हिन्दू एवं ग्रेगोरियन नव वर्ष

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Hindu and Gregorian New Year

नव वर्ष 2021 की आप सभी को हार्दिक बधाईयाँ

हम, आपको व अपने सभी नियमित पाठको को, सबसे पहले नव वर्ष 2021 की हार्दिक मुबारकबाद देना चाहते हैं और कामना करते हैं कि आप, आपके परिवार व हमारे सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए नव वर्ष 2021 मंगलमय और कल्याणकारी हो।

जैसा कि, हम सभी जानते हैं कि, हम ऐसे समाज और ऐसी दुनिया में, रहते हैं जिसमें हर दिन कुछ नया और कुछ खास होता हैं और जब बात आती है नववर्ष की तो इससे संबंधित भी हमें, कई तरह की प्रथायें, परम्परायें और अलग-अलग पंचाग देखने को मिलते हैं जिसके विधिनुसार हर नये महिने में, किसी ना किसी धर्म या देश में, चंद्रमा आधारित, सूर्य आधारित या फिर पंचाग आधारित नव वर्ष की शुरुआत होती हैं जो कि, हमारे व हमारे अपनो के लिए बेहद उत्साहवर्धक व उल्लासमयी होता हैं इसीलिए हम, आपको अपने इस लेख में, विश्व के दो प्रमुख नव वर्षो जैसे कि – हिन्दू नव वर्ष और ग्रेगोरियन नव वर्ष की पूरी जानकारी विस्तार से प्रदान करेंगें ताकि हमारे पाठक इन नव वर्षो के महत्व, प्रासांगिकता और मूल अर्थो को समझते हुए नव वर्ष का स्वागत कर सकें।

हिन्दू नव वर्ष (Hindu New Year)

हम, अपने सभी पाठको को हिन्दू नव वर्ष की पूरी जानकारी कुछ आधारभूत बिंदुओ के माध्यम से प्रदान करना चाहते हैं जो कि, इस प्रकार से हैं-

  • जीवन्त, सजीव व गौरवमयी रहा हैं हिन्दू नव वर्ष का इतिहास

जब हम, हिन्दू नव वर्ष की बात करते हैं तो हमें एक अति विकसित संस्कृति, सम्पदा और विरासत देखने को मिलती हैं जिन्हे हम, हिन्दू नव वर्ष के आभूषणो के रुप मे, परिभाषित कर सकते हैं क्योंकि हिन्दू नव वर्ष का इतिहास बेहद उज्जवल, गौरवमयी और जीवन्त हैं जिसके कुछ बेहद रोचक प्रमाण हम, आपके सामने प्रस्तुत करना चाहते हैं जो कि, इस प्रकार से हैं –

  • हिन्दू पंचाग की चैत्र मास की प्रतिपदा को नव वर्ष का पर्व हर्षो-उल्लास के साथ मनाया जाता था जब चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने, सर्वमान्य हिन्दू पंचाग की शुरुआत नहीं की थी और कोई सर्वमान्य पंचाग ना होने की वजह से चैत्र मास की प्रतिपदा को मानये जाने वाले नव वर्ष को सम्पूर्ण भारत में, नहीं मनाया जाता था। चैत्र मास से नवरात्रि का प्रारम्भ होता  हैं जिसके तहत देवी दुर्गा के नौ रुपो की आराधना की जाती हैं जिससे हमें, देवी दुर्गा का आर्शीवाद प्राप्त होता हैं,
  • 3102 ईसा पूर्व में, प्रचलित कलियुग संवत का इतिहास चैत्र मास का प्रतिपदा से भी प्राचीन है जिससे तहत नव वर्ष के पावन पर्व का आयोजन किया जाता था,
  • हिन्दू नव वर्ष मूलत हिन्दू पंचाग अर्थात् भारतीय पंचाग पर आधारित हैं जिसकी सबसे पहले शुरुआत 57-58 ईसा पूर्व मे, चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के द्धारा किया गया था,
  • काल के इसी चक्र में, हमें, कृष्ण व युधिष्ठिर संवतो का प्रचलन देखने को मिलता हैं और जब हम, इसी कालचक्र के कुछ और पूर्व में, जाते हैं तो सप्तर्षि संवत को पाते हैं जिसकी शुरुआत 6,676 ईसा पूर्व से माना जाता हैं आदि।

उपरोक्त हिन्दू नव वर्षो का इतिहास वास्तव मे, बेदह गौरवमयी और जीवन्त प्रतीत होता हैं।

  • चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने, किया था आधिकारीक हिन्दू नव वर्ष का शुभारम्भ

जैसा कि, हमने उपरोक्त बिंदुओ में बताया कि, हिन्दू नव वर्ष की आयोजन प्रक्रिया बेहद प्राचीन हैं लेकिन तब कोई सर्वमान्य या सर्व–स्वीकृत पंचाग नहीं था और इसी सर्वमान्य व सर्व-स्वीकृत पंचाग की शुरुआत चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के द्धारा 57-58 ईसा.पूर्व में, किया गया था जिसके लिए उन्होने एक आधिकारीक पंचाग की शुरुआत की जिसे सम्पूर्ण भारत में, प्रचलन में, लाया गया और हिन्दू नव वर्ष की नई शुरुआत की गई।

  • विक्रमादित्य के अथक प्रयासो से अस्तित्व में, आया था हिन्दू नव वर्ष

हिन्दू नव वर्ष के शुभारम्भ में, सम्राट विक्रमादित्य का अभूतपूर्व योगदान माना जाता हैं क्योंकि विक्रमादित्य के द्धारा ही सबसे पहले आधिकारीक, सर्वस्वीकृत और सर्वमान्य पंचाग को जारी किया जिसके लिए उन्होंने भारतीय ज्योतिषियो व खगोलविदो से परामर्श लिया जिसके तहत इस पंचाग को सभी ग्रहृ- नक्षत्रो की धूरी, गति और भ्रमण जैसे कि चन्द्र नक्षत्र, सूर्य, शुक्र और बृहस्पति की धूरी-गति के आधार पर ही नव-सवंवत्सर का निर्माण किया गया। इस प्रकार हम, मान सकते हैं कि, हिन्दू नव वर्ष की शुरुआत में, चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य का अमूल्य योगदान रहा हैं।

  • कैसे मान्यता मिली सौर वर्ष के 12 माहो अर्थात् महिनो को मान्यता?

जैसा कि, हम सभी जानते हैं कि, सूर्य की गति के आधार पर हिन्दू नव वर्ष का प्रारम्भ मकर संक्रान्ति के दिन होता हैं क्योंकि सूर्य अपनी गति के अनुसार एक राशि से दूसरी राशि में, दाखिल होता हैं तब जाकर 1 माह पूर्ण होता हैं और इसी प्रकार सूर्य, मेष से लेकर मीन तक की 12 अलग-अलग राशियो से गुजरता हैं और इन्ही अलग-अलग 12 राशियो को सौर वर्ष के 12 महिनो के रुप में, मान्यता मिली।

  • हिन्दू नव वर्ष को अलग-अलग नामो से जाना जाता हैं भारतीय राज्यो में

जैसा कि, हम, सभी जानते हैं कि, हिन्दू नव वर्ष की शुरुआत विक्रम संवत से मानी जाती हैं जिसे भारत के अलग-अलग राज्यो में, अपनी प्रथा, परम्परा व संस्कृति के तौर पर अलग-अलग नामो से जाना जाता हैं जैसे कि हिन्दू नव वर्ष को महाराष्ट्र में गुड़ी-पडवा, आंध्र प्रदेश में उगादिनाम, भारत के मुकुट जम्मू-कश्मीर में नवरेह के नाम से, पंजाब में वैशाखी, केरल में विशु, सिंध में चैटीचंड और असम में रोंगली बिहू के नाम से जाना जाता हैं। इस प्रकार अलग-अलग राज्यो मे, हिन्दू नव वर्ष को अलग-अलग नामो से भले जाना जाता हैं लेकिन उत्साह एक जैसा ही होता हैं।

ग्रेगोरियन नव वर्ष (Gregorian New Year)

ग्रेगोरियन नव वर्ष, जो कि, अंग्रेजी पंचाग अर्थात् कैलेंडर पर आधारित हैं और यही एक मात्र ऐसा कैलेंडर या पंचा हैं जिसे पूरे विश्व में, मान्यता और स्वीकृति प्राप्त हैं इसीलिए दुनिया के कई देशो में, नव वर्ष का प्रारम्भ, ग्रेगोरियन नव वर्ष के साथ ही होता हैं जिससे विश्व को नई-ऊर्जा और उत्साह की प्राप्ति होती हैं।

  • 1582 से ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार शुरु हुआ था 1 जनवरी से नव वर्ष मनाने का चलन

ग्रेगोरियन नव वर्ष अंग्रेजी कैलेंडर जिसे बाद में, ग्रेगोरियन कैलेंडर कहा जाने लगा पर आधारित हैं और 1 जनवरी से नव वर्ष मनाने की प्रथा सन् 1582 से प्रचलित हैं जिसे पोप ग्रेगरी अष्टम ने, निर्मित किया था और साथ ही साथ पोप ग्रेगरी अष्टम ने ही इसमें ’’ लीप ईयर ’’ का प्रावधान किया था जो कि, आज तक प्रचलन में हैं।

  • ग्रेगोरियन नव वर्ष के पीछे मौजूद समृद्ध इतिहास की लेते हैं जानकारी

जैसा कि, हम सभी जानते हैं कि, ग्रेगोरियन नव वर्ष पूरी तरह से अंग्रेजी पंचाग या कैलेंडर पर आधारित हैं जिसका अपना एक समृद्ध और परिपूर्ण इतिहास रहा हैं जिन्हें हम, आपके सामने बिंदु दर बिंदु प्रस्तुत करना चाहते हैं जो कि, इस प्रकार से हैं-

  • प्राचीन रोमन कैलेंडर से हुई हैं अंग्रेजी कैलेंडर की शुरुआत

आप सभी जानते ही हैं कि, अंग्रेजी कैलेंडर, जिसे पूरे विश्व में, स्वीकार और मान्यता प्रदान की हैं इसकी शुरुआत रोमन साम्राज्य के रोमन कैलेंडर से हुई हैं जो कि, वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित हैं जिससे हमें दिन, समय, महिने और साल के अनुमान लगाने के लिए एक उचित मानदंड प्राप्त होता हैं।

  • क्या आप जानते हैं कि, रोमन कैलेंडर में, कितने महिने और किस तिथि से नव वर्ष शुरु होता था?

प्रश्न बेहद रोचक और ज्ञानवर्धक हैं जिसका जबाव यदि आप नहीं जानते हैं तो हम, आपको बताते हैं कि, रोमन कैलेंडर की शुरुआत में, केवल 10 महिने ही होते थे और नव वर्ष की शुरुआत प्रत्येक मार्च की 1 तारिख से होता था जिसमें सुधार की गुंजाइश थी व इसी के फलस्वरुप 713 ईस्वी में, जाकर रोमन कैलेंडर में, जनवरी और फरवरी के महिनो को शामिल किया गया जिससे इसका महत्व और बढ गया।

  • पोम्पीलस ने, बदला था 10 माह के कैलेंडर को 12 माह के कैलेंडर में

आपकी बेहतर जानकारी के लिए बता दे कि, रोमन सम्राट जूलिय़स सीजर ने, जिस कैलेंडर को जारी किया उसमें केवल 10 माह ही होते थे जिसमें सुधार करते हुए रोमन सम्राट पोम्पीलस ने, 10 माह के कैलेंडर को 12 माह वाले कैंलेडर में, बदल दिया जिसका 12वां महिना फरवरी का होता था जिसका अर्थ हैं कि, इसका पहला महिना मार्च होता था जिसकी वजह से नव वर्ष के पहले महिने के रुप में, मार्च को ही प्राथमिकता दी जाती हैं जो कि, आज भी जारी हैं क्योंकि हम, मार्च के महिने से ही अपने बही खातो की शुरुआत करते हैं, नय शैक्षणिक सत्रो की शुरुआत अन्य सभी मंगल कार्यो का शुभारम्भ करते हैं।

  • 513 ईस्वी में, सबसे पहले शुरु हुई थी 1 जनवरी को नववर्ष मनाने की प्रथा

ग्रेगोरियन नव वर्ष के अनुसार हम, 1 जनवरी को नव वर्ष मनाते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि, 1 जनवरी को नव वर्ष मनाने की प्रथा कब से शुरु हुई थी जो कि, 45 ईसा पूर्व में, रोमन तानाशाह जूलियन सीजर के द्धारा जारी जूलियन कैंलेडर के बाद भी जारी रहा जिसके लिए जूलियस सीजन ने, पिछले साल अर्थात् 46 ईसा.पूर्व को 445 दिनो का करना पडा था।

  • अंग्रेजी कैलेंडर के निर्माण में, अमूल्य योगदान रहा रोमन सम्राट जूलियस सीजर का

जैसा कि, हम, सभी अपने दैनिक जीवन के संचालन के लिए आम तौर पर व ज्यादातर अंग्रेजी कैलेंडर का ही प्रयोग करत है इसलिए हम, आपको बताना चाहते हैं कि, अंग्रेजी कैलेंडर के निर्मण में, रोमन सम्राट जूलियस सीजर का अमूल्य योगदान हैं क्योंकि वर्तमान में, प्रचलित अंग्रेजी कैलेंडर का मूलाधार जूलियस सीजर द्धारा निर्मित ईसा पूर्व पहली शताब्दी का कैलेंडर ही हैं जिसकी शुरुआत जनवरी महिने से मानी जाती हैं जिसे ईसा मसीह के जन्म से 46 वर्ष पूर्व ही लागू कर दिया गया था। इस प्रकार हम, मान सकते हैं कि, अंग्रेजी कैलेंडर के निर्माण में, जूलियस सीजर के योगदान को भूलाया नहीं जा सकता हैं।

  • अंग्रेजी कैलेंडर में, पोप ग्रेगरी ने किया महत्वपूर्ण सुधार और अस्तित्व में, आया ग्रेगोरियन कैलेंडर

बदलाव, प्रकृति का नियम हैं और इसी नियम का पालन करते हुए अंग्रेजी कैंलेडर को बेहतर बनाने के लिए इसमें कई बार संसोधन किये गये जिसमें सबसे महत्वपूर्ण संशोधन 13वीं काल के पोप ग्रेगरी के आदश पर 2 मार्च, 1582 को हुआ और इसी के बाद पोप ग्रेगरी के नाम पर इस कैलेंडर को ’’ ग्रेगोरियन कैलेंडर ’’ कहा जाने लगा और इस प्रकार एक नये कैलेंडर का शुभारम्भ हुआ।

  • किन-किन देशा में, कब-कब अपनाया ग्रगोरियन कैलेंडर को?

ग्रेगोरियन कैलेंडर को विश्व के कई देशा ने, अपनाया जैसे कि –

  • पुर्तगाल, इटली, स्पेन और जर्मनी ने, ग्रेगोरियन कैलेंडर को शुरुआती दौर में, अपनाया,
  • सन् 1700 में, स्वीडन व डेनमार्क ने, ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाया,
  • 1752 में, ब्रिटेन में, ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाया,
  • संयुक्त राज्य अमेरिका ने, ग्रेगोरियन कैलेंडर को 1873 में, अपनाया और
  • जापान व चीन के द्धारा ग्रेगोरियन कैलेंडर को सन् 1911 में अपनाया गया।

इस प्रकार ग्रेगोरियन कैलेंडर का प्रभाव विश्वव्यापी हैं जिससे हमारे जीवन संचालित होता हैं।

क्या हैं संवत्सर और क्या हैं इसका महत्व?

सवंत्सर को यदि हम, सरल शब्दो में, परिभाषित करे तो पाते हैं कि, 12 महिनो के एक काल को ’’ संवत्सर ’’ कहा जाता हैं क्योंकि जिस प्रकार भारत में, महिनो के नाम अलग-अलग होते है ठीक उसी प्रकार सालो के भी लग-अलग नाम होते हैं और इसीलिए 12 महिनो के एक काल को ’’ संवत्सर ’’ कह जाता हैं जिसका महत्व अपने आप में, विशेष होता हैं क्योंकि इन्ही की समाप्ति के मौजूदा वर्ष का समापन होता हैं और इन्ही शुरुआत से नव-वर्ष का शुभारम्भ होता हैं।

कितने होता हैं संवत्सर और क्या-क्या नाम हैं इनके?

हम, अपने पाठको को बताना चाहते हैं कि, कुल 60 प्रकार के संवत्सर होते हैं जिसके 3 हिस्से 20-20-20 के रुप में, होते हैं व इन्हें अलग-अलग नामो से जाना जाता हैं जैसे कि –

  • ब्रह्माविंशति ( 1-20 ),
  • विष्णुविंशति ( 21-40 ) व
  • शिवविंशति ( 41-60 ) आदि।

इस प्रकार हमने आपको नव वर्ष से संबंधित संवस्तर की जानकारी प्रदान की ताकि आप नव वर्ष के पीछे के महत्व को जान व समझ सकें।

निष्कर्ष

अंत, हमने आपको व अपने सभी पाठको को अपने इस लेख के माध्यम से नव वर्ष 2021 के इस पावन पर्व के अवसर पर हिन्दू नव वर्ष व ग्रेगोरियन नव वर्ष की पूरी जानकारी प्रदान की ताकि आप, हम और हमारे सभी पाठकगण नव वर्ष के महत्व व इसकी उपयोगिता को समझ सकें और नये नव वर्ष की शुरुआत सकारात्मकता से कर सकें।

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