सोवियत यूनियन ने 1959 में जब चांद पर भेजा Lunik II

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Lunik II

September 12 ही वह दिन था जब पहले मानव निर्मित अंतरिक्ष यान Luna 2 को चंद्रमा के लिए लांच किया गया था और यह चंद्रमा की सतह तक पहुंचने में कामयाब भी रहा था। वर्ष 1959 में 14 सितंबर को यह चंद्रमा की सतह तक पहुंच पाया था। इसे Lunik-II के नाम से भी जाना जाता है। सोवियत संघ के लूना कार्यक्रम अंतरिक्ष यान के तहत चंद्रमा के लिए लांच किया गया यह दूसरा अंतरिक्ष यान था।

इस लेख में आपके लिए है:

  • गोपनीय तरीके से चला था ये मिशन
  • क्या हुआ था 14 सितंबर, 1959 को?
  • Russian Moon Mission से जो पता चला
  • सोवियत संघ से पीछे नहीं था अमेरिका
  • सोवियत संघ का यान पहली बार उतर ही गया चंद्रमा पर
  • कैसे-कैसे आगे बढ़ा Lunik II?

गोपनीय तरीके से चला था ये मिशन

  • First moon landing के उद्देश्य से 12 सितंबर, 1959 को इस अंतरिक्ष यान को लांच किया गया था। सोवियत संघ इसे तैयार करने में काफी समय से जुटा हुआ था।
  • सोवियत संघ के अधिकारी पूरी गोपनीयता बरतते हुए इस पर काम कर रहे थे। दुनिया को इसकी भनक तक नहीं चल सकी थी कि सोवियत संघ कितनी बड़ी योजना पर काम कर रहा है।
  • फिर भी बीच में कुछ ऐसा हुआ कि दुनिया को सोवियत संघ की इतनी बड़ी उपलब्धि के बारे में जानकारी हो गई। दरअसल, ऐसा नहीं है कि सोवियत संघ ने बिल्कुल भी अपने देश के बाहर किसी और को इसके बारे में नहीं बताया था।
  • बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटिश अंतरिक्ष यात्री बर्नार्ड लोवल को सोवियत संघ ने अपने इस गोपनीय अभियान के बारे में जानकारी दी थी। इस मिशन के बारे में पूरी दुनिया को लोवल ने ही बताया था।
  • अमेरिका को भी लोवल ने सोवियत संघ की इस उपलब्धि के बारे में बता दिया था। अमेरिका को तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि सोवियत संघ ने इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है।

क्या हुआ था 14 सितंबर, 1959 को?

  • Russian Moon Mission के लिए 12 सितंबर, 1959 का दिन बड़ा ही महत्वपूर्ण था। इसी दिन लूना 2 को चंद्रमा के लिए सोवियत संघ ने लांच किया था।
  • 14 सितंबर, 1959 की मध्यरात्रि के बाद चंद्रमा की सतह पर लूनिक-II अंतरिक्ष यान लगभग 12 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से टकरा गया था।
  • इस बात की पूरी संभावना है कि इतनी तेज गति से चंद्रमा की सतह से टकराने के कारण अपने सभी उपकरणों के साथ लूनिक-II पूरी तरीके से नष्ट हो गया होगा।
  • यह वह वक्त था जब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीतयुद्ध चल रहा था। एक-दूसरे दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ लगी हुई थी। इसी होड़ में सोवियत संघ के लूना 2 का इस तरीके से नष्ट हो जाना एक बड़ी घटना थी।

Russian Moon Mission से जो पता चला

  • यह बात जरूर है कि चंद्रमा की सतह से टकरा जाने की वजह से लूना 2 का नामोनिशान मिट गया था, लेकिन लूना 2 को अंतरिक्ष में भेजे जाने की वजह से कई वैज्ञानिक प्रयोगों में भी वैज्ञानिकों को कामयाबी हासिल हुई थी।
  • इसकी वजह से यह पता चल पाया था कि कोई भी प्रभावी चुंबकीय क्षेत्र चंद्रमा का नहीं था। इसके अलावा चंद्रमा का कोई रेडिएशन बेल्ट भी नहीं प्राप्त हुआ था।
  • यूके स्पेस एजेंसी के ह्यूमन एक्सप्लोरेशन प्रोग्राम के मैनेजर लीबी जैक्सन ने इस अभियान के बारे में बीबीसी को बताया भी था कि सोवियत संघ के द्वारा लांच किए गए इस अभियान की बदौलत चंद्रमा की सतह के बारे में बेहद महत्वपूर्ण जानकारी हासिल करने में वैज्ञानिक कामयाब हुए थे।

सोवियत संघ से पीछे नहीं था अमेरिका

  • जिस तरीके से 1950 के दशक में सोवियत संघ चंद्रमा को लेकर अपने मिशन की तैयारी को अंजाम देने में जुटा हुआ था, उसी तरीके से अमेरिका भी लगातार चंद्रमा के लिए अपने कई मिशनों की तैयारी में लगा हुआ था।
  • चंद्रमा के विभिन्न पहलुओं के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए 50 के दशक में सोवियत संघ और अमेरिका के बीच एक तरह की होड़ लगी हुई थी। इन दोनों ही देशों ने कई मिशन चलाए और इन्हें भेजने का प्रयास किया। हालांकि, इन्हें कई बार असफलता का स्वाद भी चखना पड़ा।

सोवियत संघ का यान पहली बार उतर ही गया चंद्रमा पर

  • History of September 12 सोवियत संघ की कामयाबी का गवाह है। एक ओर तो पहली बार अपने यान को चंद्रमा की सतह पर उतारने में सोवियत संघ को कामयाबी मिल गई थी और लंबे समय से चली आ रही उसकी कोशिश सफल हो गई थी, तो वहीं दूसरी तरफ चंद्रमा की सतह पर अमेरिका भी पहली बार अपने अंतरिक्ष यात्री को कुछ समय के बाद उतार पाने में सफल रहा था।
  • सोवियत संघ के First moon landing Lunik II को सफलता 12 सितंबर, 1959 को मिली थी। यही वह मिशन था, जिसके अंतर्गत सोवियत संघ पहली बार चंद्रमा पर अपने यान को उतार पाया।
  • इसके बाद सोवियत संघ ने 4 अक्टूबर, 1959 को लूना मिशन चांद के लिए लांच किया था, जिसके द्वारा चांद के उस ओर के फोटोग्राफ्स मिलने लगे थे, जो कि पृथ्वी की ओर से नजर नहीं आता।

कैसे-कैसे आगे बढ़ा Lunik II?

  • बिल्कुल लूना 1 की तरह ही लूना 2 भी सीधे रास्ते पर चंद्रमा की ओर बढ़ा था। लूना 2 ने 36 घंटे तक सीधी उड़ान भारी थी। उसके बाद चंद्रमा पर इसने लैंडिंग की थी
  • नजर आ रहे डिस्क के केंद्र से लगभग 800 किलोमीटर की दूरी पर लूना 2 चंद्रमा से टकराया था।
  • Aristides, Archimedes और Autolycus क्रेटर्स के निकट Mare Serenitatis के पूर्व में स्थित चंद्रमा की सतह इस लैंडिंग से प्रभावित हुई थी।
  • लूना 2 अंतरिक्ष यान का डिजाइन भी बिल्कुल लूना 1 की तरह ही था। यह भी गोलाकार अंतरिक्ष यान था। इसमें एंटीना लगा हुआ था और कई सारे अन्य उपकरण भी इसमें लगे हुए थे। लूना 1 की तरह ही इसमें एक मैग्नेटोमीटर और एक माइक्रोमेटेराइट डिटेकटर भी लगे हुए थे।
  • इस अंतरिक्ष यान से 13 सितंबर को एक चमकीली रंग का सोडियम गैस से बना हुआ बादल रिलीज किया गया, जिसकी वजह से इस अंतरिक्ष यान को ट्रैक करना आसान हो गया। साथ ही यह प्रयोग भी किया जा सका कि अंतरिक्ष में गैस किस तरीके से बर्ताव करती है।
  • 14 सितंबर को 33.5 घंटे की फ्लाइट के बाद Lunik II से प्राप्त हो रहे रेडियो सिग्नल अचानक से मिलने बंद हो गए, जिससे यह पता चल गया कि चंद्रमा पर इसने अपना प्रभाव डाल दिया है।
  • जिस जगह पर लूना 2 ने अपना प्रभाव डाला, वह चंद्रमा का Palus Putredinus क्षेत्र था। अनुमान लगाया गया कि यह 0 डिग्री देशांतर और 29.1 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर स्थित था।
  • इसके लगभग 30 मिनट के बाद लूना 2 के तीसरे चरण में रॉकेट ने भी चंद्रमा पर एक अज्ञात जगह से टकराकर वहां अपना प्रभाव बिखेर दिया।
  • लूना 2 अपने साथ पांच अलग-अलग उपकरणों को भी लेकर गया था, ताकि चंद्रमा की अपनी इस यात्रा के दौरान रास्ते में वह कई तरह के प्रयोगों को भी अंजाम दे सके।

निष्कर्ष

September 12, Russian Lunar Misson के लिए सबसे बड़े कामयाबी के क्षण के रूप में history में हमेशा याद किया जाता रहेगा। आज यदि भारत के साथ दुनिया के अन्य देश चंद्रमा को लेकर अपने मिशन को अंजाम देने में लगे हुए हैं, तो इसमें कहीं-न-कहीं सोवियत संघ के Lunik II मिशन से मिली प्रेरणा को भी इसका श्रेय जाता है।

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