Rafale Deal- क्या है राफेल सौदा और उसके पीछे का विवाद?

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Rafale Deal

अगर आप अंबाला एयरबेस याद करेंगे तो आपको याद आएगा दिन बुधवार और तारीख 29 जुलाई 2020, इसके साथ याद आएगा राफेल विमान और राफेल डील विवाद (Rafale deal controversy), दोस्तों देश की जनता के लिए ख़ुशी की बात ये है कि आखिर कार राफेल लड़ाकू विमान आ ही गया, अंबाला एयरबेस पर 5 राफेल लड़ाकू विमान ने दस्तक दे दी है।

इसी के साथ उनकी तैनाती जहां हुई है वो जगह कूटनीतिक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि वहां से लाइन ऑफ़ कंट्रोल और लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल यानी पाकिस्तान और चीन की सीमा, वहां से राफेल के टार्गेट पॉइंट पर आते हैं।

आज हमारी कोशिश होगी कि इस लेख के माध्यम से राफेल विमान और राफेल डील विवाद का पूरा कांसेप्ट आपके समक्ष रख दिया जाए।

लेख के मुख्य बिंदु

  • सियासत से लेकर संसद तक को हिलाया है राफेल ने
  • साल 1967 का दौर
  • अब बात करते हैं  फैक्ट्स की और राफेल डील की
  • क्या है द न्यू राफेल डील
  • विपक्ष का सरकार पर हमला
  • इंट्रेस्टिंग और टर्निंग पॉइंट ऑफ़ राफेल डील
  • अब समझते हैं ऑफ़ सेट क्लॉज़ क्या होता है
  • ऑफ सेट क्लॉज़ का नई राफेल डील से कनेक्शन
  • सरांश

सियासत से लेकर संसद तक को हिलाया है राफेल ने

सवाल ये खड़ा होता है कि 36 विमानों के सौदे में आखिर ऐसा क्या था, जिसने भारतीय सियसत से लेकर संसद तक की कुर्सियों में कप-कपाहट पैदा कर दी थी।  संसद और राजनीति एक तरफ, इसने तो सर्वोच्च न्यायलय की साख पर भी सवाल खड़े कर दिए थे।  विपक्ष ने सियासतदारों से ऐसे-ऐसे सवाल किए थे इस राफेल डील को लेकर की उस तरह की परिकथा इसके पहले रची नहीं गई थी।  

हर एक भारतीय के जहन में एक सवाल उठता रहा कि आखिर राफेल ऐसी चीज क्या है और फ़्रांस की कंपनी दसाल्ट एविएशन से ऐसा क्या कॉन्ट्रैक्ट हुआ था, जिसने भारतीय राजनीति को बार-बार गोते खाने में मजबूर कर दिया था।  राफेल विमान को लेकर सरकार से कई सवाल पूछे गए, उसमे से कुछ सवाल ये हैं कि क्या वाकई राफेल में कोई जादुई तकनीक है जिसका तोड़ ना ही पाकिस्तान के पास है और ना ही चीन के पास? क्या इससे सस्ते दाम में हम राफेल खरीद सकते थे? सवाल तो बहुत हैं जिनके जवाब सिर्फ सियासतदारों के पास हैं।  लेकिन अब हम चलते हैं कुछ इतिहास के पन्नों पर, जिससे कुछ धूल साफ़ होगी।

साल 1967 का दौर

साल 1967 के दौर को याद करते हुए जब हमने इंडियन एक्सप्रेस के पन्नों को पलटाया तो पता चला कि उस दौर में भी पालमपुर एयरबेस पर चार लड़ाकू विमान ने दस्तक दी थी।  वो विमान भी फ़्रांस से ही आए थे।  उन विमानों को भी दसाल्ट एविएशन कंपनी ने ही बनाए थे, उस दौर में भी संसद में समाजवादियों ने तब के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु से तीखे सवाल दागे थे। उनसे सवाल किए गए थे कि हमें लड़ाकू विमान नहीं रोटी की जरुरत है, हमारी अर्थव्यवस्था इसकी इजाज़त देती है क्या?

राम मनोहर लोहिया के ऊपर लिखी किताब पढ़िए तो पता चलता है कि उन्होंने सड़कों पर आन्दोलन के जरिये ये सवाल पूछा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में सरकार क्यों नहीं सोच रही है? तब आज़ादी के बाद पहली बार भारत ने अन्तराष्ट्रीय बाज़ार से लड़ाकू विमान खरीदे थे।

  • उन सवालों से नेहरु कटे नहीं थे बल्कि पार्लियामेंट के भीतर जवाब देते हुए कहा था कि “अगर विमानों में लगे पैसों से इस देश के किसी भी मजदूर, किसान का नुकसान हुआ हो तो आप बताइए, मैं माफ़ी मांगने को तैयार हूं। ”
  • उस दौर में और आज के दौर में बहुत बड़ा अंतर है, आज अन्तराष्ट्रीय लेवल पर भारत की स्थति बदल चुकी है, आज सिर्फ 4 लड़ाकू विमान नहीं आए हैं, बल्कि एक लंबी कतार है जो आने वाली है।

अब बात करते हैं  फैक्ट्स की और राफेल डील की

Rafale deal of India के ऊपर इतने ओपिनियन आपको मिलेंगे जिसकी गिनती करना भी मुश्किल है।  इसलिए आज हम यहां ओपिनियन पर बात नहीं करेंगे बल्कि एक्चुअल फैक्ट्स पर बात करेंगे, इंडिया टुडे और हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार इस कहानी की शुरुआत होती है 28 अगस्त 2007 से जब हमारी मिलिट्री को देखने वाली डिफेंस मिनिस्ट्री ने एक प्रपोजल को एक्सेप्ट किया था कि वो 126 MMRCA (मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयर क्राफ्ट फाइटर जेट्स) को खरीदने वाले हैं।

  • फाइटर जेट खरीदने के लिए कई कम्पनियों के जेट को देखने की कवायद की शुरुआत हुई और मई 2011 में दो कम्पनियों को शॉर्ट लिस्ट भी किया गया। उनके नाम थे ‘यूरो फाइटर’ और ‘राफेल’।
  • फिर आता है समय जनवरी 2012 का, इस समय दसाल्ट एविएशन से बातचीत शुरू हो चुकी थी क्योंकि इन्होंने बिड कम लगाई थी।
  • वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार इस डील में 126 फाइटर जेट खरीदने की बात हुई थी, जिसमे 18 जेट हमको ऑफ़ द शेल मिलते, इसका मतलब उन 18 फाइटर जेट को फ़्रांस में ही बनाया जाता और रेडी टू फ्लाई कंडीशन में भारत को मिलते।
  • बाकी बचने वाले 108 फाइटर जेट को इंडिया में ही बनाया जाता, एच.ए.एल के द्वारा, जिसे दसाल्ट एविएशन तकनीक ट्रांसफर करती कि आखिर एयर क्राफ्ट को बनाया कैसे जाएगा।
  • यहां पर ट्रांसफर का महत्त्व इसलिए बढ़ जाता है कि अगर भविष्य में भारत के रिश्ते फ़्रांस के साथ सही नही भी रहते तो भी हम अपने एयर क्राफ्ट खुद बना सकते थे।  
  • एन.डी.टी.वी की रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2014 में एच.ए.एल और दसाल्ट एविएशन का साथ में एक एग्रीमेंट हुआ, जिसमे ये कहा गया कि 108 एयरक्राफ्ट जो भारत में बनेंगे उसका 70 प्रतीशत काम एच.ए.एल करेगा और 30 प्रतीशत काम दसाल्ट एविएशन करेगी।
  • एग्रीमेंट का प्रोसेस काफी लंबा चल रहा था क्योंकि दोनों कम्पनियां कई पहलु पर मान नहीं रहीं थीं।  इसी बीच साल 2014 में भारत में सत्ता परिवर्तन भी हुआ, नई सरकार बनी, नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री चुने गए।
  • अब आता है 25 मार्च 2015, नेशनल हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार उस दिन दसाल्ट के सी.ई.ओ ने कहा था कि हमारा 95 प्रतीशत काम एग्रीमेंट का हो चुका है, और अब जल्द ही इसे फाइनल कर दिया जाएगा।

क्या है द न्यू राफेल डील?

‘द वायर’ की रिपोर्ट के अनुसार तारीख थी 8 अप्रैल, साल था 2015, उस दिन देश के फॉरेन सेक्रेट्री ने कहा था कि हमारी दसाल्ट के साथ नेगोशिएशन जारी है, जल्द ही फैसला होगा।  ठीक उसके दो दिन बाद 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रांस का दौरा किया, इस दौरे के दौरान एक जॉइंट स्टेटमेंट रिलीज किया गया, ये स्टेटमेंट भारतीय और फ़्रांस की सरकार ने मिलकर रिलीज किया था।  

मिनिस्ट्री ऑफ़ एक्सटर्नल अफेयर की वेबसाइट के अनुसार उस स्टेटमेंट में ये कहा गया कि अब 36 राफेल विमान भारतीय सरकार के द्वारा खरीदे जाएंगे, सारे विमान रेडी टू फ्लाई कंडीशन में होंगे।

विपक्ष का सरकार पर हमला

इस कदम के बाद से सवाल उठने की शुरुआत हुई, विपक्ष ने पूछा कि बिना कैबिनेट के मंजूरी के प्रधानमंत्री ने ये डील कैसे कर ली? इसी के साथ सवाल ये भी उठे कि पुरानी डील का क्या हुआ?

जो 108 एयर क्राफ्ट एच.ए.एल के द्वारा इंडिया में बनाए जाने वाले थे, उनका क्या हुआ?

  • ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार 13 अप्रैल 2015 को उस समय के डिफेंस मिनिस्टर दिवंगत मनोहर पर्रिकर ने कहा था कि मोदी जी ने फैसला लिया है और हम उनके साथ हैं।
  • इसके बाद 23 सितंबर 2016 को इस डील को आधिकारिक तौर पर फाइनल कर दिया गया था।

इंट्रेस्टिंग और टर्निंग पॉइंट ऑफ़ राफेल डील

हम आपको इंट्रेस्टिंग बात बता दें कि नरेंद्र मोदी की फ्रांस ट्रिप के पहले दो कम्पनियों का गठन किया गया था।  तारीख थी 25 और 28 मार्च 2015, एक कम्पनी थी अनिल अंबानी की और दूसरी थी अडानी ग्रुप की, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कम्पनियों के नाम हैं- 1. रिलायंस डिफेंस लिमिटेड और 2. अडानी डिफेंस सिस्टम एंड टेक्नोलॉजी लिमिटेड।

एक और इंट्रेस्टिंग बात ये है जो आप भारतीय सरकार की आधिकारिक वेब साईट पर भी पढ़ सकते हैं, वो ये है कि नई डील जो हुई है भारत और फ्रांस के बीच में उसमे एयर क्राफ्ट के बनावट में कोई अंतर नहीं रहेगा, मतलब साफ़ है कि एयर क्राफ्ट की मारक  क्षमता सेम रहेगी।

अब समझते हैं ऑफ़ सेट क्लॉज़ क्या होता है

ऑफ सेट क्लॉज एक ऐसी प्रक्रिया होती है जिसमे खरीददार, बेचने वाले की कंपनी में कुछ पैसे इन्वेस्ट करता है।  उस एग्रीमेंट को ऑफ सेट क्लॉज़ कहते हैं।

ऑफ सेट क्लॉज़ का नई राफेल डील से कनेक्शन

नई राफेल डील में ऑफ़ सेट क्लॉज़ का खेल 50 प्रतीशत का है, मतलब डील दसाल्ट कंपनी से 60,000 करोड़ में हुई है, अब इसका 50 प्रतिशत हिस्सा कंपनी को भारत में इन्वेस्ट करना पड़ेगा।  तकनीकी तौर पर अब ये दसाल्ट की मर्जी है कि उसे कौन सी कंपनी में इंडिया में इन्वेस्ट करना है।  

  • अब यहां पर एंट्री होती है अनिल अंबानी की, Reuters की रिपोर्ट के अनुसार 3 अक्टूबर 2016 को अनिल अंबानी ने दसाल्ट के साथ एक जॉइंट वेंचर की शुरुआत की, इसका नाम है ‘दसाल्ट रिलायंस एरोस्पेस’।
  • 21 जून 2017 की बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार 30,000 करोड़ में से 21,000 करोड़ दसाल्ट उसी जॉइंट वेंचर में इन्वेस्ट करने वाला है।  
  • बस यही वो मुद्दा है जिसपर देश के विपक्ष ने सरकार से सवाल किया है कि सरकार इस डील की मदद से अनिल अंबानी को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रही है।  

सरांश

राफेल डील की गोता-खोरी तो चल ही रही थी, कि इस Rafale deal controversy में एक Tweet तब और आ गया जब फ़्रांस के साल 2012 से 2017 के बीच के प्रेसिडेंट रहे फ़्रन्सोएस होलांडे ने ये कहा कि ‘मोदी सरकार ने खुद चुना है अनिल अंबानी को ऑफ़ सेट पार्टनर, इसमें हमारी सरकार का कोई भी योगदान नहीं है।

लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी रिपोर्ट के अनुसार दसाल्ट ने इसका जवाब देते हुए कहा है कि हमने अपनी मर्जी से फ्रीली चूस किया है अनिल अंबानी को अपना ऑफ सेट पार्टनर। फिलहाल अब ये बात ज़रूर होगी कि क्या हमारी सेना मजबूत हो रही है, अगर हो रही है तो कितनी हुई है? अर्थव्यवस्था अपनी जगह है लेकिन ये भी यथार्थ है कि आज की जरुरत है कि भारत की सेना प्रबल हो, सशक्त हो, इस देश को अपनी सेना पर गर्व था, है और रहेगा।

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