जनता की ताकत ने लिखी सोवियत संघ के अंत की कहानी

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Collapse of Soviet Union

शीतयुद्ध के अंत के बाद सोवियत संघ का विघटन एक बड़ी ही महत्वपूर्ण घटना थी। वर्ष 1989 में जर्मनी की दीवार को गिरा दिया गया था। जो जर्मनी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद विभाजित हुआ था, उसका एक बार फिर से एकीकरण हो गया। पूर्वी यूरोप के जो आठ देश सोवियत संघ के खेमे का हिस्सा थे, उन्होंने अपने यहां के साम्यवादी शासन का अंत कर डाला। सोवियंत संघ ने इस वक्त खुद को असहाय महसूस किया, क्योंकि यह कोई सैन्य मजबूरी नहीं, बल्कि जनता ने संगठित होकर विद्रोह का बिगूल फूंक दिया था। ऐसे में सोवियत संघ का ही आखिरकार विघटन हो गया।

सोवियत प्रणाली को समझें

  • वर्ष 1917 में रूस में समाजवादी क्रांति हुई थी, जिसके फलस्वरूप समाजवादी सोवियत गणराज्य यानी कि यूएसएसआर की स्थापना हुई थी।
  • पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त कर इस तरह से समाजवाद के आदर्शों की स्थापना हुई थी।
  • कम्युनिस्ट पार्टी इस व्यवस्था के केंद्र में थी, जिसमें राज्य के साथ पार्टी की संस्था को सर्वाधिक महत्व दिया गया था।
  • पूर्वी यूरोप के कई देशों को फासीवाद से मुक्त कराकर सोवियत संघ ने इन देशों में भी समाजवादी प्रणाली शुरू कर दी, जिसे कि दूसरी दुनिया के नाम से जाना गया।
  • अमेरिका को छोड़कर विश्व के अन्य हिस्सों की तुलना में सोवियत संघ सुख-सुविधाओं के मामले में बहुत उन्नत बन गया और यहां सभी नागरिकों के लिए एक न्यूनतम जीवन स्तर भी सुनिश्चित हो गया।
  • सोवियत संघ तो 15 गणराज्यों को मिलाकर बना था, मगर नौकरशाही के हावी होने के बाद जिस तरह से कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता पर हावी हुई और जनता के प्रति अपनी जवाबदेही से उसने मुंह मोड़ लिया, उससे जनता ने खुद को उपेक्षित महसूस करना शुरू कर दिया।
  • हथियारों को बढ़ाने पर अधिक फोकस की वजह से सोवियत संघ में परिवहन और ऊर्जा जैसी अन्य सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया गया। अनाज का आयात बढ़ता चला गया और 1970 के दशक में यहां की व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा सी गई।

सोवियत साम्यवाद का विघटन

  • 1980 के दशक में कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव बनने के बाद मिखाइल गोर्बाचेव ने सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सोवियत संघ की पश्चिमी देशों से बराबरी कराने और इनके साथ सोवियत संघ के रिश्ते सुधारने के लिए काफी प्रयास किये, मगर अलग-अलग देशों की जनता के विरोध के कारण पूर्वी यूरोप में एक-एक करके साम्यवादी सरकारों का अंत होता चला गया।
  • वर्ष 1991 में तख्तापलट हुआ, लेकिन इसका मुखर विरोध करके बोरिस येल्तसिन नायक बन गये और चुनाव भी जीत गये।
  • दिसंबर, 1991 में रूस, बेलारूस और यूक्रेन जैसे तीन बड़े गणराज्य सोवियत संघ से येल्तसिन की अगुवाई में अलग हो गये।
  • सोवियत संघ बिखर कर रह गया। सोवियत संघ का रूस उत्तराधिकारी राज्य बनकर उभरा।

सोवियत संघ के विघटन के कारण

  • सोवियत संघ की राजनीतिक से लेकर आर्थिक संस्थाएं तक फिसड्डी साबित हुई थीं और जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरी थीं। यह सोवियंत संघ के विघटन का सबसे महत्वपूर्ण कारण था।
  • अर्थव्यस्था के मंद हो जाने की वजह से देश में उपभोग में आने वाली वस्तुओं की भारी कमी हो गई, जिससे यहां की जनता को अब सत्ता से भरोस उठने लगा।
  • सोवियत संघ की सरकार ने परमाणु हथियारों और सैन्य जरूरतों पर अधिक ध्यान दिया, लेकिन मूलभूत चीजों की ओर ध्यान से चूक गई।
  • पूर्वी यूरोप के जो देश सोवियत के नियंत्रण में थे, उन पर भी सरकारों का ध्यान कुछ ज्यादा रहा, ताकि वे नियंत्रण से बाहर न हो सकें।
  • आर्थिक दबाव इतना बढ़ गया कि सोवियत संघ की सरकार के लिए इसे झेलना मुश्किल हो गया।
  • सोवियत संघ की जनता को जानकारी मिलने लगी कि पश्चिमी देश किस तरह से तरक्की कर रहे हैं। उन्हें यह समझ आ गया कि उनमें और पश्चिमी देशों में कितना अंतर है। इस तरह से लोगों को अपमानित सा महसूस होने लगा कि अपनी सरकार की वजह से वे बहुत पिछड़ गये हैं।
  • कम्युनिस्ट पार्टी का शासन करीब 70 वर्षों तक रहा। इस दौरान भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ा। सरकार जनता के प्रति जवाबदेह नजर ही नहीं आ रही थी। अपनी गलतियों तक को सुधारना वह नहीं चाहती थी। इससे जनता में असंतोष बढ़ने लगा।
  • शासन में चल क्या रहा है, लोगों को पता नहीं चल रहा था। इतना विशाल देश था, मगर सत्ता केद्रीकृत थी, ऐसे में जनता खुद को एकदम अलग-थलग महसूस करने लगी थी।
  • जनता की तुलना में कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को जो विशेषाधिकार मिले थे, उनकी वजह से भी सरकार और जनता के बीच की खाई गहराती जा रही थी।
  • गोर्बाचेव ने सुधार वाले कदम तो जरूर उठाये, मगर जनता जो कि पूरी तरह से शासन से ऊब चुकी थी, उसकी महत्वाकांक्षी तेजी से बढ़ती चली गई और उसे महसूस होने लगा कि गोर्बाचेव के काम करने की गति बहुत धीमी है। ऐसे में जनता का धैर्य जवाब दे गया और उसकी निराशा गहराती चली गई।
  • दूसरी ओर कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं का भी रोष गोर्बाचेव को झेलना पड़ा। इन नेताओं ने आरोप लगाना शुरू कर दिया कि गोर्बाचेव की वजह से उनके विशेषाधिकार कम होते जा रहे हैं।
  • इस तरह से हर ओर से गोर्बाचेव ही निशाने पर आ गये। समर्थन उनका खत्म होता चला गया। साथ वाले भी अब उनसे अलग होने लगे। अपनी ही नीतियों का अब ठीक से गोर्बाचेव बचाव करने में नाकाम हो गये।
  • इसके अलावा राष्ट्रीयता और संप्रभुता की भावना अब उफान मारने लगी थी। खासकर रूस, बाल्टिक गणराज्य जिसमें एस्टोनिया, लात्विया और लिथुआनिया शामिल थे और यूक्रेन व जॉर्जिया में यह उभार अधिक नजर आया।

निष्कर्ष

निश्चित तौर पर सोवियत संघ के विघटन के लिए वहां की निरंकुश बन चुकी सरकार और जनता में जागी विकास की प्यास थी। रूस और यूक्रेन जैसे बड़े देशों की जनता को महसूस होने लगा था कि सोवियत संघ में शामिल अन्य पिछड़े इलाकों की वजह से उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ रहा है और वे विकास की दौड़ में पिछड़ गये हैं। सोवियत संघ के विघटन के लिए आप किसे सर्वाधिक जिम्मेदार मानते हैं?

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