कैसा है भारत का टैक्स सिस्टम

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भारत में टैक्स प्रणाली का इतिहास काफी पुराना है। मनुस्मृति और अर्थशास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों को इसके जड़ों के रुप में देखा जाता है। मनु ने कहा है कि शास्‍त्रों के अनुसार राजा कर लगा सकता है। उन्होंने सलाह दी थी कि करों का संबंध, प्रजा की आय तथा व्‍यय से होना चाहिए। इन ग्रंथों की मानें तो सैकड़ों साल पहले किसान, कारीगर और व्यापारी भी सोना- चांदी और अनाज के रुप में कर का भुगतान करते थे। इन ग्रंथों ने शिक्षा लेकर और उनमें कुछ बदलाव कर अंग्रेजों ने भारत में आधुनिक कर प्रणाली की स्थापना की। 1860 में पहली बार सर जेम्स विल्सन ने आयकर पेश किया था। आजादी के बाद भारत की पहली सरकार ने देश की आर्थिक प्रगति  और आय- संपत्ति की असमानता को खत्म करने के लिए टैक्स प्रणाली को संविधान में लागू कर उसे मजबूत बनाया। इसके बाद देश की कर प्रणाली में कई बार उन्मूलन और संशोधन किए गए। तो आइए समझते हैं कि क्या है भारत की मौजूदा टैक्स प्रणाली।

सरल शब्दों में कहा जाए तो टैक्स किसी भी देश की सरकार के आय का स्त्रोत होता है। टैक्सेशन सिस्टम के तहत एकत्रित धन को कई परियोजनाओं और योजनाओं के माध्यम से देश के विकास के लिए उपयोग में लाया जाता है।

  • भारतीय संविधान केंद्रीय और राज्य सरकारों को टैक्स लगाने के लिए स्वीकृति देता है।
  • केंद्र सरकार द्वारा बनाई जाने वाले टैक्स को संसद में मंजूरी मिलती है।
  • राज्य सरकार के मामले में ये अधिकार राज्य विधानमंडल के पास है।
  • इनके अलावा स्थानीय निकाय और नागरिक निकायों को भी कुछ करों को लागू करने का अधिकार है।

भारत में टैक्स को दो भागों में बांटा गया है

  1. केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा टैक्स
  2. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टैक्स
  1. केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा वसूले जाने वाले टैक्स को भी तीन भागों में बांटा गया है।

केंद्र सरकार– इसमें इनकम टैक्स, कस्टम ड्यूटी, कॉरपोरेशन टैक्स, एक्साइज ड्यूटी, संपत्ति शुल्क जैसे टैक्स शामिल हैं। जो देश की केंद्र सरकार के खाते में जाती है। केंद्र सरकार को दिए जाने वाले इनकम टैक्स में कृषि आय कर शामिल नहीं है।

राज्य सरकार-  राज्य सरकार को दिए जाने वाले टैक्स में वैट यानी कि वैल्यू एडेड टैक्स, कृषि आय पर कर, बिजली खपत और सेल्स टैक्स, भूमि राजस्व और टोल जैसे कई और टैक्स शामिल हैं।

स्थानीय नागरिक निकाय- नगर निगम और दूसरे स्थानीय सरकारी संस्थानों के टैक्स ये वसूलते हैं।

  1. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टैक्स

प्रत्यक्ष कर (Direct Tax)- ये टैक्स व्यक्तिगत रुप से सामान से संबंधित सरकार को दिया जाता है। जैसे- इनकम टैक्स, कैपिटल गेन टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स, सिक्योरिटी ट्रांजेक्शन टैक्स इत्यादि।

अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax)- इन करों का भुगतान सीधे सरकार को नहीं किया जाता है। ये टैक्स उन मध्यस्थों को जाता है, जो प्रोडक्ट या सर्विस को बेचते या व्यवस्थित करते हैं। सर्विस टैक्स, सेल्स टैक्स, कस्टम ड्यूटी, वैट, एक्साइज ड्यूटी इनके भी अहम उदाहरण हैं।

साल 1964 में देश के टैक्स सिस्टम को नियंत्रित करने के लिए सेंट्रल बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ( केंद्रीय राजस्व बोर्ड) का गठन किया गया। इसके अंतर्गत दो निकायों को शामिल किया गया।

सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्स (सीबीडीटी)- ये प्रत्यक्ष करों की योजना और प्रबंधन करता है।

केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी)- इसके अंतर्गत प्रशासक सेवा कर, सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क आते हैं।

वर्तमान टैक्स प्रणाली की विशेषताएं

इनकम टैक्स स्लैब– साल 2017 में पेश किए गए बजट में कम आय वालों को बड़ी राहत दी गई। ढाई लाख से पांच लाख रुपए सालाना कमाने वालों को 10 से 5 प्रतिशत तक टैक्स रेट कम कर दी गई। 2018-19 के बजट में इनकम टैक्स स्लैब में कोई बड़े बदलाव नहीं किए गए।

जीएसटी– 1 जुलाई 2017 को देशभर में जीएसटी लागू कर दी गई। जीएसटी में केंद्र और राज्य सरकार द्वारा लगाए जाने वाले कई अप्रत्यक्ष करों को हटाकर एक कर में सम्मिलित कर दिया गया।

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