सर्वपल्ली राधाकृष्णन: एक गुरु की जीवनी

1629

भारत के द्वितीय राष्ट्रपति श्री सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी का जन्मदिवस 5 सितंबर शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। श्री राधकृष्णन के जीवन चरित्र के बारे में महत्वपूर्ण पड़ावों के बारे में जानते हैं।

  • प्रारम्भिक जीवन:

5 सितंबर 1888 को तमिलनाडू के एक छोटे से गाँव तिरुमनी के ब्राह्मण परिवार में दूसरी संतान के रूप में एक संतान का जन्म हुआ। पिता श्री सर्वपल्ली वी. रामास्वामी  और माता श्रीमति सीता झा ने इस संतान का नाम राधाकृष्णन रखा। रामास्वामी जी गाँव के जमींदार के यहाँ एक साधारण कर्मचारी थे। सीमित आय में भी राधाकृष्णन ने आरंभिक शिक्षा गाँव में ही पूरी करी। 8 वर्ष की अवस्था में उन्हें तिरुपति के मिशनरी स्कूल में पढ़ाई के लिए भेज दिया गया जहां से वो अगले 4 वर्ष बाद वेल्लुर चले गए और अपनी आगे की शिक्षा पूरी करी। 1902 में मैट्रिक की परीक्षा में इन्होनें छात्रवृति प्राप्त करी और 1904 में कला संकाय प्रथम श्रेणी और मनोविज्ञान, इतिहास और गणित में विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण करी। इसके बाद दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर प्रथम श्रेणी में पास कर ली थी। पढ़ाई के अतिरिक्त राधाकृष्णन ने बाइबल के भी महत्वपूर्ण अंश कंठस्थ कर रखे थे।

  • व्यावसायिक जीवन:

राधाकृष्णन जी का व्यावसायिक जीवन 28 वर्ष में अथार्थ 1916 में प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक के पद के साथ शुरू हुआ था। दो वर्ष बाद ही उन्हें मैसूर यूनिवर्सिटी में इसी विषय के प्रोफेसर के रूप में चुन लिया गया। इसके बाद वो इसी कॉलेज के उपकुलपति बने और एक वर्ष बाद ही बनारस यूनिवर्सिटी का कुलपति नियुक्त कर दिया गया। इसी बीच में 1940 में ब्रिटिश एकेडमी ने उन्हें प्रथम भारतीय के रूप में एक सदस्य चुन लिया। 1948 में युनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में भी काम किया । इसके बाद 1953 से 1962 तक दिल्ली यूनिवर्सिटी के चांसलर का पद सम्हाला। अपने शिक्षण काल में ही उन्होनें दर्शन शास्त्र पर अनेकों पुस्तकें लिखीं और प्रसिद्धि पाई।

  • राजनैतिक जीवन:

राधाकृष्णन जी, विवेकानन्द और वीर सावरकर के विचारों से प्रभावित थे और इनके जीवन को राधाकृष्णन जी ने आत्मसात करने का प्रयास किया। अपनी ज्ञान प्रतिभा के बल पर ही 1947 से 1949 तक वो संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य रहे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात सोवियत संघ में विशिष्ट राजदूत के रूप में रहे। इसके बाद 13 मई 1952 से 13 मई 1962 तक उपराष्ट्रपति और 13 मई 1962 को राष्ट्रपति नियुक्त हो गए।

  • पुरस्कार और सम्मान:

राधाकृष्णन जी को जिंदगी में जो पुरस्कार और सम्मान मिले वो इस प्रकार हैं:

  • 1954 में शिक्षा और राजनीति में उत्कृष्ट योगदान के लिए सर्वोच्च सम्मान “भारत अलंकरण”;
  • 1962 से उनके जन्मदिवस को ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा;
  • 1962 में डॉ राधाकृष्णन जी को ‘ब्रिटिश एकेडमी’ का सदस्य मनोनयन;
  • पॉप जॉन पॉल से “गोल्डन सपर” भेंट के रूप में प्राप्त किया;
  • इंग्लैंड सरकार द्वारा “ऑर्डर ऑफ मेरिट” का सम्मान मिला;
  • 1975 में मरणोपरांत अमेरिकी सरकार द्वारा ‘टेम्पल्टन पुरस्कार’ मिला;

जीवन के अंतिम वर्ष:

17 अप्रैल 1975 को डॉ राधाकृष्णन जी का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया।

Leave a Reply !!

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.