सरोजिनी नायडू का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान

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Sarojini Naidu

भारत की आज़ादी के यज्ञ में समाज के हर वर्ग और हर आयु के नर-नारी का योगदान रहा है। नारी समुदाय के योगदान को किसी भी रूप में कम नहीं आँका जा सकता है। शिक्षित हो या शिक्षा धन से वंचित, उच्च आय वर्ग से संबंध रखती हों या किसी निर्धन की कुटिया की शोभा हों, महिलाओं ने आज़ादी रूप हवन में बढ़-चढ़ कर अपना योगदान दिया है। सरोजनी नायडु एक इसी प्रकार की महिला थीं, जो कवियत्री होने के कारण कोमल हृदय रखती थी, लेकिन उसी कोमल हृदय ने उन्हें अँग्रेजी शासन की लाठीयों के आगे मजबूती से खड़ा रखा था। भारत कोकिला के सम्मान से सम्मानित सरोजनी नायडु का स्वतन्त्रता आंदोलन में योगदान किसी भी दृष्टि से कम नहीं था।

Sarojini Naidu का प्रारम्भिक जीवन

हैदराबाद में 13 फरवरी 1879 के दिन श्री अघोरनाथ चट्टोपाध्याय और श्रीमति वरदा सुंदरी के घर एक सुंदर कन्या का जन्म हुआ जिसे सरोजनी नाम दिया गया। मेधावी बुद्धि की धनी सरोजनी ने बारह वर्ष की कोमल आयु में ही मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की थी। लेकिन घर पर रहकर अँग्रेजी भाषा की पढ़ाई ने उनके कवि मन को कविता करने के हौंसले को कम नहीं होने दिया। उनके कविता प्रेम ने एक बार गणित की कॉपी में 1300 पंक्तियों की एक कविता ‘द लेडी ऑफ लेक’ की रचना करवा दी, जिसे उनके पिता ने न केवल पसंद किया बल्कि उसकी कॉपियाँ बनवाकर सब परिचितों में बँटवा दीं।

प्रभावित हुए हैदराबाद के निजाम

जब यह कविता हैदराबाद के नवाब ने देखीं तो उन्होनें खुश होकर सरोजनी को विदेश में आगे की पढ़ाई करने के लिए स्कोलरशिप भी दे दी। इसके आधार पर विदुषी सरोजनी लंदन के किंग कॉलेज में मेडिकल की पढ़ाई करने चली गईं। इसके आगे उन्होनें कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में भी मेडिकल की पढ़ाई करते हुए कविताओं की रचना करना नहीं छोड़ा।

लिया देश सेवा का प्रण

भारत वापस आकर वर्ष 1905 में उन्नीस वर्ष की आयु में एक और क्रांतिकारी कदम के रूप में अंतरजातीय विवाह करा जिसमें उनके पिता ने पूरा साथ दिया। विवाह के बाद पति डॉ. गोविन्द राजालु नायडू का साथ पाकर कवियत्री सरोजनी ने अब देश सेवा का भी प्रण ले लिया। इसी वर्ष देश में भी बंगाल विभाजन के रूप में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आया था। इसका असर सरोजनी चटोपाद्धय जो अब नायडू थीं, कांग्रेस में कार्यकर्ता के रूप में शामिल हो गईं थीं। सरोजिनी नायडू जालियांवाला बाग हत्याकांड से भी इस कदर आहत हुई थीं कि उन्हें 1908 में जो कैसर-ए-हिंद सम्मान मिला था, उन्हें इसे लौटाने में जरा भी देरी नहीं की।

सरोजनी का राजनैतिक जीवन

कांग्रेस में शामिल होकर सरोजनी नायडू का देश के शीर्ष नेतृत्व से सीधा संपर्क हो गया और वे गांधी, नेहरू, रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे विश्वप्रसिद्ध नेताओं के साथ ही सीपी रामा स्वामी अय्यर, गोपाल कृष्ण गोखले, मोहम्मद अली जिन्ना, एनी बेसेंट जैसे नेताओं के साथ खड़े होकर स्वतन्त्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए तैयार हो गईं।

महात्मा गांधी का दाहिना हाथ

वर्ष 1906 में उन्होनें गोपाल कृष्ण गोखले के कलकत्ता अधिवेशन के भाषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1915 -18 की अवधि में सरोजनी नायडू ने आज़ादी की मशाल को घर-घर पहुंचाने के लिए पूरे भारत का 18 बार भ्रमण किया था। 1919 में गांधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में गांधी जी के दाहिने हाथ के रूप में उन्होंने काम किया था।

महिला अधिकारों के लिए उठाई आवाज

इसी वर्ष वो होम रूल के मामले को विश्व मंच पर लाने के लिए इंग्लैंड गईं। इसके बाद 1922 से गांधी जी के विचारों से प्रभावित होकर सरोजनी नायडू ने अपने जीवन में सदा के लिए खादी वस्त्रों को स्थान दे दिया। महिला सशक्तिकरण की ताकत को पहचानते हुए सरोजनी ने महिला अधिकारों के समर्थन में अपनी आवाज उठाई और इसके लिए छोटे शहरों से लेकर बड़े राज्यों तक अलख जगाने का काम किया।

गांधी जी से यूं प्रभावित हुई थीं Sarojini Naidu

लंदन में सरोजिनी नायडू की भेंट महात्मा गांधी से तभी हो गई थी, जब वे अपनी युवावस्था में थीं। गांधी जी नायडू को जमीन पर बैठे हुए नजर आये थे। रात का भोजन गांधी जी जैतून के तेल, बिस्किट और पिचके हुए टमाटर से कर रहे थे। ऐसे में उन्हें देखकर सरोजिनी नायडू हंस पड़ी थीं। उन्होंने गांधी जी पर व्यंग्य करते हुए एक टिप्पणी भी कर दी थी।

गांधी जी को यह बात बिल्कुल भी बुरी नहीं लगी। उन्होंने बड़ी ही विनम्रता से सरोजिनी नायडू की ओर देखते हुए कहा कि लगता है कि आप सरोजिनी नायडू हैं। आइए मेरे साथ बैठकर आप भी भोजन कीजिए। सरोजिनी नायडू ने जब गांधी का इतना प्रखर उत्तर सुना तो वे उनसे बड़ी प्रभावित हो गईं और उनकी प्रशंसक भी बन गईं। महात्मा गांधी की वे ऐसी अनुयायी बन गईं, जो 43 वर्षों के बाद उनकी मृत्यु तक उनके साथ खड़ी नजर आईं। गांधी को राष्ट्रपिता बुलाना भी सरोजिनी नायडू ने ही शुरू किया था।

भारतीय महिलाओं को लेकर कहा था

भारतीय महिलाओं के बारे में सरोजिनी नायडू ने एक बार कहा था कि किसी की जरूरत जब आपको अपना झंडा संभालने के लिए पड़ जाए और आस्था के अभाव से आप खुद को पीड़ित पाएं, तो आपके झंडे को संभालने के लिए और आपकी ताकत को थामने के लिए भारत की नारियां आपके साथ होंगी। आपको यदि मरना भी पड़े तो इस बात का आप जरूर याद रखें कि चित्तौड़ की पद्मिनी की आस्था का भी भारत के नारीत्व में समावेश है।

फारसी भाषा में सरोजिनी नायडू ने मेहर मुनीर नामक एक नाटक की रचना की थी। नीलांबुज, द ब्रोकन विंग, ट्रेवलर्स सांग और द बर्ड ऑफ टाइम जैसी पुस्तकें भी सरोजिनी नायडू ने लिखी हैं।

21 महीने का कारावास

अपनी योग्यता और क्षमता के आधार पर उन्हें 1925 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया गया। अध्यक्ष पद की गरिमा के साथ न्याय करते हुए सरोजनी ने स्वतन्त्रता आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में रहते हुए गांधी जी के साथ जेल यात्रा भी की थी। 1928 में स्वतन्त्रता आंदोलन के यज्ञ में गांधीजी की प्रतिनिधि के रूप में अमरीका गईं और वहाँ भारत की स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया। 1942 में जब गांधी जी ने भारत छोड़ो का बिगुल बजाया था, तब ब्रिटिश सरकार ने सरोजनी नायडू को 21 महीने के लिए कारावास में रखा था। आगा खां महल में उन्हें कैद करके अंग्रेजों ने रखा था।

कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण

कानपुर में हुए कांग्रेस के अधिवेशन की सरोजिनी नायडू ने अध्यक्षता की थी। तब अपने अध्यक्षीय भाषण में नायडू ने कहा था कि वे सभी लोग जो देशभर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की परिधि में आते हैं, उन्हें कांग्रेस की ओर से यह आदेश दिया जाना चाहिए कि वे अपनी सीटें केंद्रीय एवं प्रांतीय विधानसभाओं तुरंत खाली कर दें। साथ ही उत्तर में कैलाश से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक, पश्चिम से सिन्धु से लूकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र तक एक गतिमान और कभी न थकने वाले अभियान का प्रादुर्भाव करें।

कई भाषाओं पर समान अधिकार

सरोजनी नायडू बहुमुखी प्रतिभा की धनी और एक वीरांगना स्त्री थीं। उन्हें विभिन्न भाषाओं का अच्छा ज्ञान था और इस कौशल का उन्होनें स्वतंत्रा आंदोलन में बखूबी उपयोग किया। अपने भाषणों में वे उसी राज्य या प्रांत की भाषा का प्रयोग करतीं थीं, जहां वो खड़ी हुई होती थीं। उनकी इस प्रतिभा बे उनके वचनों का ग्रामवासियों के दिलों पर सीधा प्रभाव डालने में योगदान दिया और आज़ादी की ज्वाला देश के हर व्यक्ति में एकसमान रूप से जलने लगी।

इस प्रकार उन्होनें हिन्दी, बंगला और गुजराती भाषा में अधिकार के साथ भाषण देते हुए हर व्यक्ति को अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार कर लिया। इसी प्रकार अँग्रेजी पर मजबूत पकड़ होने के कारण लंदन की सभा में अपने भाषण से सभी श्रोताओं को अनायास ही अपनी बात समझाने में वो सफल रहीं थीं।

देश की प्रथम महिला राज्यपाल

देश जब आजाद हुआ तो स्वाधीनता संग्राम में योगदान देने वाले नेताओं की भूमिकाएं भी बदलीं। देश की गुलामी के दौरान उन्होंने देश की आजादी के लिए प्रयास किये तो अब देश के आजाद होने के बाद राष्ट्र निर्माण की जिम्मेवारी उनके कंधों पर आ गई थी। जिन नेताओं को सरकारी महकमे में शामिल किया और जिन्हें प्रशासनिक जिम्मेवारियां दी गईं, सरोजिनी नायडू भी उनमें से एक थीं। क्षेत्रफल एवं जनसंख्या के लिहाज से देश के सबसे विशाल राज्य उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की जिम्मेवारी उन्हें सौंप दी गई। इस तरह से सरोजिनी नायडू को भारत की प्रथम महिला राज्यपाल बनने का गौरव भी हासिल हुआ।

राज्यपाल बनने के बाद कहा था

जरा सरोजिनी नायडू की विनम्रता तो देखिए। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जब उन्हें उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की जिम्मेवारी दिलाई, तो नायडू ने कहा कि कैद किये गये जंगल के पक्षी की भांति उन्हें अनुभव हो रहा है, मगर नेहरू की इच्छा को टालने का साहस वे नहीं कर सकीं, क्योंकि उनके प्रति नायडू के दिल में अपार स्नेह और सम्मान था।

नेहरू को लिखी गई चिठ्ठी

सरोजिनी नायडू ने 29 सितंबर, 1929 को पंडित जवाहर लाल नेहरू को एक चिठ्ठी लिखी थी, जिनमें उन्होंने लिखा था कि जब चुनाव परिणामों की घोषणा होने के बाद तुम्हारा भव्य स्वागत हो रहा था, तो तुम्हारे चेहरे को निहारते हुए मुझे ऐसा लगा कि राजतिलक और सूली के दृश्य एक साथ मेरी नजरों के सामने उमड़ पड़े हैं। देखा जाए तो असल में कुछ परिस्थितियों एवं कुछ अवस्थाओं में ये दोनों ही अटूट अंग हैं एक-दूसरे के और कुछ हद तक पर्यायवाची भी हैं।

 भारत कोकिला की उपाधि से सुसज्जित सरोजनी नायडू ने आज़ादी के बाद भी देश सेवा में अपने जीवन को लगाए रखा और 1949 में अपने गवर्नर के पद पर काम करते हुए उनका देहांत हो गया था।

चलते-चलते

सरोजिनी नायडू का व्यक्तित्व वाकई बड़ा प्रेरक रहा है, क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने के साथ राजनीति, साहित्य, समाज और महिला सशक्तीकरण में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय नजर आती है। सरोजिनी नायडू का जीवन इस बात का गवाह है कि ताउम्र वे देश के लिए ही जीती रहीं और देश की सेवा करते हुए ही अंतिम सांस भी ली।

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