आखिर क्या है भारत की कार्यपालिका और न्यायपालिका में अंतर, चलिए जऱा डिटेल में जानते हैं

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भारत की कार्यपालिका और न्यायपालिका में अंतर

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। देश को सुचारु रुप से चलाने के लिए भारत सरकार को तीन भागों में विभाजित किया गया है- व्यवस्थापिका (legislative), कार्यपालिका (executive) और न्यायपालिका (judiciary)। इन सभी अंगों के कार्य अलग- अलग हैं। भारत की संसदीय प्रणाली में व्यवस्थापिका जहां कानून बनाने का काम करती है, तो कार्यपालिका कानून लागू कराने का। वहीं लोकतंत्र का प्रमुख अंग माने जाने वाले न्यायपालिका के जिम्मे संविधान के कानून का पालन करवाना है। आज हम जानेंगे कि आखिर कार्यपालिका और न्यायपालिका का काम क्या है, कैसे सरकार के ये दोनों अंग एक–दूसरे से अलग हैं।

कार्यपालिका और न्यायपालिका में प्रमुख अंतर

 

कार्यपालिका

न्यायपालिका

इसका मुख्य काम व्यवस्थापिका की ओर से पास किए गए नियम- कानून यानी कि बिल को लागू करना है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में न्यायपालिका को बहुत ही अहम माना जाता है। न्यायपालिका का कार्य संविधान में बने कानून का पालन करना और अगर कोई इसे तोड़ता है, तो उसे दंडित करना है। मुख्य रुप से न्यायपालिका देश में कानून व्यवस्था को सुचारु रुप से चलाने का काम करती है।
भारत की कार्यपालिका संसदीय है। भारत की न्यायपालिका एकीकृत है।
कार्यपालिका के तीन अंग है

1. राष्ट्रपति

2. उपराष्ट्रपति

3. मंत्रिमंडल

भारत में न्यायपालिका के अंतर्गत कई स्तर के न्यायालय शामिल हैं।

1. सुप्रीम कोर्ट

2. हाई कोर्ट

3. डिस्ट्रिक्ट कोर्ट

4. निचली अदालतें (ग्राम पंचायत, ग्राम कचहरी इत्यादि)

भारत की कार्यपालिका का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है। लेकिन शासन की पद्धति में शक्तियां देश के प्रधानमंत्री के पास होती है और राष्ट्रपति प्रतिकात्मक प्रमुख होता है. न्यायालय का प्रमुख सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस होता है।
कार्यपालिक को व्यवस्थापिका के नीचे रखा गया है। न्यायपालिका को स्वतंत्र रखा गया है।
कार्यपालिका में कैबिनेट का चयन प्रधानमंत्री द्वारा किया जाता है। न्यायपालिका में जजों के चयन का काम मुख्य न्यायधीश, राष्ट्रपति और राज्य के गर्वनर का होता है।
कार्यपालिका में किसी भी मेंबर ऑफ पार्लियामेंट को कैबिनेट का हिस्सा बनाया जा सकता है। ये पूरी तरह से प्रधानमंत्री पर निर्भर करता है कि वो किसे अपने कैबिनेट में शामिल करते हैं। न्यायपालिका में जज बनने के लिए कई योग्यताओं का होना जरूरी होता है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों के जजों की नियुक्ति अलग- अलग तरीके से की जाती है।
कार्यपालिका के अंदर सिर्फ राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उनका कैबिनेट नहीं होता, बल्कि इसमें प्रशासनिक ढांचे को भी शामिल किया जाता है। न्यायपालिका में अदालत के भीतर होने वाले सभी कार्यों को शामिल किया गया है।
कार्यपालिका का चयन अस्थाई होता है। हर पांच साल में यहां राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव होता है। न्यायपालिका का चयन एक तरह से अस्थाई होता है, क्योंकि यहां बिना किसी मतभेद के कोई भी न्यायधीश रिटायरमेंट तक अपने पद पर बना रह सकता है।

 

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