भारत की 5 मुख्य महिला स्वतंत्रता सेनानी

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भारत के स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों से आज़ादी के लिए घोर संघर्ष किया। ऐसे में कई महिला स्वतंत्रता सेनानियों ने भी इस संघर्ष के प्रति अपार योगदान दिया। आज़ादी की लड़ाई में महिलाओं का अविश्वसनीय योगदान सत्र 1817 से आरम्भ हुआ जब भीमाबाई होल्कर ने ब्रिटिश कर्नल मलकम के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई कर उन्हें हराया। इसके बाद और भी कई बहादुर महिलाओं ने अंग्रेजों पर विजय प्राप्त कर अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ अदा की। आइये इनमें से कुछ महिला स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में जानते है।

1. रानी लक्ष्मी बाई
जिन्हें एक औरत द्वारा प्रदर्शित ताकत और साहस का प्रतीक माना जाता है। 1857 में झांसी की इस रानी ने वक़्त आने पर अपने पुत्र सहित मैदान में उतर कर दुश्मनों का बहादुरी से सामना किया एवं मराठा राज्य सहित देश को भी सम्मान दिलाया ।

2. सरोजिनी नायडू
‘भारत कोकिला’ के नाम से प्रख्यात श्रीमती नायडू ने एक उत्साही स्वतंत्रता कार्यकर्ता और एक कवि के रूप में सन 1930-34 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया था। श्रीमती नायडू 1905 में स्वतंत्र भारत की पहली महिला गवर्नर बनी। इनकी कविताओं के संग्रह आज भी अंग्रेजी में महत्वपूर्ण भारतीय लेखन में मिलते है।

3. सुचेता कृपलानी
सुचेता कृपलानी भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी और उत्तर प्रदेश राज्य में 1963-67 की अवधि में कार्य किया। इन्होंने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता संग्राम में तथा 1946-47 में विभाजन के दंगों के दौरान सांप्रदायिक तनाव शमन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्रीमती कृपलानी भारतीय संविधान की उप समिति का एक हिस्सा भी थी।

4. सावित्री बाई फुले
सावित्री बाई को ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में महिलाओं की शिक्षा के अग्रदूतों में से एक माना जाता है। 19 वीं सदी में घोर अपमान के बाद भी इन्होंने लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा के प्रति अपने प्रयास जारी रखे। सावित्रीबाई ने अपने पति के साथ भारत का पहला महिला स्कूल भिड़े वाडा सन 1848 में पुणे में स्थापित किया। वे अंत तक महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ी।

5. भीकाजी कामा
भीकाजी भारतीय होम रूल सोसायटी की स्थापना में सबसे सक्रिय थी । इन्हें इनके प्रेरक और क्रांतिकारी भाषणों के लिए तथा भारत और विदेश दोनों में लैंगिक समानता की वकालत करने के लिए जाना जाता है। एक वरिष्ठ नेता की तरह इन्होंने कुछ महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर दुनिया का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की। 22 अगस्त 1907, स्टटगार्ट, जर्मनी में अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट सम्मेलन में, कामा ने ध्वज फहराया जिसे उन्होंने “आजादी का प्रथम ध्वज” कहा।

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