सरोजिनी नायडू का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान

2472
Sarojini Naidu

भारत की आज़ादी के यज्ञ में समाज के हर वर्ग और हर आयु के नर-नारी का योगदान रहा है। नारी समुदाय के योगदान को किसी भी रूप में कम नहीं आँका जा सकता है। शिक्षित हो या शिक्षा धन से वंचित, उच्च आय वर्ग से संबंध रखती हों या किसी निर्धन की कुटिया की शोभा हों, महिलाओं ने आज़ादी रूप हवन में बढ़-चढ़ कर अपना योगदान दिया है। सरोजनी नायडु एक इसी प्रकार की महिला थीं, जो कवियत्री होने के कारण कोमल हृदय रखती थी, लेकिन उसी कोमल हृदय ने उन्हें अँग्रेजी शासन की लाठीयों के आगे मजबूती से खड़ा रखा था। भारत कोकिला के सम्मान से सम्मानित सरोजनी नायडु का स्वतन्त्रता आंदोलन में योगदान किसी भी दृष्टि से कम नहीं था।

सरोजनी का प्रारम्भिक जीवन:

हैदराबाद में 13 फरवरी 1879 के दिन श्री अघोरनाथ चट्टोपाध्याय और श्रीमति वरदा सुंदरी के घर एक सुंदर कन्या का जन्म हुआ जिसे सरोजनी नाम दिया गया। मेधावी बुद्धि की धनी सरोजनी ने बारह वर्ष की कोमल आयु में ही मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की थी। लेकिन घर पर रहकर अँग्रेजी भाषा की पढ़ाई ने उनके कवि मन को कविता करने के हौंसले को कम नहीं होने दिया। उनके कविता प्रेम ने एक बार गणित की कॉपी में 1300 पंक्तियों की एक कविता की रचना करवा दी, जिसे उनके पिता ने न केवल पसंद किया बल्कि उसकी कॉपियाँ बनवाकर सब परिचितों में बँटवा दीं। जब यह कविता हैदराबाद के नवाब ने देखीं तो उन्होनें खुश होकर सरोजनी को विदेश में आगे की पढ़ाई करने के लिए स्कोलरशिप भी दे दी। इसके आधार पर विदुषी सरोजनी लंदन के किंग कॉलेज में मेडिकल की पढ़ाई करने चली गईं। इसके आगे उन्होनें कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में भी मेडिकल की पढ़ाई करते हुए कविताओं की रचना करना नहीं छोड़ा।

भारत वापस आकर वर्ष 1905 में उन्नीस वर्ष की आयु में एक और क्रांतिकारी कदम के रूप में अंतरजातीय विवाह करा जिसमें उनके पिता ने पूरा साथ दिया। विवाह के बाद पति का साथ पाकर कवियत्री सरोजनी ने अब देश सेवा का भी प्रण ले लिया। इसी वर्ष देश में भी बंगाल विभाजन के रूप में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया था। इसका असर सरोजनी चटोपाद्धय जो अब नायडू थीं, कांग्रेस में कार्यकर्ता के रूप में शामिल हो गईं थीं।

सरोजनी का राजनैतिक जीवन:

कांग्रेस में शामिल होकर सरोजनी नायडू का देश के शीर्ष नेतृत्व से सीधा संपर्क हो गया और वे गांधी, नेहरू, रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे विश्वप्रसिद्ध नेताओं के साथ ही सीपी रामा स्वामी अय्यर, गोपाल कृष्ण गोखले, मोहम्मद अली जिन्ना, एनी बेसेंट नेताओं के साथ खड़े होकर स्वतन्त्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए तैयार हो गईं।

वर्ष 1906 में उन्होनें गोपाल कृष्ण गोखले के कलकत्ता अधिवेशन के भाषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1915 -18 की अवधि में सरोजनी नायडू ने आज़ादी की मशाल को घर-घर पहुंचाने के लिए पूरे भारत का 18 बार भ्रमण किया था। 1919 में गांधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में गांधी जी के दाहिने हाथ के रूप में उन्होनें काम किया था। इसी वर्ष वो होम रूल के मामले को विश्व मंच पर लाने के लिए इंग्लैंड गईं। इसके बाद 1922 से गांधी जी के विचारों से प्रभावित होकर सरोजनी नायडू ने अपने जीवन में सदा के लिए खादी वस्त्रों को स्थान दे दिया।

महिला सशक्तिकरण की ताकत को पहचानते हुए सरोजनी ने महिला अधिकारों के समर्थन में अपनी आवाज उठाई और इसके लिए छोटे शहरों से लेकर बड़े राज्यों तक अलख जगाने का काम किया।

अपनी योग्यता और क्षमता के आधर पर उन्हें 1925 में भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया गया। अध्यक्ष पद की गरिमा के साथ न्याय करते हुए सरोजनी ने स्वतन्त्रता आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में रहते हुए गांधी जी के साथ जेल यात्रा भी की थी। 1928 में स्वतन्त्रता आंदोलन के यज्ञ में गांधीजी की प्रतिनिधि के रूप में अमरीका गईं और वहाँ भारत की स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया।

1942 में जब गांधी जी ने भारत छोड़ो का बिगुल बजाया था, तब ब्रिटिश सरकार ने सरोजनी नायडू को 21 महीने के लिए कारावास में रखा था।

सरोजनी नायडू बहुमुखी प्रतिभा की धनी और एक वीरांगना स्त्री थीं। उन्हें विभिन्न भाषाओं का अच्छा ज्ञान था और इस कौशल का उन्होनें स्वतंत्रा आंदोलन में बखूबी उपयोग किया। अपने भाषणों में वे उसी राज्य या प्रांत की भाषा का प्रयोग करतीं थीं, जहां वो खड़ी हुई होती थीं। उनकी इस प्रतिभा बे उनके वचनों का ग्रामवासियों के दिलों पर सीधा प्रभाव डालने में योगदान दिया और आज़ादी की ज्वाला देश के हर व्यक्ति में एकसमान रूप से जलने लगी। इस प्रकार उन्होनें हिन्दी, बंगला और गुजराती भाषा में अधिकार के साथ भाषण देते हुए हर व्यक्ति को अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार कर लिया। इसी प्रकार अँग्रेजी पर मजबूत पकड़ होने के कारण लंदन की सभा में अपने भाषण से सभी श्रोताओं को अनायास ही अपनी बात समझाने में वो सफल रहीं थीं।

 ‘भारत कोकिला’ की उपाधि से सुसज्जित सरोजनी नायडू ने आज़ादी के बाद भी देश सेवा में अपने जीवन को लगाए रखा और 1949 में अपने गवर्नर के पद पर काम करते हुए उनका देहांत हो गया था।

Leave a Reply !!

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.