ।

राष्ट्रगान से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें

  • राष्ट्रगान को पूरा गाने में ५२ सेकेंड का समय लगता है। लेकिन कई अवसरों में इसे संक्षिप्त में भी गाया जाता है, जिसमें २० सेकेंड का वक्त लगता है। उसमें राष्ट्रगान के पहले और आखिरी लाइनों को गाया जाता है।
  • राष्ट्रगान में कुल ५ पद हैं।
  • ‘जन गण मन’ के बोल और संगीत दोनों ही रवीन्द्रनाथ टैगोर ने तैयार किये हैं। आज हम राष्ट्रगान को जिस लय में गाते हैं, उसे रवीन्द्रनाथ टैगोर ने आंध्र प्रदेश के एक छोटे-से जिले मदनपिल्लै में संगीतबद्ध किया था।
  • जन-गण-मन का हिंदी और उर्दु अनुवाद कैप्टन आबिद अली ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के कहने पर किया था।
  • मशहूर कवि जेम्स कज़िन की पत्नी मारग्रेट ने अंग्रेजी में इसका अनुवाद किया था। वो बेसेंट थियोसोफिकल कॉलेज की प्रधानाचार्य थीं।
  • बंगाली में लिखे राष्ट्रगान में सिंध का नाम आता था, लेकिन बाद में इसे सिंध की जगह सिंधु कर दिया गया। क्योंकि देश के बंटवारा के बाद सिंध पाकिस्तान का एक अंग हो चुका था।
  • राष्ट्रगान से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इसे गाते समय सावधान की अवस्था में खड़े हो जाना चाहिए।

निष्कर्ष

हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश के राष्ट्रगान ‘आमार सोनार बांग्ला’ को भी रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा था। वे दुनिया के अकेले ऐसे कवि हैं, जिनकी रचनाओं को दो देशों ने अपना राष्ट्रगान बनाया। राष्ट्रगान से जुड़ा हमारा ये लेख अगर आपको अच्छा लगे, तो हमें नीचे कमेंट बॉक्स में कमेंट करके जरूर बताएं।

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